उस शहरी नक्सलवाद को पहचानिए, जो आपके इर्द-गिर्द मुखौटा लगाकर मौजूद है!

ग्रामीण भारत में पिछले तीन दशकों में नक्सलवाद के हाथों हजारों लोगों की हत्याएं हुईं, लेकिन कुछ समय से हथियारबंद नक्सलियों का प्रभाव कम होता जा रहा है। ऐसे में इन्होने शहरों में, अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर साजिश रचने का काम शुरू कर दिया है। ये शहरी नक्सली हमारे-आपके बीच के लोगों का मुखौटा लगाकर हमारे आसपास ही मौजूद रहते हैं, लेकिन हमें इसकी भनक तक नहीं लग पाती। इन्हीं नक्सलियों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया है और अब यह शहरों में काम कर रहे उन गरीबों को हिंसा की आग में धकेलने में लगे हैं जो मेहनत-मजदूरी कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं। 

पिछले दिनों वामपंथी विचारधारा से जुड़े पांच बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी के बाद एक शब्द की बहुत चर्चा हो रही है- शहरी नकसली। महाराष्ट्र पुलिस ने कई शहरों में छापेमारी करके इन बुद्धिजीवियों को नक्सलियों से संपर्क रखने के संदेह में हिरासत में लिया है। पिछले साल भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा की जांच के सिलसिले में ये गिरफ्तारियां हुई हैं। गिरफ्तार किये गए लोगों में कोई कवि है, कोई वकील, कोई एक्टिविस्ट। सभी लोगों में समानता यह है कि यह सभी वामपंथी विचारधारा से जुड़े हैं एवं दलितों और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों के हित में काम करने का दावा करते हैं। लेकिन इनमे से ज्यादातर का भरपूर आपराधिक रिकॉर्ड है।

शहरी नक्सल की चर्चा पहले भी रही है। इन्हें अदृश्य शत्रु कहा जाता रहा है, जो देश और समाज के खिलाफ हथियार नहीं उठाते, लेकिन सिस्टम के खिलाफ धीमे-धीमे अविश्वास का माहौल पैदा करते रहते हैं। शहरी नक्सलियों की खासियत होती है कि समाज में इनकी हैसियत विद्वान और विचारक के तौर पर बनती  है, लेकिन यह नक्सलियों की हिंसक लड़ाई को शहरों में बैठकर वैचारिक आधार प्रदान करते रहते हैं। ये हमारे-आपके बीच के लोगों का मुखौटा लगाकर हमारे आसपास ही मौजूद रहते हैं, लेकिन हमें इसकी भनक तक नहीं लग पाती। 

फोटो साभार : epostmortem.org

दरअसल, ऐसे लोग शहरी युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित कर उन्हें सरकार विरोधी आन्दोलन करने को उकसाते हैं। महाराष्ट्र पुलिस ने कुछ साल पहले पुणे के आस-पास इस तरह की हरकतों का पता लगाया था जिसमें टीचर्स ट्रेनिंग के नाम पर माओवादी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा था। कबीर कला मंच का इस्तेमाल नक्सल विचारधारा को बल देने के लिए किया गया।

महाराष्ट्र एटीएस ने इस तरह की गतिविधियों पर पिछले कई सालों से नज़र रखा हुआ है, उसका दावा है कि नक्सालियों ने शहरी इलाकों में अपने टारगेट ग्रुप की पहचान की है और साथ ही साथ उनको शिक्षण भी देने का काम किया। नक्सलियों की गिरफ़्तारी के बाद वामपंथी विचारधारा के वो तमाम झंडाबरदार लोग प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खड़े हुए हैं, जो पिछले एक दशक से ज्यादा समय से लगातार सक्रिय हैं मसलन अरुंधती रॉय, प्रशांत भूषण आदि। विपक्षी दलों में कांग्रेस अध्यक्ष  राहुल गांधी भी इन गिरफ्तारियों पर सवाल उठाने में लगे हैं।

शहरी नक्सलियों की गतिविधि को समझने से पहले उन लोगों के प्रोफाइल पर नज़र डालनी चाहिए जिनको गिरफ्तार किया गया है। सबसे पहले गौतम नवलखा का जिक्र; जिसके खिलाफ आएसआई समर्थित संगठनों से साठ-गाँठ रखने का आरोप है। अरुण फरेरा और वेर्नोम गोंसाल्वेज दोनों कई बार अलग-अलग अपराधों के लिए जेल जा चुके हैं।

वरवर राव जाने-माने नक्सल समर्थक लोक कवि हैं और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण वह कई बार जेल जा चुके हैं। गोंसाल्वेज के खिलाफ हथियार और विस्फोटक रखने का भी आरोप है। पांचवी बुद्धिजीवी सुधा भारद्वाज। इन पाँचों को गिरफ्तार कर हाउस अरेस्ट में रखा गया है। महाराष्ट्र पुलिस का दावा है कि इन पाँचों का दोष सिद्ध करने के लिए उसके पास बेहद पुख्ता सबूत हैं।  

क्या काम करते हैं शहरी नक्सली?

1- शहरी लोगों को गाँव के लोगों के खिलाफ भड़काना;

2- दलितों को हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा करना;

3- आदिवासियों को गैर आदिवासियों के खिलाफ करना;

4- मजदूरों को उद्योगपतियों के खिलाफ खड़ा करना; और 

5- अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के खिलाफ खड़ा करना

जाहिर है, जितने प्रकार से समाज टूट सकता है उन सभी तरीकों पर ये शहरी नक्सली काम करते हैं। शहरी  नक्सलवाद का एक मुख्य लक्ष्य होता है, हिन्दू समाज की एक बड़ी भयावह तस्वीर पेश करना और उसमें फूट डालना। इनके विरोध के केंद्र में होता है हिन्दू समाज। अपवाद के तौर पर भी यह दूसरे  धर्मों की आलोचना करने से बचते हैं।

यह वैसे लोग हैं जो अमरनाथ यात्रा के खिलाफ तर्क देते हैं कि इस यात्रा से वातावरण का नुकसान हो रहा है, लेकिन गलती से भी यह कभी हज यात्रा पर कुछ नहीं बोलते। यह वैसे लोग हैं जो हिन्दुओं को उनके विरासत और मूल्यों से काटने में लगे रहते हैं।इनका लक्ष्य है भारत को एक राष्ट्र के तौर पर तोड़ना।

ग्रामीण भारत में पिछले तीन दशकों में नक्सलवाद के हाथों हजारों लोगों की हत्याएं हुईं, लेकिन अब हथियारबंद नक्सलियों का प्रभाव कम होता जा रहा है। ऐसे में इन्होने शहरों में, अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर साजिश रचने का काम शुरू कर दिया है। इन्हीं नक्सलियों  ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया है और अब यह शहरों में काम कर रहे उन गरीबों को हिंसा की आग में धकेलना चाहते हैं जो मेहनत-मजदूरी कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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