आरबीआई द्वारा रेपो दर में कमी से अर्थव्यवस्था को और अधिक गति मिलने की संभावना

रिजर्व बैंक ने नये गवर्नर की अगुआई में रेपो दर में कटौती करके समीचीन फैसला किया है। अब बारी है बैंकों की। अगर बैंक कर्ज ब्याज दर में कटौती करते हैं तो इसका सीधा फायदा कर्जदारों को मिल सकता है साथ ही साथ इससे रोजगार सृजन में इजाफा तथा अर्थव्यवस्था को भी और अधिक गति मिल सकती है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने ताजा मौद्रिक नीति की समीक्षा में ब्याज दरों पर पहले से बरती जा रही निष्क्रियता की नीति में सुधार लाने की कोशिश की है। नवनियुक्त गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में हुई बैठक में समिति ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की कटौती की है।

कटौती के पक्ष में 4 मत पड़े, जबकि विरोध में 2 मत। विरल आचार्य और चेतन घाटे ने नीतिगत दर को 6.5 प्रतिशत पर बनाये रखने के पक्ष में मतदान किया।  दास ने कहा कि महंगाई दर कम बनी हुई है। खाद्य मूल्य के संकेतक आने वाले दिनों में निचले स्तर पर बने रहेंगे। ऐसे में यह जरूरत है कि निष्क्रियता खत्म की जाये और वृद्धि के लिए एक सकारात्मक माहौल तैयार किया जाये।  

भारतीय रिज़र्व बैंक

5 और 7 फरवरी को हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक के ब्योरे से पता चलता है कि 6 सदस्य इस बात को लेकर निश्चित थे कि आने वाले महीनों में महंगाई दर निचले स्तर पर बनी रहेगी। हालांकि, उनके बीच इस बात को लेकर मतभेद थे कि यह किस स्तर पर होगी और कितने समय तक ऐसी स्थिति बनी रहेगी। सदस्यों को यह भी भरोसा था कि कच्चे तेल के दाम कम स्तर पर स्थिर होंगे और खाद्य पदार्थों के भाव में भी आने वाले दिनों में कोई बदलाव नहीं होगा।

रिजर्व बैंक को महंगाई दर कम रहने के कई संकेत मिले थे। महंगाई की भविष्य की गति खाद्य मूल्यों पर निर्भर होगी, लेकिन आने वाले दिनों में खाद्यान्न के दाम कम होने की संभावना कम है, जबकि आपूर्ति की कमी की कोई संभावना नहीं बन रही है। फिलहाल, वृद्धि की राह में सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक गतिविधियों की अनिश्चितता है, लेकिन इसकी वजह से कब और कैसे महंगाई बढ़ने का सिलसिला जोर पकड़ेगा, इसका ठीक-ठीक आकलन नहीं किया जा सकता है। ऐसे में सकारात्मक नीतिगत फैसला करना रिजर्व बैंक के लिये अहम हो गया था। यह अर्थव्यवस्था को झटकों से बचाने के लिये जरूरी था। इस कदम से घरेलू अर्थव्यवस्था के वृद्धि के मार्ग प्रशस्त हो सकते हैं।  

मौद्रिक समिति के बाहरी सदस्य ढोलकिया वृद्धि के लिये दरों के समर्थन की मजबूती से वकालत कर रहे थे। वे दरों में 50-60 आधार अंकों की कटौती की संभावना देख रहे थे। ढोलकिया ने कहा कि दरों में कटौती की सख्त जरूरत है और नीतिगत दरें 25 आधार अंक कम करके इसकी शुरुआत की जानी चाहिए, जबकि रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमत में कमी देख रहे थे। फिर भी , वे दरों में कटौती का फैसला तत्काल में नहीं लेना चाहते थे। आचार्य के अनुसार कच्चे तेल के दाम अब कम हैं, लेकिन इसकी कीमत में बदलाव कभी भी हो सकता है। 

आचार्य के अनुसार सबसे अहम यह है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में कमी के मसले पर कृषि क्षेत्र में तनाव के जोखिम के आधार पर भी विचार किया जाना चाहिए। मौजूदा स्थिति के आधार पर कहा जा सकता है कि रिजर्व बैंक ने नये गवर्नर की अगुआई में नीतिगत दर में कटौती करके समीचीन फैसला किया है। अब बारी है बैंकों की। अगर बैंक कर्ज ब्याज दर में कटौती करते हैं तो इसका सीधा फायदा कर्जदारों को मिल सकता है साथ ही साथ इससे रोजगार सृजन में इजाफा और अर्थव्यवस्था को भी गति मिल सकती है।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के कॉर्पोरेट केंद्र मुंबई के आर्थिक अनुसन्धान विभाग में कार्यरत हैं। दशकों से स्वतंत्र लेखन कर रहे। प्रस्तुत विचार  उनके निजी हैं।)

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