‘राम मंदिर बनने से देश में सद्भावना और एकात्मता का वातावरण बनेगा’

विपक्षी दलों को राजनीति चलानी है, इसलिए इस मुद्दे पर विरोधी सुर अख्तियार किए हुए हैं। इसपर विरोधी दलों की राजनीति का अंदाजा अभी हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा दिए गए इस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि कोई भी अच्छा हिन्दू रामजन्मभूमि पर मंदिर नहीं बनाएगा। यही वो राजनीति है जो मंदिर के मार्ग में अवरोध खड़े करती रही है। ये राजनीति नहीं आती तो मंदिर कब का बन चुका होता और सबके सहयोग से बनता।

विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश की जनता के सामने दरपेश मुद्दों पर खुलकर विचार विमर्श करता है। संघ का उद्देश्य यही होता कि देश और देश की जनता को कैसे सर्वश्रेष्ठ  बनाया जाए। देश की सुरक्षा से लेकर सामाजिक समरसता के हर मुद्दे पर सरसंघचालक खुलकर अपनी बात रखते हैं। देश की जनता इस उद्बोधन का इन्तजार भी करती है।

वैसे भी संघ में पिछले कुछ सालों से इस बात पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है कि अलग-अलग विचारधाराओं से सम्बद्ध लोगों को एक मंच पर लाया जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने 93वें स्थापना दिवस के मौके पर कई अहम मुद्दों पर बात की, जिसकी विस्तार से चर्चा ज़रूरी है।

लोकसभा चुनाव से पहले जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है, वह है अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण। पहला आधार यह है कि राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बने या सभी वर्गों के लोग मिल-बैठकर आपसी सहमति से इसका निर्माण करें। एक तीसरे विकल्प जिसकी चर्चा  मोहन भागवत ने की वो यह है कि इसके लिए सरकार कानून लेकर आए। मोहन भागवत ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण हिन्दू मुस्लिम का प्रश्न नहीं है। यह तो भारत का प्रतीक है।

उन्होंने यह भी कहा,  ‘श्रीराम मंदिर बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है। मंदिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा। राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धर्ममर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य राममंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है।

मोहन भागवत के इस बयान के बाद इसकी विवेचना शुरु हो गई है। क्या सरकार वाकई कानून बनाने की स्थिति में है? क्या सभी दलों के बीच इस तरह की आपसी सहमति बन गई है? बहरहाल, मोहन भागवत का यह कहना भी जायज़ है कि संत महात्माओं को इस मोर्चे पर आगे रहना चाहिए, उनकी तरफ से जो भी आदेश होगा, समाज और संघ उसके साथ चलेगा। वैसे भी राम मंदिर को लेकर कानूनी प्रक्रिया इतनी ज्यादा जटिल हो गई है कि आम आदमी सत्य जानते हुए भी इससे दूर भागने की कोशिश करता है। सवाल उठता है कि राम भारतवर्ष के गौरव हैं, ऐसे में यदि अयोध्या में उनका भव्य मंदिर न बना तो कहाँ बनेगा?

विपक्षी दलों को राजनीति चलानी है, इसलिए इस मुद्दे पर विरोधी सुर अख्तियार किए हुए हैं। इसपर विरोधी दलों की राजनीति का अंदाजा अभी हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा दिए गए इस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि कोई भी अच्छा हिन्दू रामजन्मभूमि पर मंदिर नहीं बनाएगा। यही वो राजनीति है जो मंदिर के मार्ग में अवरोध खड़े करती रही है। ये राजनीति नहीं आती तो मंदिर कब का बन चुका होता और सबके सहयोग से बनता।

विजयदशमी के मौके पर आपसी विरोध को ख़त्म करने का प्रण लेना चाहिए। संघ ने अपनी तरफ से समाज के सभी वर्गों को साथ लेने का प्रयास किया है। जाहिर है, संघ के इस विचार को लेकर सरकार में विचार-विमर्श का सिलसिला चलेगा। साथ ही उन लोगों को शायद सद्बुद्धि भी मिले जो राम मंदिर के निर्माण में हर संभव कानूनी अड़चन खड़ी करने की कोशिश में रहते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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