राफेल पर द हिन्दू के ‘अर्धसत्य’ को लेकर उछल रही कांग्रेस फिर औंधे मुंह गिरी है!

यह प्रश्न बना हुआ है कि इस तरह का अर्धसत्य छापने के पीछ अखबार का आखिर क्या उद्देश्य था? क्या सिर्फ खबर को सनसनीखेज बनाना या फिर इसके अलावा भी कोई मंशा थी? अब जो भी हो, लेकिन इस अखबारी रिपोर्ट के आधार पर राफेल मामले में मोदी सरकार को घेरने की कांग्रेसी कोशिश फिर एकबार विफल होती दिख रही है। मगर चुनाव जबतक बीत न जाएं, तबतक कह नहीं सकते कि इस मामले में अभी ऐसे कितने और अर्धसत्य या असत्य देखने को मिलेंगे।

चुनाव का मौसम भी काफी दिलचस्प होता है, जिसमें विरोधी एकदूसरे पर हमला करने के छोटे से छोटे मौके की ताक में रहते हैं। यह खबर आम है कि कांग्रेस राफ़ेल की खरीद को लेकर नित नए इल्ज़ाम लगाने की ताक में रहती है, भले ही उसके लिए झूठ का ही सहारा क्यों न लेना पड़े।  लेकिन मज़ेदार बात यह है कि झूठ पकड़े जाने के बाद भी कांग्रेस झूठ बोलना नहीं छोड़ती, जाने क्यों उसे लगता है कि जनता उसके द्वारा छोड़े जा रहे शिगूफे को गंभीरता से भी लेती है।

बीते शुक्रवार (8 फरवरी, 2019) को अंग्रेजी अख़बार “द हिन्दू” ने बड़ा दावा किया कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा डिफेन्स सौदों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही थी। अख़बार की तरफ से फ्रंट पेज पर एक बड़ी खबर भी लगाई गई, लेकिन जल्द-ही सामने आ गया कि तथ्यों को आधा-अधूरा, कांट-छांट कर परोसा गया है।

एएनआई द्वारा जारी पूरा पत्र और द हिन्दू में छपा अधूरा पत्र (फोटो साभार : Firstpost)

सवाल यहाँ पत्रकार के सम्पादकीय विवेक पर जितना है, उससे कहीं ज्यादा उसकी खबर के राजनीतिक मायने पर भी है। हिन्दू अख़बार ने जिस नोटिंग को आधार बनाकर खबर लिखी, उसमें उसने एक बड़ा ज़बर्दस्त खेल कर दिया। अखबार ने सवाल वाला एक हिस्सा तो रहने दिया, लेकिन जवाब में रक्षा मंत्रालय ने जो कहा, वो गायब कर दिया। उसपर ढिठई देखिये कि ऐसा करने को संपादक महोदय अपना विशेषाधिकार बता रहे हैं। 

कांग्रेस तो जैसे मौके की ताक में थी। खबर आई नहीं कि उसने आधी-अधूरी रिपोर्ट को आधार बनाकर सियासी गलियारे में तूफ़ान लाने की कोशिश की, लेकिन यह तूफान एक छोटे से गुबार में बदल गया जब प्रमुख मीडिया एजेंसी एएनआई ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के उस बयान को सामने ला दिया जिसे हिन्दू अख़बार ने  काटकर बाहर कर दिया था। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि जब फ्रांस सरकार से रक्षा मंत्रालय बात कर रहा था तो उसमें पीएमओ के हस्तक्षेप की क्या जरूरत थी।

राफेल डील की नेगोशिएटिंग टीम में शामिल एसबीपी सिन्हा ने इस खबर के छपने के बाद कहा कि अखबार की खबर में जान बूझकर रक्षा मंत्री के नोटिंग को हटा दिया गया ताकि खबर को सनसनीखेज बनाया जा सके। सिन्हा ने यह भी स्पष्ट किया कि इस नोट का सौदे की नेगोशिएशन पर कोई असर नहीं पड़ा। 

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि “अख़बार ने पत्रकारीय मूल्यों का पालन नहीं किया। अखबार अगर चाहता था कि सच्चाई निकलकर सामने आए तो उसे पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के उस बयान को भी शामिल करना चाहिए था, जिसमें उन्होंने साफ़ साफ़ लिखा था कि चिंता की कोई बात नहीं है और चीजें अच्छी तरह से आगे बढ़ रही हैं।”

निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा इस मुद्दे को सनसनीखेज तरीके से उठाये जाने की तुलना एक मरे हुए घोड़े को चाबुक मारने से किया, जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता। खबर छपने के एक दिन बाद आज उसी अखबार ने अपने फ्रंट पेज पर पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के बयान के उस हिस्से को छापा है, जिसको लेकर खबर की मंशा पर सवाल उठाए गए थे।

परन्तु यह प्रश्न बना हुआ है कि इस तरह का अर्धसत्य छापने के पीछ अखबार का आखिर क्या उद्देश्य था? बहरहाल इस अखबारी रिपोर्ट के आधार पर राफेल मामले में मोदी सरकार को घेरने की कांग्रेसी कोशिश फिर विफल होती दिख रही है। मगर चुनाव जबतक बीत न जाएं, तबतक कह नहीं सकते कि इस मामले में अभी ऐसे कितने और अर्धसत्य या असत्य देखने को मिलेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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