महागठबंधन: हर हप्ते बदल रहा विपक्ष का प्रधानमंत्री उम्मीदवार

मोदी की जीत के पीछे निर्णायक वजह क्या रही, इस पर दो राय हो सकती हैं, लेकिन यह साफ़ है कि मोदी ने जनता के सामने ईमानदारी से अपनी नीतियों को रखा और भविष्य का खाका देश के सामने रखा। अब 2019 के इस चुनाव में उनको हराने के लिए जो विपक्षी जुटान हो रहा है, उससे जाहिर है कि पांच साल की सरकार के बाद भी मोदी की लोकप्रियता कमजोर नहीं पड़ी है।

चुनाव से पहले देश की राजनीति बहुत हो रोचक दौर में प्रवेश कर गई है। विपक्षी गठबंधन का आलम यह है कि विपक्ष की तरफ से हर हफ्ते प्रधानमंत्री पद के नए दावेदार सामने आ रहे हैं। आज उन्हीं नामों की चर्चा जो प्रधानमंत्री पद की रेस में बने हुए हैं।कांग्रेस देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी है (संसद में वैसे कांग्रेस को विपक्षी दल का स्टेटस हासिल नहीं है), जिसके अध्यक्ष राहुल गाँधी पिछले कई सालों से प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लगातार बने हुए हैं।

लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि तथाकथित गठबंधन के सहयोगी दल उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार मानने की बात तो दूर सभा में बुलाने से भी गुरेज़ करते हैं। राहुल गाँधी ने अब यह महसूस कर लिया है कि पीएम पद की रेस की डगर इतनी आसान नहीं है। इसलिए वह विपक्षी पार्टी के किसी भी धरने में शामिल होने से परहेज़ नहीं करते।

पीएम के रेस में कई परमानेंट नेता भी हैं। मायावती प्रधानमंत्री पद की रेस में गंभीरता से बनी हुई हैं, वैसे उन्होंने कह रखा है वह 2019 के बाद राजनीति से संन्यास  ले रही हैं। उनके लिए यह आखिरी मौका है। उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी का जनाधार खिसक चुका है, लेकिन उन्हें यकीन है कि वह देश की पहली दलित प्रधानमंत्री ज़रूर बन सकती हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी किसी सुपर चीफ मिनिस्टर से कम नहीं। वह अपनी आक्रामक अंदाज़ की वजह से हमेशा जानी जाती हैं। अरविन्द केजरीवाल के अलावा वह ऐसी दूसरी मुख्यमंत्री हैं जो सीएम पद पर रहकर भी धरने पर बैठने में संकोच नहीं करती।

ममता पिछले दिनों अपने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सीबीआई की जांच से बचाने के लिए धरने पर बैठ गईं, ऐसा शायद इतिहास में पहली बार ही हुआ होगा। ममता जब क्रोध में होती हैं तो शायद भूल जाती हैं कि वह एक प्रदेश की सीएम भी हैं। दीदी ने पिछले हफ्ते कोलकाता में विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लगाकर पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी पुख्ता कर ली।

नेताजी मुलायम सिंह को भी नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए, वह पीएम पद की रेस में कई सालों से लगातार बने हुए हैं। उनके साथ कितने लोग हैं, इसका पता नहीं, लेकिन समाजवादी नेता ने अभी तक पीएम बनने का सपना नहीं छोड़ा है।पिछली एनडीए सरकार का हिस्सा रह चुके चंद्रबाबू नायडू भी पिछले कुछ महीनों से पीएम बनने की अपनी आकांक्षाओं को दबा नहीं पा रहे हैं। उनके बारे में यह जगजाहिर है कि वह मौका देखकर चौका लगाने में माहिर हैं।

पिछले दिनों पीएम की रेस में एक और नाम जुड़ गया है प्रियंका गाँधी का, जिन्होंने कांग्रेस में सीधे जनरल सेक्रेटरी का पद ज्वाइन किया है। कहा जा रहा है कि अगर राहुल गाँधी के नेतृत्व में बाकि पार्टियां उनके नीचे नहीं आईं तो प्रियंका गाँधी एक सरप्राइज कैंडिडेट बन सकती हैं।

भारत में 1989 से लेकर 2009 के बीच भारत में सात लोक सभा चुनाव हुए लेकिन किसी भी चुनाव में प्रमुख राजनीतिक दल, कांग्रेस या बीजेपी को बहुमत हासिल नहीं हुआ। वर्ष 2014 भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कालखंड के तौर पर आया जब देश ने एक गैर कांग्रेसी दल के हाथों सत्ता की बागडोर सौंप दी। गुजरात के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी को भारत की जनता ने सिर आँखों पर बिठाया और हिंदुस्तान की कुर्सी पर बिठा दिया।

इतिहास में यह एक ऐसा समय था, जब पहली बार कांग्रेस अपने सबसे न्यूनतम 44 सीटों के आंकड़ें पर सिमट गई। मोदी की जीत के पीछे निर्णायक वजह क्या रही, इस पर दो राय हो सकती हैं, लेकिन यह साफ़ है कि मोदी ने जनता के सामने ईमानदारी से अपनी नीतियों को रखा और भविष्य का खाका देश के सामने रखा। अब 2019 के इस चुनाव में उनको हराने के लिए जो विपक्षी जुटान हो रहा है, उससे जाहिर है कि पांच साल की सरकार के बाद भी मोदी की लोकप्रियता कमजोर नहीं पड़ी है।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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