सामान्य वर्ग आरक्षण : सामाजिक न्याय की दिशा में एक नयी पहल

मोदी सरकार की हर नीति का विरोध करने वाला विपक्ष, मोदी को रोकने के लिए अपने-अपने विरोधों को भुलाकर महागठबंधन तक बना कर एक होने वाला विपक्ष, आज समझ ही नहीं पा रहा कि वो मोदी के इस दांव का सामना कैसे करे। खास बात यह है कि अब आरक्षण का लाभ किसी जाति या धर्म विशेष तक सीमित न होकर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई-पारसी और अन्य अनारक्षित समुदायों को मिलेगा। यह देश के समाज की दिशा और सोच बदलने वाला वाकई में एक महत्वपूर्ण कदम है।

भारत की राजनीति का वो दुर्लभ दिन जब विपक्ष न चाहते हुए भी सरकार का समर्थन करने के लिए मजबूर हो गया, इसे क्या कहा जाए? कांग्रेस यह कह कर क्रेडिट लेने की असफल कोशिश कर रही है कि बिना उसके समर्थन के भाजपा सामान्य वर्ग आरक्षण बिल को पास नहीं करा सकती थी, लेकिन सच्चाई यह है कि बाज़ी तो मोदी ही जीतकर ले गए हैं। 

आजाद भारत के राजनैतिक इतिहास में 1990 और 2019 ये दोनों ही साल बेहद अहम माने जाएंगे। क्योंकि जब 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने देश भर में भारी विरोध के बावजूद मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर  “जातिगत आरक्षण” को लागू किया था, तो उनका यह कदम देश में एक नई राजनैतिक परंपरा की नींव बन कर उभरा था – समाज के बंटवारे पर आधारित जातिगत विभाजित वोट बैंक की राजनीति की नींव। इस लिहाज से 8 जनवरी 2019 की तारीख़ उस  ऐतिहासिक दिन के रूप में याद की जाएगी जिसने उस राजनीति की नींव ही हिला दी।

सांकेतिक चित्र

क्योंकि मोदी सरकार ने ना केवल संविधान में संशोधन करके, आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है बल्कि भारत की राजनीति की दिशा बदलने की एक नई नींव भी रख दी है। यह जातिगत वोटबैंक आधारित राजनीति पर केवल राजनैतिक ही नहीं कूटनीतिक विजय भी है।

इसे मोदी की कूटनीतिक जीत ही कहा जाएगा कि जिस वोटबैंक की राजनीति सभी विपक्षी दल अब तक कर रहे थे, आज खुद उसी का शिकार हो गए। यह वोटबैंक का गणित ही था कि देश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण लागू करने हेतु 124वाँ संविधान संशोधन विधेयक राजयसभा में भाजपा अल्पमत में होते हुए भी  पारित करा लें जाती है।

मोदी सरकार की हर नीति का विरोध करने वाला विपक्ष, मोदी को रोकने के लिए अपने-अपने विरोधों को भुलाकर महागठबंधन तक बना कर एक होने वाला विपक्ष, आज समझ ही नहीं पा रहा कि वो मोदी के इस दांव का सामना कैसे करे। खास बात यह है कि अब आरक्षण का लाभ किसी जाति या धर्म विशेष तक सीमित न होकर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई पारसी और अन्य अनारक्षित समुदायों को मिलेगा। यह देश के समाज की दिशा और सोच बदलने वाला वाकई में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में हर विषय पर राजनीति होती है। शायद इसलिए कुछ लोगों का कहना है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का यह फैसला एक राजनैतिक फैसला है जिसे केवल आगामी लोकसभा चुनावों में राजनैतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से लिया गया है। तो इन लोगों से एक प्रश्न है कि यदि इससे भाजपा को राजनीतिक लाभ भी होता है, तो उसमें गलत क्या है? कम से कम वर्तमान सरकार का यह कदम विपक्षी दलों के उन गैर जिम्मेदाराना कदमों से तो बेहतर ही है जो देश को धर्म-जाति-सम्प्रदाय के नाम पर बांट कर समाज में वैमनस्य बढ़ाने का काम करते हैं और नफरत की राजनीति करते हैं।

लेकिन अब जाति या सम्प्रदाय सरीखे सभी भेदों को किनारे करते हुए केवल आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ने सामाजिक न्याय की दिशा में एक नई पहल का आगाज़ किया है। समय के साथ चलने के लिए समय के साथ बदलना आवश्यक होता है। आज  जब आरक्षण की बात हो रही हो तो यह जानना भी जरूरी है कि आखिर इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी।

दरअसल जब देश में आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी तो उसके मूल में समाज में पिछड़े वर्गों के साथ होने वाले अत्याचार और भेदभाव को देखते हुए उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए मंडल आयोग द्वारा कुछ सिफारिशें की गई थीं, जिनमें से कुछ एक को संशोधन के साथ अपनाया गया था। लेकिन आज इस प्रकार का सामाजिक भेदभाव  और शोषण भारतीय समाज में लगभग नहीं के बराबर है।

और आज आरक्षण जैसी सुविधा के अतिरिक्त देश के इन शोषित-दलित-वंचित वर्गों के साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव अथवा अन्याय को रोकने के लिए अनेक सशक्त एवं कठोर कानून मौजूदा न्याय व्यवस्था में लागू हैं जिनके बल पर सामाजिक पिछड़ेपन की लड़ाई हम लोग काफी हद तक जीत चुके हैं।

अब लड़ाई है शैक्षणिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन की। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करते हुए आर्थिक आधार पर आरक्षण की अलग व्यवस्था की है जो अब समाज में आरक्षण के भेदभाव को ही खत्म कर के एक सकारात्मक माहौल बनाने में निश्चित रूप से मददगार होगी। चूंकि अब समाज का हर वर्ग ही आरक्षित हो गया है, तो आए दिन समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा आरक्षण की मांग और राजनीति पर भी लगाम लगेगी।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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