संकल्प पत्र: लोकलुभावन घोषणाएं नहीं, भावी भारत के विकास का सूझ-बूझ भरा रोडमैप

बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में ऐसे लोकलुभावन वादों से बचने का प्रयास किया है जिनको पूरा करने में अर्थव्यवस्था को हानि होने की संभावना है। सबको पता है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन महज चुनाव जीतने के लिए आप वैसे वादे नहीं कर सकते जिससे पूरी व्यवस्था ही चौपट हो जाए। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में “न्याय” की बड़ी चर्चा की है, लेकिन उसके लिए पैसे कहाँ से आएंगे इसकी कोई चर्चा नहीं है। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक नुकसानदेह वादा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद के लिए वोट नहीं माँगते हैं, वह निरंतर और गतिशील भारत के लिए वोट माँगते हैं। सोमवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज आदि की उपस्थिति में भारतीय जनता पार्टी का संकल्प पत्र जारी किया गया तो उन्होंने भारत को दुनिया की पंक्ति में सबसे आगे देखने की बात की। 

एक ऐसे भारत की बात की जो एशिया का नेतृत्व कर सके। चुनाव जीतने के लिए सत्ताधारी पार्टी बड़े-बड़े वादे कर सकती थी, लेकिन बड़ी-बड़ी घोषणाओं की बजाय सूझ-बुझ वाली नीति पर अमल करने का प्रयास किया गया। आपने देखा इसे संकल्प पत्र कहा गया, घोषणा पत्र नहीं। इसके पीछे भी बड़ी वजह है।

दुनिया भर के लोकतान्त्रिक देशों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा होती है कि पार्टियां अपने-अपने घोषणापत्रों में बड़ी-बड़ी योजनाओं का ज़िक्र तो करती है लेकिन वैसे वादों पर अमल नहीं होता है। ऐसी घोषणाएं महज लफ्फाजी बनकर रह जाती हैं।इसलिए विकासशील और विकसित देशों में यह मांग बढ़ रही है कि चाँद तोड़कर लाने वाले लोक लुभावन नारों से बचा जाय।

वैसे भी पिछले चुनावों का अनुभव रहा है कि बड़े नेता और पार्टियां बड़े-बड़े वादे तो ज़रूर करते हैं, लेकिन पलटकर अपने क्षेत्रों में कभी नहीं जाते। इसलिए यह साफ़ हो गया है कि घोषणापत्र महज घोषणाओं का पिटारा भर बनकर रह जाते हैं। बीजेपी अपने चुनावी वादों के लिए संकल्प पत्र निकलती है, जिसमें नेताओं को इतना पता होता है कि जो भी वादे किये जा रहे हैं, उसको पूरा करने का संकल्प भी उसके पीछे निहित हो।

बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में ऐसे लोकलुभावन वादों से बचने का प्रयास किया है जिनको पूरा करने में अर्थव्यवस्था को हानि होने की संभावना है। सबको पता है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन महज चुनाव जीतने के लिए आप वैसे वादे नहीं कर सकते जिससे पूरी व्यवस्था ही चौपट हो जाए। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में “न्याय” की बड़ी चर्चा की है, लेकिन उसके लिए पैसे कहाँ से आएंगे इसकी कोई चर्चा नहीं है। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक नुकसानदेह वादा है।

अगर थोड़ा-सा पीछे मुड़कर पिछले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव की तरफ देखें तो आपको यह साफ़ प्रतीत होगा कि चुनाव जीतने के लिए किसानों से बड़े-बड़े वादे किये गए थे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कर्जमाफी के नाम पर बस दिखावा ही ज्यादा हो रहा है। यह बात दुनिया भर के अर्थशास्त्री जानते और मानते हैं कि कर्जमाफी से किसानों का दीर्घकालिक फायदा नहीं हो सकता है।

संकल्प पत्र जारी करते हुए प्रधानमंत्री मोदी और राजनाथ सिंह ने एक बात कही कि नेताओ के प्रति विश्वास का संकट पैदा हुआ है, इसके लिए कहीं भी जनता नहीं, काफी हद तक नेता खुद ज़िम्मेदार हैं। संकल्प पत्र एक तरह से वैसा दस्तावेज हैं जिसमें मोदी ने अपने वादों पर खरा उतरने का वचन दिया है। देश की 130 करोड़ जनता का संकल्प है कि देश की अर्थवस्था चलायमान रहे, विकास का चक्का और तेज़ी से घूमे।

मोदी ने अपने उद्बोधन में उस गतिशीलता और निरंतरता की बात की है जो भारत को 2047 तक दुनिया के सर्वोच्च देशों की श्रेणी में भारत को अग्र पंक्ति में खड़ा करेगा। कह सकते हैं कि इस संकल्प पत्र में कांग्रेस की तरह वोट के लिए लोकलुभावन वादों की बजाय सुविचारित और दूरदर्शी ढंग से भावी भारत के विकास का रोडमैप प्रस्तुत किया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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