भाजपा के भय से वायनाड गए राहुल के पीछे पड़े वामपंथी

वामपंथी मानते हैं कि केरल उनका मजबूत गढ़ है, ऐसे में राहुल गांधी के यहाँ से चुनाव लड़ने को लेकर वे पशोपेश में हैं। वाम नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि राहुल के दक्षिण से चुनाव लड़ने की वजह से महागठबंधन की संभावनाओं को झटका लगा है। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा है कि राहुल को वायनाड से हार के लिए तैयार रहना चाहिए। सीपीएम नेता प्रकाश करात ने दावा किया है कि वामपंथी राहुल को वायनाड से जीतने नहीं देंगे। अब अगर वामपंथी जैसा कह रहे हैं, वैसा ही उन्होंने किया तो राहुल के लिए वायनाड में भी लड़ाई आसान नहीं रहेगी। 

बीच लड़ाई में अगर सेनापति मैदान छोड़कर किनारा कर ले तो उस मुकाबले का परिणाम आप सहज सोच सकते हैं। बात यहाँ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की हो रही है, जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाले अमेठी की सीट के साथ ही एक ऐसी सीट से भी चुनाव लड़ने का मन बनाया है जहाँ उनके हार की सम्भावना नहीं के बराबर कही जा रही।

पिछले कई महीनों से यह चर्चा चल रही थी कि राहुल गाँधी को कहीं इस बार अमेठी में हार का सामना न करना पड़ जाए। लेकिन इस डर पर तब मुहर लग गयी जब कांग्रेस पार्टी ने प्रस्ताव सामने लाया कि राहुल अमेठी के अलावा केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ेंगे।

वायनाड केरल और तमिलनाडू की सीमा पर स्थिति क्षेत्र है, जहाँ दलित, आदिवासी और ईसाईयों की आबादी कम से कम 50 फीसद है। इस सीट को कांग्रेस नेता के लिए सुरक्षित माना जा रहा, क्योंकि पिछली बार कांग्रेस ने इस सीट को 1।5 लाख मतों से जीता था। हालांकि राहुल के वायनाड जाने पर वामपंथियों के जो सुर सुनाई दे रहे उससे लग रहा कि यहाँ भी राहुल के लिए लड़ाई आसान नहीं रहेगी।

वामपंथी मानते हैं कि केरल उनका मजबूत गढ़ है, ऐसे में राहुल गांधी के यहाँ से चुनाव लड़ने को लेकर वे पशोपेश में हैं। वाम नेता सीताराम येचुरी का मानना है कि राहुल के दक्षिण से चुनाव लड़ने की वजह से महागठबंधन की संभावनाओं को झटका लगा है। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा है कि राहुल को वायनाड से हार के लिए तैयार रहना चाहिए। सीपीएम नेता प्रकाश करात ने दावा किया है कि वामपंथी राहुल को वायनाड से जीतने नहीं देंगे।

दरअसल अमेठी में कांग्रेस नेता स्मृति ईरानी के आने के बाद कांग्रेस की जमीन सिकुड़ी है। स्मृति ईरानी ने इस सीट को बखूबी सींचा है। वह अमेठी के किसानों के साथ खड़ी रही है। बाकी नेताओं और स्मृति इरानी में यहाँ फर्क यह देखा जा सकता कि स्मृति के आने से कांग्रेस की जीत का फासला लगातार कम होता गया है। 2014 में भले ही स्मृति इरानी को हार का सामना करना पड़ा हो लेकिन उन्होंने पिछले पांच सालों में अमेठी का मैदान नहीं छोड़ा और जमकर मेहनत की है।

2009 में जहाँ कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की जीत का मार्जिन 3.70 लाख था, वहीं 2014 में जीत का फासला घटकर महज 1.07 लाख रह गया। अब वायनाड से राहुल के चुनाव लड़ने की खबर से अमेठी में भी कांग्रेस समर्थकों में बैचैनी है कि कहीं इस बार कांग्रेस की सत्ता पूरी तरह से अमेठी में पलट न जाए, लेकिन अब तो स्थिति ये है कि वायनाड में भी अगर वामपंथियों ने कांग्रेस का डटकर मुकाबला किया तो राहुल को दक्षिण में भी नाको चने चबाने पड़ सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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