चीन की चालबाजी से कर्ज में डूबे मालदीव को भारत देगा सहारा

मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति सोलिह कहा कि पिछली सरकार में सरकारी खजाने को जमकर लूटा गया। दरअसल मालदीव में चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत सड़क और हाउजिंग निर्माण के नाम पर लाखों डॉलर का निवेश किया है। इन प्रॉजेक्टों के कारण चार लाख से ज्यादा की आबादी वाला यह देश कर्ज में फंस गया है। नई सरकार चीन की कंपनियों मिले ठेकों की जांच करेगी। कर्ज में दबे मालदीव को इस संकट से निकालने का भरोसा प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है। मोदी ने सोलिह से कहा कि वे इस संकट से उबरने में मालदीव की हर संभव मदद करेंगे।

शपथ ग्रहण समारोह दो देशों के बीच औपचारिक वार्ता का अवसर नहीं होता। लेकिन नेकनीयत हो तो बेहतर संबंधों की बुनियाद अवश्य कायम हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मालदीव यात्रा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण रही। मोदी ने तो अपनी शपथ ग्रहण करने से पहले ही पड़ोसियों से अच्छे संबन्ध रखने का निर्णय लिया था। इसी के अनुरूप उन्होंने सार्क देशों को शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। यह मोदी की नेकनीयत थी, जिसने इसे समझा, उसके साथ भारत के रिश्ते ठीक रहे।

मालदीव की निवर्तमान सरकार चीन के इशारों पर चल रही थी। लेकिन नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को भारत का समर्थक माना जाता है। विपक्षी नेता के रूप में उन्होंने चीन के अत्यधिक हस्तक्षेप का विरोध किया था। यह आरोप लगाया था कि सरकार ने देश को चीन के कर्ज जाल में फंसा दिया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है। उनके इस सरकार विरोधी अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिला। मालदीव  में सत्ता परिवर्तन हुआ। चीन के प्रति अधिसंख्य लोगों ने नाराजगी दिखाई। इस प्रकार केवल सत्ता में ही बदलाव नहीं हुआ, बल्कि माहौल भी बदला है, जो भारत के अनुकूल है।

इस प्रकार नरेंद्र मोदी की मालदीव यात्रा को अवसर के अनुकूल कहा जा सकता है। वह नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने गए थे। इस परिवर्तित माहौल में मोदी का वहाँ जोरदार स्वागत हुआ। उनकी अगवानी नवनिर्वाचित संसद के अध्यक्ष ने की। समारोह में उन्हें सत्तारूढ ‘मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी’ के अध्यक्ष मोहम्मद नशीद और भारत के समर्थक रहे पूर्व राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम के साथ बैठाया गया था। गयूम को 2013 में बनी चीन समर्थक सरकार के समय परेशान किया जा रहा था।

मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति सोलिह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (साभार : न्यूज़ स्टेट)

इब्राहिम मोहम्मद सोहिल ने शपथ ग्रहण के बाद दिए भाषण में  केवल  भारत का नाम लिया। जबकि चीन के एक मंत्री, श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका भंडारनायके सहित छियालीस देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। समारोह के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति सोलिह के बीच एक अलग बैठक भी हुई। बीते समय में संबंधों में आए लचीलेपन के बाद दोनों देशों के नेताओं ने दोस्ती और विश्वास जाहिर करते हुए साथ मिलकर काम करने पर सहमति जताई। बैठक के दौरान दोनों नेता हिंद महासागर की सुरक्षा-शांति और क्षेत्र में स्थिरता के लिए एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति जागरुक होने पर सहमत हुए

समारोह के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति सोलिह के बीच एक अलग बैठक भी हुई। बीते समय में संबंधों में आए लचीलेपन के बाद दोनों देशों के नेताओं ने दोस्ती और विश्वास के अनुरूप सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया। इसके अलावा हिंद महासागर की सुरक्षा-शांति और क्षेत्र में स्थिरता के लिए एक-दूसरे की चिंताओं के प्रति जागरुक होने पर सहमत हुए। इससे जाहिर है कि नई सरकार मालद्वीप को चीन के नियंत्रण से मुक्त करने के प्रति कटिबद्ध है।

राष्ट्रपति सोलिह कहा कि पिछली सरकार में सरकारी खजाने को जमकर लूटा गया। चीन ने  वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत सड़क और हाउजिंग निर्माण के नाम पर लाखों डॉलर का निवेश किया है। इन प्रॉजेक्टों के कारण चार लाख से ज्यादा की आबादी वाला यह देश कर्ज में फंस गया। नई सरकार  चीन की कंपनियों मिले ठेकों की जांच करेगी। कर्ज में दबे मालदीव को इस संकट से निकालने का भरोसा प्रधानमंत्री मोदी ने दिया है। मोदी ने कहा कि वे इस संकट से उबरने में मालदीव की हर संभव मदद करेंगे। 

भारत के लिए मालदीव का सामरिक महत्व है। हिन्द महासागर में स्थित इस देश में बारह  सौ द्वीप हैं। चीन इन्हीं में अपने सैन्य ठिकाने बंनाने का प्रयास कर रहा था। भारत पर दबाव बनाने की रणनीति का यह हिस्सा था।अब्दुल्ला यामीन चीन के निवेश वाले जाल उलझ चुके थे।

मालदीव रवाना होने से पहले नरेंद्र मोदी ने नई सरकार के साथ बेहतर समझ और सहयोग का विश्वास व्यक्त किया था। उनका कहना था कि  आधारभूत संरचना, बुनियादी क्षेत्र, स्वास्थ्य देखभाल, संपर्क एवं मानव संसाधन आदि अनेक क्षेत्रों में मिल कर कार्य करने की व्यापक संभावना है। इस दृष्टि से मोदी की यात्रा को सफल माना जा सकता है। क्योंकि इसी भावना के अनुरूप वहां के नए राष्ट्रपति ने भी गर्मजोशी दिखाई है। निश्चित ही यह यात्रा मालदीव की नयी सरकार के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों को एक सही दिशा देने में कामयाब रही है।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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