लोकतंत्र के लिए आपातकाल और परिवारवाद जैसे संकटों के प्रति शुरू से आशंकित थे बाबा साहेब !

बाबा साहेब जहाँ लोकतांत्रिक संविधान के खोने के डर से आशंकित थे, वहीं तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें यह भी भय सता रहा था कि कहीं आगे चलकर देश में तानाशाही अपने पैर न फैला ले। बाबा साहेब 1947 से लेकर 1951 तक नेहरू सरकार में कानून मंत्री थे, उस दौर में उन्हें इस बात का भी एहसास था कि जिन मूल्यों को लेकर वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, उनका विरोध करने वाले सरकार के अन्दर ही मौजूद थे। उनका इशारा भविष्य में नेहरू के परिवारवाद की तरफ भी था, आज हम देख सकते हैं कि उनका यह आकलन शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ।

भारतीय गणतंत्र अपनी 70वीं वर्षगाँठ मना रहा है। यह कई मायनों में भारत की बहुविध संस्कृति और परम्पराओं को साझे तौर पर मनाने का महापर्व है। राजनीतिक व्यवस्था के संचालन के लिए हमने कुछ मूल्यों और शर्तों को तय किया, जो हमारे संविधान की मूल आत्मा है। क्षुद्र स्वार्थ और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर हमने सामाजिक और राजनीतिक समानता की राह पर चलने का संकल्प लिया था, ताकि समतामूलक समाज की स्थापना संभव हो सके। भारतीय गणतंत्र के लिए अपनी स्थापना से अबतक का सफर कतई आसान नहीं रहा है। आपातकाल जैसा दंश भी इसने झेला है।

आज गणतंत्र दिवस मनाते हुए जब हम इतिहास की तरफ नजर घुमाते हैं, तो  25 नवम्बर 1949 को बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर का वो भाषण याद आता है, जिसमें उन्होंने लोकतंत्र के लिए कुछ खतरों का ज़िक्र किया था। आंबेडकर के उस भाषण में भविष्य की जिन आशंकाओं का ज़िक्र था, उन्हें संविधान लागू होने के कुछ ही वर्षों बाद कमोबेश घटित होते हुए देश ने देख भी लिया।

बाबा साहेब जहाँ लोकतांत्रिक संविधान के खोने के डर से आशंकित थे, वहीं तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें यह भी भय सता रहा था कि कहीं आगे चलकर देश में तानाशाही अपने पैर न फैला ले। बाबा साहेब 1947 से लेकर 1951 तक नेहरू सरकार में कानून मंत्री थे, उस दौर में उन्हें इस बात का भी एहसास था कि जिन मूल्यों को लेकर वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, उनका विरोध करने वाले सरकार के अन्दर ही मौजूद थे। उनका इशारा भविष्य में नेहरू के परिवारवाद की तरफ भी था, आज हम देख सकते हैं कि उनका यह आकलन शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के शासनकाल में ही भारतीय संविधान में 17 संशोधन हो गए। सोचने वाली बात है कि जब संविधान निर्माण में नेहरू स्वयं सम्मिलित रहे थे, तब संविधान लागू होने के दशक भर में ही उनकी सरकार द्वारा इतने संशोधन क्यों किए गए ? क्या संविधान के प्रावधान अगले दस वर्ष के हिसाब से सोचकर भी नहीं बनाए गए थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि नेहरू सरकार द्वारा उसे अपने मनोनुकूल बनाने के लिए उसमें इतने संशोधन किए गए। ये कुछ सवाल खड़े होते ही हैं।

अब जो भी हो, मगर भारत में संविधान को सबसे बड़ा धक्का तब लगा जब 1975 में इंदिरा गाँधी ने संविधान और लोकतंत्र को धता बताते हुए देश पर आपातकाल थोप दिया। समूचे विपक्ष को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय गणतंत्र का काला दिन बताया। इंदिरा गाँधी ने कहा था कि वह देश से गरीबी हटाने का प्रयास करने जा रही थीं, लेकिन उनके खिलाफ साजिश की गई।

इंदिरा गाँधी के शासन के दौरान हमने देखा कि किस तरह से भारत की जनता के मौलिक अधिकार छीन लिए गए। लोकतान्त्रिक देश ने तानाशाही का शर्मनाक और वीभत्स नजारा देखा। बाबा साहेब की आशंका सत्य सिद्ध हुई थी। खैर, आपातकाल की इस घटना से भारत ने सीख लिया और चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह से पराजित होना पड़ा। जनता ने सन्देश दिया कि भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति न हो।

ऐसी ही तमाम चुनौतियों से दो-चार होता हुआ हमारा यह गणतंत्र आज यहाँ तक पहुँचा है। आज भारतीय गणतंत्र बेहतर स्थिति में नज़र आता है। बीते वर्षों में संप्रग सरकार के घोटालों और नीतिपंगुता के कारण लोक और तंत्र के बीच जो अविश्वास की खाई पैदा हो गयी थी, वो अब मौजूदा सरकार के प्रयासों से धीरे-धीरे पटती जा रही है। ये भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। हालांकि अभी हमारे लोकतंत्र में लोक और तंत्र दोनों के समक्ष कई चुनौतियां हैं, जिन्हें हमें साथ मिलकर दूर करना होगा और निश्चित रूप से हम इस दिशा में प्रयास कर भी रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)