राहुल का लगातार फजीहत के बावजूद राफेल-राफेल करना चुनावी मजबूरी के सिवा कुछ नहीं

संसद में बहस के दौरान यह साबित हो गया कि राहुल गांधी की रक्षा विषयों पर जानकारी शून्य है। वह बहस में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण या वित्त मंत्री अरुण जेटली को चुनौती नहीं दे सकते इसलिए बार-बार एक ही बात को दोहराते नजर आते हैं कि देश का चौकीदार चोर है या अनिल अम्बानी को ऑफसेट पार्टनर क्यों बनाया गया। हालाँकि अनिल अम्बानी से सम्बंधित आरोप को लेकर सरकार की तरफ से वस्तुस्थिति स्पष्ट की जा चुकी है।

पिछले दिनों संसद में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने राफेल रक्षा सौदे पर सरकार के पक्ष को बाखूबी उजागर कर कांग्रेस के झूठ को बेनकाब कर दिया। कांग्रेस की तरफ से फैलाए गए झूठ को खरीदने और बेचने वालों को इसके बाद समझ नहीं आ रहा कि झूठ के किस सिरे को पकड़ा जाए और किस सिरे को छोड़ दिया जाए। लेकिन राहुल हैं कि राफेल पर फैलाये जा रहे असत्य से किनारा करने को राजी नहीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल के मामले में केंद्र को क्लीन चिट दिए जाने के बाद अब कांग्रेस के पास और कोई और रास्ता नहीं बचता कि अपने रटे-रटाए झूठ को बार-बार दोहरा कर जनमानस को गुमराह करने की कोशिश की जाए। आपको नाजी सरकार के प्रचार मंत्री जोसेफ गोयबल्स का यह कथन तो पता ही होगा कि “एक झूठ को बार बार दोहराने से वह सत्य प्रतीत होने लगता है।”

कांग्रेस भी यही करने की कोशिश में लगी है, लेकिन इस चक्कर में उसकी लगातार किरकिरी ही होती नजर आ रही। बावजूद इसके ये मानकर चलिए कि असत्य का सहारा लेकर राहुल गाँधी चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं और वह उससे बाज नहीं आएंगे। चुनावी मजबूरी ही है कि वे लाख किरिकिरी के बावजूद राफेल-राफेल करने से बाज नहीं आ रहे।

सांकेतिक चित्र

यह वही नीति है जिसे कभी अरविन्द केजरीवाल ने राहुल गाँधी के कांग्रेस पर आजमाया था, “आरोप लगाओ और भागो।” हालांकि कांग्रेस सरकार के घोटालों के कारण केजरीवाल के पास तो लगाने के लिए पर्याप्त आरोप भी थे, मगर राहुल गांधी के पास तो ले-देकर बस एक राफेल का ही मुद्दा है।

संसद में बहस के दौरान यह साबित हो गया कि राहुल गांधी की रक्षा विषयों पर जानकारी शून्य है। वह बहस में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण या वित्त मंत्री अरुण जेटली को चुनौती नहीं दे सकते इसलिए बार-बार एक ही बात को दोहराते नजर आते हैं कि देश का चौकीदार चोर है या अनिल अम्बानी को ऑफसेट पार्टनर क्यों बनाया गया। हालाँकि इस आरोप को लेकर सरकार की तरफ से वस्तुस्थिति स्पष्ट की जा चुकी है।

राहुल के आरोपों में तथ्यों का कोई समावेश नहीं है। इधर उनके परिवार पर खुद नेशनल हेराल्ड घोटाले में शामिल होने का आरोप है, इसलिए भी उनकी कोशिश है कि राफेल को बहस के केंद्र में रखा जाए जिससे उनपर लगे आरोपों की तरफ देश का ध्यान न जाए।

सच्चाई यह है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी खुद नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं, इसलिए वह अपने आप को पाक-साफ़ कहते रहने का नैतिक अधिकार नहीं रखते। गांधी परिवार के लिए दूसरा सबसे बड़ा सिरदर्द है क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण का। मिशेल द्वारा किये गए खुलासे से गांधी परिवार की नींद हराम हो गई है।

राफेल पर देश के सर्वोच्च न्यायलय ने भी इस बात की ताकीद की है कि सौदे में कोई समस्या नहीं है। कांग्रेस की जुबान पर बार-बार अनिल अम्बानी का नाम लिया जाता है लेकिन यहाँ भी किसी तरह के लेन देन का कोई जिक्र नहीं है। अदालत ने भी अनिल अम्बानी के खिलाफ कोई सबूत नहीं पाए हैं।

राहुल गांधी का बार बार एक ही बात दोहराना कि उन्हें फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रंस्वा ओलांद ने कहा था कि ऑफसेट पार्टनर के चयन में भारत सरकार की भूमिका थी, लेकिन इसी बात पर डसॉल्ट के सीईओ के बयान का उल्लेख करना भी ज़रूरी है, जिसमें उन्होंने राहुल के दावों को खारिज किया था। कुल मिलाकर राफेल पर राहुल के झूठों की पोल खुलती जा रही है, बावजूद इसके वे अपनी जुबान पर रोक लगाने को राजी नहीं हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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