मिशन शक्ति: ‘देश अंतरिक्ष की महाशक्ति बन गया और विपक्ष मीनमेख निकालने में लगा है’

भारत ने अंतरिक्ष में मौजूद लो अर्थ सैटेलाइट यानी एलईओ को नष्‍ट कर दिया। ऐसा करने वाले देश अमेरिका, रूस और चीन थे और अब भारत भी इस विशेष समूह में शामिल हो गया है। निश्चित ही सभी देशवासियों के लिए बहुत गर्व का विषय है। इस उपलब्धि के साथ ही देश अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष की चौथी महाशक्ति बन गया है।

इस सप्‍ताह देश और दुनिया में भारत की एक ही चर्चा छाई हुई है। अवाम को नया शब्‍द और नई उपलब्धि के बारे में सुनने, जानने को मिला। यह है मिशन शक्ति। स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब राष्‍ट्र से मुखातिब होकर इसकी सूचना दी तो इसका महत्‍व और बढ़ गया। मिशन शक्ति के रूप में भारत ने अंतरिक्ष जगत में सफलता का नया आयाम छू लिया है।

भारत ने अंतरिक्ष में मौजूद लो अर्थ सैटेलाइट यानी एलईओ को नष्‍ट कर दिया। ऐसा करने वाले देश अमेरिका, रूस और चीन थे और अब भारत भी इस विशेष समूह में शामिल हो गया है। निश्चित ही सभी देशवासियों के लिए बहुत गर्व का विषय है। इस उपलब्धि के साथ ही देश अंतरिक्ष की महाशक्ति बन गया है।

हालांकि अंतरिक्ष एवं इसकी प्रणाली संबंधी सूचनाएं गूढ़ एवं विषय आधारित होती हैं, इसलिए देश के बड़े वर्ग को इसकी तकनीकी चीजें समझ में भले ना आईं हों लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत आसान शब्‍दों में, कम समय में सारगर्भित रूप से समझाया और इस बात को स्‍थापित किया कि आखिर यह उपलब्धि बहुअर्थी रूप में भारत के लिए क्‍यों महत्‍व रखती है। जब प्रधानमंत्री राष्‍ट्र के नाम संदेश देने वाले थे तो उसके पहले विपक्ष की सांसें मानो थम सी गईं थीं। इंटरनेट पर कयास लगाए जा रहे थे कि आखिर मोदी क्‍या बोलने वाले हैं।

टीवी चैनल व अन्‍य प्रचार माध्‍यम भी अंदाजा लगाकर थक चुके थे लेकिन समझ नहीं पाए कि आखिर क्‍या घोषणा होने वाली हे। कुछ पत्रकार तो यह तक कहते पाए गए कि आचार संहिता लगने के बाद अब मोदी बोलने ही क्‍यों आ रहे हैं, क्‍योंकि अब कोई घोषणा तो हो नहीं सकती। मानो, मोदी केवल घोषणाएं करने के लिए ही बोलते हों। असल में वे मान ही नहीं सकते कि लोक-लुभावन घोषणाओं के अलावा भी राष्‍ट्र से संवाद किया जा सकता है और उपलब्धियों की सूचना साझा करने के लिए सार्वजनिक मंच का इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

बहरहाल, मोदी टीवी पर प्रत्‍यक्ष आए और बहुत कुशल ढंग से एक कठिन विषय को समझाया कि किस प्रकार भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ASAT मिसाइल द्वारा अंतरिक्ष में मौजूद एक लाइव सैटेलाइट को नष्ट कर दिया गया। ऐसा करते ही भारत दुनिया में चौथा शक्तिशाली देश बन गया है जिसने यह उपलब्धि हासिल की है। इस घोषणा के बाद तो विपक्ष को मानो सांप सूंघ गया।

वे देश की उपलब्धि पर गर्व करने की बजाय सरकार और खासकर प्रधानमंत्री की मीनमेख निकालने में लग गए। इससे इतना तो साबित हो गया कि विपक्षी दलों को देश की उपलब्धि पर कोई प्रसन्‍नता नहीं हुई, उल्‍टा ऐसा होने पर उन्‍हें तकलीफ होती ही नजर आई।

कांग्रेस के मानसिक दिवालियेपन का इससे बड़ा और क्‍या प्रमाण हो सकता है कि कांग्रेसी नेता इसके पीछे भी नेहरू को श्रेय देने लगे। यह बहुत ही हास्‍यास्‍पद और बचकानी दलीलें हैं। एक तरफ तो वे कह रहे थे कि इस उपलब्धि का श्रेय मोदी सरकार को नहीं दिया जाना चाहिये। यह राष्‍ट्र का मामला है, इस पर राजनीति नहीं होना चाहिये। लेकिन दूसरी तरफ ये ही जीर्ण बुद्धिजीवी नेहरू को इसका श्रेय देते नहीं थक रहे थे। इतना हास्‍यास्‍पद विरोधाभास लाना कांग्रेस के ही बस की बात है।

ममता बनर्जी तो मानो इतनी बौखला गईं कि अपनी पार्टी का चुनावी घोषणा-पत्र जारी करते समय चुनावी मसलों की बजाय सैटेलाइट पर केंद्रित हो गईं और मोदी विरोध करने लगीं। जैसे ही इस मामले पर विपक्षी दलों ने घटिया राजनीति की, उधर केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली ने तत्‍काल प्रेस वार्ता आयोजित करके कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। उन्‍होंने कहा कि डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) के वैज्ञानिकों के पास यह क्षमता पहले से थी, लेकिन अफसोस है कि पूर्ववती सरकार ने उन्‍हें कभी ऐसा करने की अनुमति नहीं दी।

जेटली के कथन की तस्‍दीक बाद में डीआरडीओ के अध्‍यक्ष सथीश रेड्डी ने स्‍वयं यह कहते हुए कर दी कि यह मिशन पूरी तरह से स्‍वदेशी था। इसमें प्रयुक्‍त सभी तकनीकें देश में ही विकसित हुईं थीं और इसी कारण यह भारत के लिए मील का पत्‍थर है। इस परियोजना को दो साल पहले मंजूरी मिल चुकी थी। रेड्डी ने यह भी कहा कि किसी मिसाइल से सैटेलाइट को मार गिराना अत्‍यंत दुर्लभ और दुष्‍कर बात होती है। चूंकि अब हम ऐसा करने में कामयाब हो गए हैं, ऐसे में यह संपूर्ण राष्‍ट्र के लिए गौरव का क्षण है।

डीआरडीओ अध्‍यक्ष के इस वक्‍तव्‍य से इतना तो स्‍पष्‍ट है कि केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा प्रोत्‍साहित किए जाने और अनुमति दिए जाने के बाद ही यह साकार हो सका है, अन्‍यथा क्षमता तो हमारे वैज्ञानिकों में आरंभ से ही रही है। विपक्षी दलों को शायद यह बात और विचलित कर सकती है कि मिशन शक्ति के बाद विश्‍व के शक्तिशाली देश अमेरिका ने भी सकारात्‍मक प्रतिक्रिया दी है और अब उसने अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को सहयोग देने की बात कही है। अमेरिका का यह सहयोगी रवैया इसलिए भी अहम है क्‍योंकि अमेरिका ने ही अतीत में भारत के मिसाइल कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी थी।

रेड्डी ने बाद में यह स्‍पष्‍ट भी किया कि लो अर्थ ऑरबिट में सैटेलाइट को मार गिराने का निर्णय पूरी जिम्‍मेदारी के साथ किया गया क्‍योंकि यदि ऐसा ना किया जाता तो अंतरिक्ष में ऊपरी दिशा में जाना होता, जहां अन्‍य सैटेलाइट को नुकसान पहुंच सकता था। चूंकि जिस सैटेलाइट को गिराया गया, वह हमारे ही देश की थी इसलिए हमारे परीक्षण के बाद अन्‍य सैटेलाइट सुरक्षित ही हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि इस पूरे प्रोजेक्‍ट से जुड़ी जानकारियां राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को दी जानी थी। डोभाल ने पीएम मोदी से इस संबंध में चर्चा की और परीक्षण की अनुमति प्रदान की।

यहां इस बात का उल्‍लेख करना अहम होगा कि यूपीए सरकार के समय भी डीआरडीओ था लेकिन ऐसी कोई पहल कभी सामने नहीं आई। इसका यह अर्थ हुआ कि समूची रक्षा प्रणाली सरकारों के रवैये पर निर्भर है। चूंकि कांग्रेस की सरकार लचर थी और उस दौर में मंत्रियों को घोटालों से ही फुरसत नहीं थी तो विकासवादी अभियान क्‍या चल पाता, लिहाजा मोदी सरकार द्वारा 2016 में मिली अनुमति के बाद आज डीआरडीओ ने दुनिया के सामने वह कर दिखाया है जिसके लिए भारत का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। इस राष्‍ट्रहित के मसले पर भी राजनीति के बिंदु खोजना, मीनमेख निकालना कांग्रेस सहित अन्‍य विपक्षी दलों की खिसियाहट को प्रकट करता है और खिसियानी बिल्‍ली खंभा नोचे की कहावत को चरितार्थ करता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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