क्या देश की छवि खराब करने दुबई गए थे राहुल गांधी?

राहुल ने अरब मुल्क की सहिष्णुता की तारीफ करके अपने देश को नीचा दिखाया है। उन्होंने कहा कि यह संयोग है कि सयुक्त अरब में सहिष्णुता वर्ष मनाया जा रहा है, लेकिन हमारे देश में साढ़े चार साल से असहिष्णुता का दौर जारी है। राहुल की इस शब्दावली पर गौर कीजिए। अरब मुल्कों की प्रशंसा और भारत की निंदा में उन्हें रंचमात्र शर्मिंदगी नहीं हुई।

कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए। इसका निहितार्थ था कि राजनीतिक विरोध की एक सीमा होनी चाहिए। जहां राष्ट्रहित का प्रश्न हो वहां केवल आपसी सहमति का प्रदर्शन होना चाहिए। वैश्वीकरण के इस दौर में किसी देश की वैश्विक साख का बहुत महत्व है। इससे उसके राष्ट्रीय हित जुड़े होते हैं। इसी आधार पर वहां निवेश होता है, पर्यटक आते हैं, इसका आर्थिक लाभ संबंधित देश को होता है। परोक्ष-अपरोक्ष रोजगार को बढ़ावा मिलता है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी के लिए बहुत बेकरार रहते हैं। इसीलिए वह मोदी द्वारा किये गए प्रयोगों को भी आजमाने में पीछे नहीं रहना चाहते। लेकिन जब दो नेताओं की क्षमता में अंतर होता है, तब ऐसे प्रयोगों के परिणाम भी अलग-अलग दिखाई देते हैं। 

साभार : आज तक

नरेंद्र मोदी विदेशों में भरतीय समुदाय को सम्बोधित करते रहे हैं, लेकिन अपने संबोधन में उनका जोर राष्ट्रीय हितों पर रहता है। यूपीए सरकार के समय घोटालों के कारण विश्व मे भारत की छवि बिगड़ी थी। निवेश बन्द हो गए थे। इसलिए मोदी यह कहते थे कि देश में अब स्थितियां सुधर गई हैं। मोदी देश को छवि को निखारने के कार्य करते हैं। जबकि राहुल गांधी ने मोदी के इवेंट की नकल तो की, लेकिन देश की छवि पर ही प्रहार कर बैठे। कहा कि भारत में बहुत असहिष्णुता है, भारत आर्थिक रूप से बदहाल हो चुका है।

ऐसे में, विचार का मुद्दा यह है कि क्या राहुल गांधी ने विदेशी जमीन पर राष्ट्रीय हितों के अनुरूप आचरण किया है। सरकार, भाजपा, प्रधानमंत्री सभी पर उनको हमले का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं हो सकता। राहुल गांधी दुबई में नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना कर रहे थे। यहां तक गनीमत थी। लेकिन राहुल इस आलोचना को वहां तक ले गए, जिससे देश के हितों को नुकसान पहुंच सकता है। उनके कुछ शब्दों पर गौर करिए।

राहुल ने कहा कि देश में असहिष्णुता बहुत बढ़ गई है। इसके लिए राहुल चार वर्षों से दो तीन घटनाओं का उल्लेख करते रहे हैं। इन सबपर कानूनी कार्रवाई की गई। यह भारत की छवि से जुड़ा विषय नहीं है। लेकिन जब राहुल विदेशी धरती पर कहते हैं कि भारत में असहिष्णुता बढ़ गई है, तब यह बात राष्ट्रीय छवि को धूमिल करने वाली होती है।

इससे सन्देश जाता है कि पूरे देश में असहिष्णुता का माहौल है। राहुल को भारत की मूल प्रवृत्ति समझनी चाहिए। विशाल विविधता के बाद भी ऐसी सहिष्णुता विश्व के किसी देश में नहीं है। चंद अप्रिय घटनाओं के लिए पूरे देश को बदनाम करना, वो भी विदेशी जमीन पर जाकर, निंदनीय है।

राहुल गांधी यहीं तक नहीं रुके। देश के सामाजिक माहौल को असहिष्णु बताने के बाद उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर अपने ज्ञान का प्रदर्शन शुरू कर दिया। बोले कि नोटबन्दी और जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है। क्या इस कथन का यह अभिप्राय दुबई सहित पूरी दुनिया में नहीं जाएगा कि भारत की अर्थव्यवस्था बदहाल है, इसलिए निवेशकों को इससे दूर रहना चाहिए।

नोटबन्दी और जीएसटी के अलावा उनके पास बोलने को कुछ नहीं है। नोटबन्दी के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए थे। उसी समय से राहुल नोटबन्दी को मुद्दा बनाये हुए है। मतदाताओं ने उन्हें सात सीट देकर जबाब दे दिया था। जीएसटी पारित कराने में वह साथ थे। लेकिन जब देखा कि इसे लागू करने में कठिनाई आएगी, तब भाग खड़े हुए।

जीएसटी काउंसिल में कांग्रेस के भी मुख्यमंत्री हैं। सभी निर्णयों में उनकी भी सहमति रहती है। वैसे सरकार जिस प्रकार सुधार के प्रयास कर रही है, उससे जीएसटी का मुद्दा राहुल के हाथ से निकल जायेगा। इसमें भी राहुल ने दुनिया की तारीफ और अपने देश की खराब तस्वीर पेश की।

विडंबना देखिये कि राहुल ने अरब मुल्क की सहिष्णुता की तारीफ करके अपने देश को नीचा दिखाया है। उन्होंने कहा कि यह संयोग है कि सयुक्त अरब में सहिष्णुता वर्ष मनाया जा रहा है, लेकिन हमारे देश में साढ़े चार साल से असहिष्णुता का दौर जारी है। राहुल की इस शब्दावली पर गौर कीजिए। अरब मुल्कों की प्रशंसा और भारत की निंदा में उन्हें रंचमात्र शर्मिंदगी नहीं हुई।जाहिर है कि राहुल का भाषण भारत की छवि और दूरगामी हितों पर आघात करने वाला था। देश में उनकी ये तथ्यहीन और अनर्गल बातें एकबार के लिए चल सकती हैं। लेकिन विदेशी जमीन पर उनको गंभीरता दिखानी चाहिए।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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