छत्तीसगढ़ : नक्सलियों और उनके समर्थकों के मुंह पर तमाचा है मतदान प्रतिशत में वृद्धि!

आंकड़ों के हिसाब से पहले चरण की 18 सीटों पर रिकॉर्ड 76 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ है। ये आंकड़ा उन जगहों के मतदान का है जहाँ घर से बाहर कदम रखना भी खतरे से खाली माना जा रहा था। छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर मतदान के जरिये नक्सलियों और जब-तब उनके समर्थन में आवाज उठाने वालों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है।

छत्तीसगढ़ में पहले दौर के मतदान के साथ ही एक बात सामने आ गई है कि देश की जनता आगे के पांच राज्यों के चुनावों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाली है। छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने जिस तरह खुलकर मतदान किया है, उससे यही ज़ाहिर हो रहा है कि जनता धमकियों से डरती नहीं है और अपने मताधिकार के प्रयोग के लिए जोखिम भी मोल ले सकती है।

आंकड़ों के हिसाब से पहले चरण की 18 सीटों पर रिकॉर्ड 76 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ है। ये आंकड़ा उन जगहों के मतदान का है जहाँ घर से बाहर कदम रखना भी खतरे से खाली माना जा रहा था। छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर मतदान के जरिये नक्सलियों और जब-तब उनके समर्थन में आवाज उठाने वालों के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा है।

सांकेतिक चित्र

चुनाव परिणामों का अभी से विश्लेषण नहीं किया जा सकता है, लेकिन यह बात तमाम चुनावी सर्वे में निकलकर आई है कि वर्त्तमान मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह की लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं देखी जा रही है। तीन बार के मुख्यमंत्री रह चुके रमन सिंह पर प्रदेश के मतदाताओं का भरोसा बना हुआ है।

कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ़ की लड़ाई नेतृत्व के अभाव में एक हारी हुई बाज़ी की तरह लगती है। आप कहेंगे कि चुनाव के नतीजों से पहले ऐसा कैसे कहा जा सकता है? इसके लिए कुछ मजबूत तर्क भी हैं।कांग्रेस के पक्ष में न तो हवा दिख रही है न ही ज़मीनी समीकरण। दशकों तक कांग्रेस का चेहरा रह चुके अजित जोगी कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी ‘छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस’ के साथ मैदान में हैं। तिसपर उनके साथ बहुजन समाज पार्टी के भी चले जाने से कांग्रेस की रही सही उम्मीद पर भी ग्रहण लग चुका है।

छत्तीसगढ़ चुनाव में अजित जोगी कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में काफी हद तक सेंध लगाने में सक्षम हैं, साथ ही दलितों का जो वर्ग कांग्रेस के साथ रहा है, इस बार शायद कांग्रेस के साथ न जा सके। चुनावों के कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस के कार्यकारी प्रधान रामदयाल उइके कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में पहुँच गए।

अगर कांग्रेस चुनाव से पहले किसी तरह का गठबंधन बना लेती तो शायद लड़ाई के मैदान में बनी रहती लेकिन मौजूदा स्थिति में कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ गयी हैं, जिसका उसके ऊपर असर पड़ना तय है। पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस छत्तीसगढ़ बहुत कम मार्जिन से हारती रही है, लेकिन इस बार नक्सलियों का महिमामंडन करने वाली कांग्रेस  का दांव उल्टा पड़ गया नज़र आ रहा है।

नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में लोगों को चुनाव से अलग रहने का फरमान सुनाया था, लेकिन आम लोगों ने इस फरमान को सिरे से नकार दिया, इसका ज़िक्र इसलिए भी करना ज़रूरी है, क्योंकि कांग्रेस नेता राज बब्बर ने चुनाव से ठीक पहले नक्सालियों को क्रन्तिकारी बताया था। जाहिर है, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए बेहद कठिन रहने वाला है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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