भारत ही नहीं, विश्व के पैंसठ देशों में आयोजित होती है रामलीला

समय बदला, तकनीक बदली, लेकिन सदियों से रामलीला की यात्रा जारी है। भारत ही नहीं, विश्व के पैंसठ देशों में रामलीला होती है। प्रत्येक स्थान की अपनी विशेषता है। रामलीला के भी अनगिनत रूप हैं। यह इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों में भी खूब प्रचलित है जहां लोग मजहबी रूप से मुसलमान हैं, लेकिन सांस्कृतिक रूप में अपने को श्रीराम का वंशज मानते हैं। यह मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी,आदि अनेक देशों में प्रचलित है, जहाँ भारतीय श्रमिक रामचरित मानस की छोटी प्रति को पूंजी के रूप में लेकर गए थे। रामलीला उनकी भावनाओं से जुड़ी रही।

मानवीय क्षमता की सीमा होती है। वह अपने ही अगले पल की गारंटी नहीं ले सकता। इसके विपरीत नारायण की कोई सीमा नहीं होती। वह जब मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं, तब भी आदि से अंत तक कुछ भी उनसे छिपा नहीं रहता। लेकिन वह अनजान बनकर अवतार का निर्वाह करते है। भविष्य की घटनाओं को देखते हैं, लेकिन प्रकट नहीं होते देते। इसी को उनकी लीला कहा जाता है। रामलीला इसी भाव की रोचक प्रस्तुति है।

किसी रामलीला के मंचन की एक झलक (साभार : यूट्यूब)

समय बदला, तकनीक बदली, लेकिन सदियों से रामलीला की यात्रा जारी है। भारत ही नहीं, विश्व के पैंसठ देशों में रामलीला होती है। प्रत्येक स्थान की अपनी विशेषता है। रामलीला के भी अनगिनत रूप हैं। यह इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों में भी खूब प्रचलित है जहां लोग मजहबी रूप से मुसलमान हैं, लेकिन सांस्कृतिक रूप में अपने को श्रीराम का वंशज मानते हैं। यह मॉरीशस, त्रिनिदाद, फिजी,आदि अनेक देशों में प्रचलित है, जहाँ भारतीय श्रमिक रामचरित मानस की छोटी प्रति को पूंजी के रूप में लेकर गए थे। रामलीला उनकी भावनाओं से जुड़ी रही। 

भारत में रामलीला के विविध रूप रंग हैं। लखनऊ में पिछले दिनों इस संबन्ध में चर्चा हुई। उत्तर प्रदेश के  राज्यपाल राम नाईक ने इसका उद्घाटन किया। रामलीला की नौटंकी शैली पर विशेष रूप से विचार किया गया। भारत के सुदूर व वनवासी क्षेत्रों तक इसे देखा जा सकता है।  रामायण एक अद्भुत ग्रंथ है। इसे लोग कथा, गीत, प्रवचन, कहानी तथा अन्य किसी न किसी रूप में प्रदर्शित कर आनन्दित होते हैं। राम कथा सुनना तथा देखना सागर में डुबकी लगाने जैसा होता है। विश्व की अनगिनत भाषाओं में राम कथा का लेखन हुआ है। 

रामलीला लोक नाटक का एक रूप है। यह गोस्वामी तुलसीदास की कृति रामचरितमानस पर आधारित है। रामलीला का मंचन तुलसीदास के शिष्यों ने सबसे पहले किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि उस दौरान काशी नरेश ने रामनगर में रामलीला कराने का संकल्प लिया था, तभी से रामलीला का प्रचलन देशभर में शुरू हुआ। 

नृत्य की विभिन्न शैलियों में भी  रामलीला होती है। दुनिया के पैंसठ देशों में रामलीला का मंचन होता है। इन सबका भाव एक है लेकिन प्रस्तुति विधि अलग अलग है। राम नाईक ने रामायण को अद्भुत कथा बताते हुए कहा कि राम का व्यक्तित्व हिमालय से ऊंचा एवं समुद्र से भी अधिक गहराई लिये हुए है। इसे सभी ने अपने-अपने ढंग से व्यक्त किया है। 

देखा जाए तो पुरानी एवं विलुप्त होती संस्कृति के माध्यम से रामायण का मंचन एवं नाट्य द्वारा प्रस्तुतिकरण अत्यन्त अनुकरणीय है। कला के माध्यम से जीवन में सम्मान एवं ऊंचाईयों को प्राप्त किया जा सकता है। श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। उनकी कथा का मंचन मनोरंजन के साथ ही प्रेरणादायक होता है।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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