एकीकरण और पुनर्पूंजीकरण के जरिये बैंकों को मजबूती देने में जुटी मोदी सरकार

बैंकों के एकीकरण के बाद परिचालन लागत व दूसरे खर्चों में कमी, लाभ में बढ़ोतरी, जोखिम प्रबंधन में आसानी, प्रदर्शन में बेहतरी, पूँजी निर्माण में तेजी आदि संभव हो सकेंगे। इससे प्रशिक्षित मानव संसाधन में बढ़ोतरी, प्रशिक्षण के खर्च में कमी, पूँजी व संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि, धोखाधड़ी के मामलों में कमी आदि आने की संभावना हैं।

विजया बैंक और देना बैंक का एक अप्रैल को बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय हो जायेगा। देश में पहली बार तीन बैंकों का एकीकरण होगा। इस विलय से बनने वाला बैंक परिसंपत्ति के मामले में देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक और कुल मिलाकर तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) देश का सबसे बड़ा बैंक है जबकि दूसरे स्थान पर एचडीएफसी बैंक है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2 जनवरी, 2019 को विजया बैंक और देना बैंक के बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय को मंजूरी दे दी।

सरकार ने एक बयान में कहा कि बैंक ऑफ बड़ौदा हस्तांतरिती बैंक होगा, जबकि विजया बैंक और देना बैंक हस्तांतरणकर्ता बैंक होंगे। इसका यह अर्थ हुआ कि छोटे बैंकों का बड़े बैंक में विलय किया जायेगा और वह अपनी पहचान बरकरार रखेगा। इस तरह बैंक के नाम में बदलाव की संभावना नहीं है। 

साभार : मुंबई लाइव

सितंबर, 2018 तक इन तीनों बैंकों की संयुक्त परिसंपत्ति 10.44 लाख करोड़ रुपये थी। तब एसबीआई की कुल परिसंपत्ति 34.86 लाख करोड़ रुपये और एचडीएफसी बैंक की 11.70 लाख करोड़ रुपये थी। पिछले साल जून के आंकड़ों के मुताबिक बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक के कुल कर्मचारियों की संख्या 85,675 है और उनकी शाखाओं की संख्या करीब 9,500 है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि किसी भी कर्मचारी को नहीं निकाला जायेगा, लेकिन कुछ शाखाओं को बंद किया जा सकता है।  

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) को उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार विजया बैंक और देना बैंक के 1000 शेयरों पर निवेशकों को बैंक ऑफ बड़ौदा के क्रमश: 402 और 110 इक्विटी शेयर मिलेंगे। हालाँकि, अभी विलय के बाद बनने वाले बैंक में शीर्ष प्रबंधन की क्या स्थिति होगी, स्पष्ट नहीं है। देना बैंक के प्रमुख कर्णम शेखर, विजया बैंक के आरए शंकर नारायणन और बैंक ऑफ बड़ौदा के प्रमुख पीएस जयकुमार हैं।

हालाँकि, जानकारों का कहना है कि देना बैंक की वजह से विलय के बाद नये बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता कम होगी। यह भी कहा जा रहा है कि देना बैंक के एनपीए के कारण विलय के शुरुआती चरण में बैंक ऑफ बड़ौदा की वित्तीय स्थिति कमजोर होगी। साथ ही, प्रौद्योगिकी में बदलाव और एनपीए के लिये संभावित प्रावधान जरूरतों के कारण निकट भविष्य में बैंक का मुनाफा प्रभावित हो सकता है, लेकिन ऐसे परिणाम तात्कालिक होने की उम्मीद है। 

एकीकरण की दिशा में किये गये प्रयास

गौरतलब है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण पर वर्ष, 2003 के बाद कई बार विचार किया गया, लेकिन कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई जा सकी। मानव संसाधन, सूचना एवं प्रौधोगिकी, वेतन व भत्ते, प्रणाली, आदि में एकरूपता का नहीं होना इसका एक बहुत बड़ा कारण था।

यूनियन को एकीकरण के लिये राजी करना, मानव संसाधन का समायोजन, विसंगति की स्थिति में क्षतिपूर्ति की व्यवस्था आदि भी मामले में महत्वपूर्ण अड़चने थीं। एकीकरण के संबंध में आरएस गुजराल की अध्यक्षता में बनी समिति ने सरकार को अपनी रिपोर्ट जनवरी, 2012 में दी थी, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को आपस में मिलाकर 7 बड़े बैंक बनाने का सुझाव दिया गया था।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण का रोडमैप बैंक बोर्ड ब्यूरो ने तैयार किया था और इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को छह समूहों में बांटा गया था। बैंकों के समूहों का निर्णय मानव संसाधन, ई-गवर्नेस, आंतरिक लेखा-परीक्षा, धोखाधड़ी, सीबीएस (कोर बैंकिंग साल्यूशन) एवं वसूली को आधार बनाकर लिया गया था।

भारत में फिलहाल 7 बड़े आकार एवं पूँजी वाले बैंक हैं, लेकिन सरकार का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए देश में इनसे बड़े बैंकों की जरूरत है, जिनकी पहचान विश्वस्तरीय हो। गौरतलब है कि सहयोगी बैंकों एवं महिला बैंक के विलय के बाद भारतीय स्टेट बैंक वैश्विक स्तर पर 50 बड़े बैंकों की श्रेणी में आ गया है।

क्यों जरूरी है एकीकरण

मौजूदा परिप्रेक्ष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एकीकरण ही एकमात्र विकल्प है, क्योंकि बढ़ते एनपीए, बासेल तृतीय के विविध मानकों को पूरा करने का दबाव, बैंकों की आधारभूत संरचना को मजबूत करने आदि के लिये बैंकों को भारी-भरकम पूँजी की जरूरत है।

साथ ही, ग्राहकों को बेहतर सेवा और सुरक्षित बैंकिंग सुविधायें मुहैया कराना भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिये एक बड़ी चुनौती है। बैंकों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में न तो बैंक समर्थ हैं और न ही सरकार। बैंकों के एकीकरण से इस चुनौती से निपटा जा सकता है।  

बैंकों की समस्याओं को दूर करने के लिए पुनर्पूंजीकरण

सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के 7 बैंकों में पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के जरिये जल्द ही 28,615 करोड़ रुपये की पूंजी डालेगी। इस राशि से बैंक अपनी नियामकीय पूंजी की जरूरत को पूरा कर सकेंगे। इन 7 सरकारी बैंकों में से बैंक ऑफ इंडिया को सबसे अधिक 10,086 करोड़ रुपये मिलेंगे।

इसके बाद ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स को 5,500 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ महाराष्ट्र को 4,498 करोड़ रुपये मिलेंगे। यूको बैंक को 3,056 करोड़ रुपये और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को 2,159 करोड़ रुपये मिलेंगे। सरकार ने इससे पहले वित्त वर्ष 2018-19 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 65,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा की थी। इसमें से 23,000 करोड़ रुपये की राशि सरकारी बैंकों को दी जा चुकी है, जबकि 42,000 करोड़ रुपये अभी बैंकों को मिलने हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 41,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त तौर पर देगी, जो पहले की घोषित राशि से अलग होगी। इससे सरकारी बैंकों में केंद्र की तरफ से लगाई जाने वाली रकम 65 हजार करोड़ से बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये हो जायेगी।  

एकीकरण के फायदे

इसमें दो राय नहीं है कि बैंकों के एकीकरण के बाद परिचालन लागत व दूसरे खर्चों में कमी, लाभ में बढ़ोतरी, जोखिम प्रबंधन में आसानी, प्रदर्शन में बेहतरी, पूँजी निर्माण में तेजी आदि संभव हो सकेंगे। इससे प्रशिक्षित मानव संसाधन में बढ़ोतरी, प्रशिक्षण के खर्च में कमी, पूँजी व संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि, धोखाधड़ी के मामलों में कमी आदि आने की संभावना हैं। भारत जैसे बड़े एवं विविधितापूर्ण देश में बैंकिंग की सुविधा गली-मोहल्लों तक पहुंचाने के लिये ग्रामीण क्षेत्र से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराना सरकार के लिये आज भी एक बड़ी चुनौती है। एकीकरण के बाद ग्रामीण क्षेत्र में इनकी उपस्थिति में और भी इजाफा होगा। भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वरूप का ताना-बाना बड़े बैंक के अनुकूल है, क्योंकि बड़े बैंक ही इतने बड़े देश में समान रूप से बेहतर ग्राहक सुविधाएं मुहैया करा सकते हैं। वैश्विक उपिस्थिति होने से बैंकों के ग्राहकों को देश व विदेश दोनों जगहों पर समान रूप से सेवा मिल सकेगी।

कहा जा सकता है कि परिचालन एवं दूसरे खर्चों में कटौती को सुनिश्चित करने से बड़े बैंकों की लाभप्रदता में इजाफा होगा। पूँजी की उपलब्धता रहने से वे सस्ती दर पर ग्राहकों को कर्ज भी दे सकेंगे। पर्याप्त मानव संसाधन की मदद से एनपीए और जोखिम प्रबंधन के मोर्चे पर बड़े बैंक बेहतर काम कर सकेंगे, जिससे उनकी साख और लाभप्रदता दोनों में इजाफा होगा।

मौजूदा समय में छोटे बैंक पूँजी की कमी के कारण न तो अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग मानकों को पूरा कर पा रहे हैं और न ही सस्ती दर पर ग्राहकों को कर्ज उपलब्ध करा पा रहे हैं। एनपीए और जोखिम प्रबंधन में भी वे फिसड्डी साबित हो रहे हैं। ऐसे में एकीकरण के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हर मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के कॉरपोरेट केंद्र मुंबई के आर्थिक अनुसन्धान विभाग में कार्यरत हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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