राम को काल्पनिक बताने वाली कांग्रेस की रामभक्ति पर कोई कैसे यकीन करे!

संविधान ने सभी को अपने मत और उपासना पर अमल का अधिकार दिया है। इस आधार पर किसीकी निंदा नहीं होनी चाहिए।  लेकिन जब कांग्रेस पार्टी श्रीराम वन गमन यात्रा का आयोजन करती है, तो आश्चर्य होता है। ज्यादा समय नहीं हुआ। जब यह पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ थी, तब इसने भगवान राम को काल्पनिक बताया था। ऐसे में अब इसकी रामभक्ति पर कोई कैसे यकीन करे।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस का नया रूप दिखाई दिया। चुनाव ने उसे रामभक्त बना दिया है। उसने ‘राम वनगमन पथ यात्रा’ निकाली। इसमें श्रीराम जानकी के जयकारे लगे। कांग्रेस द्वारा पन्द्रह  दिन की यात्रा में पैंतीस विधानसभा क्षेत्रों पर नजर रखी गई। रामघाट, गुप्त गोदावरी, मैहर अमरकंटक तक राजनीतिक सन्देश दिया गया।

शिवराज सरकार द्वारा राम वनगमन पथ बनाए जाने के वादे को पूरा करने में विलम्ब का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने यह यात्रा निकाली। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि इस पथ को बनाने के लिए एजेंसी सर्वे कर चुकी है, जल्द ही निर्माण शुरू हो जाएगा। वन विभाग की औपचारिकता पूरी करने में विलम्ब हुआ।

देखा जाए तो राम वनगमन पथ पर जिसकी आस्था होगी, वह रामसेतु के प्रति भी उतनी ही श्रद्धा रखेगा। यह भी राम वनगमन का ही एक पड़ाव रहा है। लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसने राम सेतु के विध्वंस के प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह उसकी रामभक्ति के लिए विश्वास का संकट पैदा करता है।

साभार : जी न्यूज

संविधान ने सभी को अपने मत और उपासना पर अमल का अधिकार दिया है। इस आधार पर किसीकी निंदा नहीं होनी चाहिए।  लेकिन जब कांग्रेस पार्टी श्रीराम वन गमन यात्रा का आयोजन करती है, तो आश्चर्य होता है। ज्यादा समय नहीं हुआ। जब यह पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ थी, तब इसने भगवान राम को काल्पनिक बताया था। यह बात कोर्ट को दिए गए हलफनामे में कही गई थी।

भारतवासियों के लिए श्रीराम का क्या महत्व है, ये कहने की जरूरत नहीं। उन श्रीराम को कल्पना बताने वाला कांग्रेसी हलफनामा सामान्य नहीं था। कांग्रेस के अनेक नेता बचाव में थे। विपक्ष के दबाव और सुप्रीम कोर्ट में अपील ने स्थिति संभाली, नहीं तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार रामसेतु को तोड़ने का मंसूबा बना चुकी थी। उस प्रकरण और  राम वन गमन यात्रा में से किसे सही मानें, इसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए।

अटल बिहारी सरकार ने रामसेतु को तोड़ने से इनकार कर दिया था। लेकिन 2005 में मनमोहन सिंह की सरकार इसके पीछे पड़ गई और नए सिरे से सेतु समुद्रम परियोजना मंजूर की। इसमें रामसेतु को यथाशीघ्र तोड़ना शामिल था।  इसके विरोध में मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। फिर सुप्रीम कोर्ट तक मसला पहुंचा। उस समय कांग्रेस सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दी गई दलील गौरतलब है। उसने कहा गया था कि रामायण में जो वर्णित है, उसके वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। 

जब कांग्रेस राम कथा को प्रामाणिक नहीं मानती, तब राम वन गमन पथ के प्रति आस्था कैसे दिखा रही है? राहुल गांधी को रामभक्त कैसे बता रही है? कांग्रेस की अपने विचार बदलने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसके लिए उसे अपने पिछले कार्यों के लिए माफी तो मांगनी ही चाहिए। 

रामायण का काल त्रेतायुग है, जो आज से सत्रह लाख वर्ष पूर्व माना जाता है, लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के समय कहा गया कि रामसेतु मानव निर्मित नहीं है। हलफनामे के विरोध में डाली गयी याचिका में अदालत से रामसेतु नष्ट न करने और उसे संरक्षित एवं प्राचीन स्मारक घोषित करने का अनुरोध किया गया था।

भाजपा द्वारा भी हलफनामे में रामकथा को इतिहास मानने से इनकार करने तथा वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस को केवल साहित्यिक कृति मानने की कड़ी निन्दा की गई थी। भाजपा ने रामसेतु बचाने के लिए देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया था।  लालकृष्ण आडवाणी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर रामसेतु तोड़ने का निर्णय वापस लेने की अपील की थी।

गौरतलब है कि सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों और सेतु स्थल के पत्थरों और बालू का अध्ययन करने के बाद यह पाया गया है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु का निर्माण किया गया था। वैज्ञानिक इसको एक सुपर ह्यूमन एचीवमेंट मान रहे हैं। रामसेतु भौतिक रूप में उत्तर में बंगाल की खाड़ी को, दक्षिण में शांत और स्वच्छ पानी वाली मन्नार की खाड़ी से अलग करता है। रामसेतु भारत के दक्षिण-पूर्वी तट के किनारे तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम द्वीप और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट मन्नार द्वीप के बीच स्थित है।  साइंस चैनल ने व्हाट  ऑन अर्थ एनसिएंट लैंड एंड ब्रिज  नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसमें साबित किया गया कि रामसेतु का वैज्ञानिक ढंग से निर्माण किया गया था। 

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार जिस सैंड पर यह पत्थर रखा हुआ है, वह कहीं दूर  से  लाया गया होगा। रामसेतु पुल को श्रीराम के निर्देशन में कोरल चट्टानों और रीफ से बनाया गया था जिसका विस्तार से उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है। धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में अड़तालीस किमी चौड़ी पट्टी का पुल प्रमाणित हुआ है। 

यह सही है कि राजनीति में कुछ भी संभव है। लोगों का हृदय परिवर्तन भी हुआ करता है। लेकिन अक्सर जो बाहर दिखाई देता है, वही वास्तविक नहीं होता। इसके लिए किसी अन्य को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कांग्रेस के सामने भी यही कठिनाई है। ऐसे विषयों पर उसे विश्वास के संकट का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न उठता है कि सत्ता में आने के बाद वह कहीं फिर अपने पुराने रूप में तो नहीं आ जायेगी, जैसा रामसेतु के खिलाफ हलफनामा देते हुए थी। तब रामसेतु तोड़ने के आर्थिक लाभ बताए जा रहे थे। तब कांग्रेस की सरकार राम सेतु तोड़ने से होने वाली तबाही की वैज्ञानिक दलील को भी सुनने को तैयार नहीं थी। ऐसे में कांग्रेस की रामभक्ति पर सवाल तो उठता ही है। फिलहाल यह भक्ति यह चुनावी पैंतरा ही नजर आ रही है। 

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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