पाकिस्तान परस्त भाषा बोल रहे कांग्रेसियों पर राहुल गांधी के मौन का मतलब क्या है?

दिक्कत यह भी है कि कांग्रेस के नेताओं द्वारा एयर स्ट्राइक पर जिस तरह से पाकिस्तान के प्रवक्ता जैसी भूमिका निभाई जा रही, उसपर कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व मौन है। इन नेताओं पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गयी है। ऐसे में यह सवाल उठाना जायज है कि क्या इन बयानों को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की स्वीकृति मिली हुई है?

जहां एक तरफ देश पुलवामा हमले के जवाब में भारतीय वायुसेना द्वारा की गई एयर स्‍ट्राइक को लेकर गर्वित है, वहीं देश के भीतर विघ्‍नसंतोषी तत्‍व इस साहसी कार्यवाही पर ही सवाल उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ममता बनर्जी, नवजोत सिद्धू, दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने स्‍ट्राइक के सबूत मांगकर स्‍वयं के देश विरोधी होने का संकेत तो दे ही दिया था कि अब फिर इस दुष्‍चक्र में नया जोड़ आ गया।

राहुल गांधी और सैम पित्रोदा (साभार : DNA India)

कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के खास माने जाने वाले सैम पित्रोदा ने भी बालाकोट में जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी ठिकानों को नष्‍ट किए जाने की कार्यवाही पर सवाल उठा दिया। उन्‍होंने मारे गए आतंकियों की संख्‍या पर ज़ोर देते हुए सरकार से तथ्‍य मांगे और कहा कि आतंकियों की संख्‍या स्‍पष्‍ट की जाए। पित्रोदा ने कहा है कि यदि भारतीय वायुसेना ने 300 आतंकी मारे हैं तो इसे साबित भी किया जाए। उनके अनुसार उन्‍हें वायुसेना की कार्यवाही के बारे में जानने का अधिकार है।

पित्रोदा के ताजा बयान से अफसोस जरूर होता है, लेकिन आश्‍चर्य नहीं होता। अफसोस इसलिए होता है कि सेना और सरकार की मंशा पर सवाल उठाने वालों की फेहरिश्त में ये एक नाम और जुड़ गया। लेकिन पित्रोदा के बयान से आश्‍चर्य इसलिए नहीं होता क्‍योंकि वे जिस दल से ताल्लुक रखते हैं, वहाँ से ऐसे बयान पहले भी आ चुके हैं।

सर्वप्रथम तो यह सामान्‍य ज्ञान की बात है कि सेना से सम्बंधित नीतियां, कार्यवाहियां, संसाधन, बजट, तैनाती आदि गुप्‍त सूचनाएं होती हैं जिन्‍हें किसी भी माध्‍यम से जाहिर नहीं किया जाता। देश की आंतरिक सुरक्षा के अपने नियम होते हैं और किसी भी देश की सेना की सुरक्षा संबंधी सूचनाएं अपने आप में एक धरोहर होती हैं, जिन्‍हें गोपनीय रखा जाता है, ना कि उजागर किया जाता है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा बार-बार सरकार से सवाल पूछना शक पैदा करता है कि आखिर सबूत पाने में इनकी जरूरत से ज्‍यादा दिलचस्‍पी क्‍यों है। सरकार से तो चलो राजनीतिक विरोध है, लेकिन क्या इन्हें देश की सेना पर भी भरोसा नहीं?

सिदधू जैसे गैर जिम्‍मेदार नेता जब खुलेआम पाकिस्‍तान जाकर वहां के आर्मी चीफ के गले मिल सकते हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश की सुरक्षा को लेकर उनकी सोच क्या है। राहुल गांधी भी यदि राफेल डील को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्‍हें डील से कोई समस्‍या है, उन्‍हें समस्‍या यह है कि उन्‍हें गुप्‍त सूचनाएं क्‍यों नहीं दी जा रही हैं। गुप्‍त सूचनाएं गुप्‍त ही होती हैं।

विपक्ष का काम सरकार के कार्यों की समीक्षा करना है ना कि सरकार के काम में व्‍यवधान उत्‍पन्‍न करना। ममता बनर्जी हों या सिद्धू या राहुल गांधी या दिग्विजिय सिंह या सैम पित्रोदा, इन सभी नेताओं ने आतंकियों के मारे जाने पर प्रसन्‍नता व्‍यक्‍त नहीं की, उल्‍टा आतंकियों पर कार्यवाही से आहत प्रतीत होते हैं मानो आतंकियों का सफाया होने से इन्‍हें निजी दुख हुआ हो।

अपनी बेशर्म और अतार्किक मांग को लेकर पित्रोदा कुतर्क दे रहे हैं कि आतंकियों की संख्‍या जानना उनका अधिकार है और इससे उनकी राष्‍ट्रभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, लेकिन राष्‍ट्र का माहौल अवाम से बनता है, इक्‍का-दुक्‍का लोगों के रवैये से नहीं।

पित्रोदा को समझना होगा कि देश व्‍यक्ति से नहीं, व्‍यवस्‍था से और बहुमत से चलता है। देश की आम जनता ने एयर स्‍ट्राइक पर ना सवाल उठाया है ना उसके सबूत मांगे हैं। यदि एयर स्‍ट्राइक में आतंकी नहीं मारे तो फिर पाकिस्‍तान इस कार्यवाही के बाद भारत पर हमले का आरोप क्‍यों लगा रहा है। पाक पीएम इमरान खान ने भी उनकी संसद में कहा कि भारत ने हमारे यहां घुसकर हमला किया।

यदि वे आतंकियों पर हमले को स्‍वयं पर हमला बता रहे हैं तो इतना तो तय है कि वे स्‍वयं के आतंकी समर्थित होने की स्‍वीकारोक्ति कर रहे हैं। और यदि वे यह मान रहे हैं कि उनके नागरिक नहीं मारे गए, केवल आतंकी मारे गए हैं तो पाकिस्‍तान ने एयर स्‍ट्राइक का स्‍वागत क्‍यों नहीं किया और उल्‍टे संयुक्‍त राष्‍ट्र को भारत के खिलाफ शिकायती पत्र क्‍यों भेजा।

खबरों के अनुसार पाकिस्‍तान ने जैश के ठिकाने तबाह होने के बाद सरगना मसूद अजहर को ना केवल गुप्‍त स्‍थान पर छुपा दिया है, बल्कि उसे सरकारी सुरक्षा भी उपलब्‍ध कराई जा रही है। सबूत मांगने वाले गिरोह से सवाल पूछा जाना चाहिये कि मसूद अजहर की मौत की अफवाह उड़ने के बाद उन्‍होंने पाकिस्‍तान से उसके जिंदा या मृत होने का सबूत क्‍यों नहीं मांगा। क्‍या सबूत देने का ठेका भारत ने ही ले रखा है।

सैम पित्रोदा को इमरान खान से सबूत मांगना चाहिये कि वे बताएं बालाकोट में आतंकी थे या पाक के नागरिक। वहां की बसाहट के बारे में प्रमाण दें। पित्रोदा जैसे विघ्‍नसंतोषियों की देश में कमी नहीं है। उन्‍होंने भी सिद्धू की तरह घटिया और बकवास बयान देते हुए पाकिस्‍तान की तरफदारी की है। वे पाकिस्‍तान के प्रवक्‍ता की तरह व्‍यवहार कर रहे हैं और भूल रहे हैं कि वे भारत में रह रहे हैं।

एक दिन पहले ही समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने भी पुलवामा हमले को लेकर घृणित टिप्‍पणी करते हुए इसे साजिश बताया था। विपक्षी दलों के इन गैर जिम्‍मेदाराना और अराजक बयानों को आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आड़े हाथों लिया है। उन्‍होंने कहा है कि सेना की कार्यवाही पर सवाल उठाना और सबूत मांगना, सरकार का नहीं, सेना का अपमान है। विपक्षी यह अपमान लंबे समय से करते आ रहे हैं।

निश्चित ही इन राष्‍ट्रविरोधी तत्‍वों को जनता ही जवाब दे सकती है। दिक्कत यह भी है कि कांग्रेस के नेताओं द्वारा एयर स्ट्राइक पर जिस तरह से पाकिस्तान के प्रवक्ता जैसी भूमिका निभाई जा रही, उसपर कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व मौन है। कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई तो दूर इन नेताओं को एक चेतावनी तक नहीं दी गयी है। फिर यह सवाल उठाना जायज है कि क्या इन बयानों को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मौन स्वीकृति मिली हुई है?

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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