बद से बदतर होती पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था, खाने-पीने की चीजों में कटौती को मजबूर लोग

चालू वित्त वर्ष में पाकिस्तान की औसत महंगाई दर 7.1 प्रतिशत तक पहुँच सकती है और अगले साल यह 13.5 प्रतिशत तक के स्तर पर पहुंच सकती है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़  रही है, जो अगले साल 2.7 प्रतिशत के स्तर पर आ सकती है। महंगाई के बेकाबू होने की वजह से आम लोग अपने खाने-पीने के सामानों में भी कटौती कर रहे हैं। लोगों ने अपनी पसंद के खाद्य पदार्थों में भी बदलाव किया है। आम लोगों ने महंगे खाद्य पदार्थों, जैसे, पनीर, फल, दूध आदि खाना या तो बंद कर दिया है या कम कर दिया है। छोटे कारोबारियों की हालत बद से बदतर हो गई है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय बेहद बुरे दौर में गुजर रही है। पुलवामा हमले के बाद   भारत द्वारा उससे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीने जाने के बाद से उसकी हालत और खराब हुई है। अब बढ़ती महँगाई पर काबू पाने के लिये पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) से 6 अरब डॉलर कर्ज माँगा है। पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय के प्रमुख अब्दुल हफीज़ शेख के अनुसार यह कर्ज पाकिस्तान, आईएमएफ़ को 3 सालों में चुकायेगा। शेख का कहना है कि पाकिस्तान बिना आर्थिक मदद के न तो अपने व्यापारिक घाटे को पूरा कर सकता है और न ही बढ़ती महंगाई पर काबू पा सकता है।

साभार : Quora.com

आईएमएफ़ ने माना है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब है। पाकिस्तान की विकास दर बहुत ही धीमी हो गई है। महंगाई निरंतर बढ़ रही है। सरकार एवं आमजन कर्ज में डूबते जा रहे हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर, 2018 के अंत तक पाकिस्तान की जनता का कर्ज़ जीडीपी का 73.2 प्रतिशत हो गया था, जिसके वर्ष 2019 में बढ़कर 82.3 प्रतिशत पहुँचने की संभावना है। यह बीते 17 सालों में जीडीपी के अनुपात में सबसे ऊंचा स्तर है। पाकिस्तानी सरकार बढ़ती महंगाई, जीडीपी के अनुपात में बढ़ते कर्ज़ और सुस्त विकास दर जैसी समस्याओं का समाधान करना चाहती है, लेकिन सरकार की हर मुमकिन कोशिश अब तक असफल रही है।

हालाँकि, पाकिस्तान के अर्थशास्त्री डॉ. तलत अनवर का कहना है कि आईएमएफ से कर्ज लेने पर  आम लोगों की समस्याओं में और भी ज्यादा बढ़ोतरी होगी। उनके अनुसार आईएमएफ़ निश्चित रूप से कर्ज कुछ शर्तों पर देगा और उन शर्तों को लागू करने से पाकिस्तानी मुद्रा के मूल्य में और भी कमी आयेगी, जिससे दैनिक आधार पर उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और खाद्य पदार्थों की कीमतें और भी ज्यादा बढ़ेंगी। आईएमएफ़, पाकिस्तानी सरकार को ब्याज़ दरों, जो फिलहाल 10.75 प्रतिशत के आसपास है, में भी बढ़ोतरी करने के लिये मजबूर कर सकता है, जिससे निवेश में सुस्ती आयेगी और विकास दर के साथ-साथ रोजगार सृजन में भी कमी आयेगी।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान विगत 1 साल से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार कम होकर दो महीने के आयात से भी कम रह गया है। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि सऊदी अरब, चीन आदि देशों से उसे आर्थिक मदद मिल जायेगी। हालाँकि, इन देशों ने पाकिस्तान को कुछ आर्थिक मदद की है, लेकिन वह नाकाफी रहा है। भारतीय कूटनीति के कारण अमेरिका अब पहले की तरह पाकिस्तान की मदद नहीं कर रहा। वैसे, प्रधानमंत्री इमरान खान चीन से अभी भी मदद की आस लगाये हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि चीन पाकिस्तान को मौजूदा संकट से बाहर निकालने में मदद कर सकता है। इसके लिये वे चीन की यात्रा कर सकते हैं।    

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ पाकिस्तान को पहले रूपये के एक्सचेंज रेट में फ्री-फ्लोटिंग मेकेनिज़म पर फंड मिल रहा था, लेकिन 2017 से पाकिस्तानी मुद्रा में 34 प्रतिशत का अवमूल्यन हुआ है। एक पाकिस्तानी बैंक के अध्यक्ष ने यहाँ तक कहा कि पाकिस्तानी मुद्रा में और ज्यादा गिरावट आने पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ सकती है, क्योंकि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति आने वाले दिनों और भी ज्यादा खराब हो जायेगी।

साभार: OpIndia

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान द्वारा आईएमएफ़ के पूर्व कर्मचारी रज़ा बाकिर को केंद्रीय बैंक का नया गवर्नर बनाने के कारण भी वे विपक्ष के निशाने पर हैं। विपक्षी दलों को लग रहा है कि केंद्रीय बैंक के नये गवर्नर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकाम रहे हैं।  

पाकिस्तानी मुद्रा के मुक़ाबले डॉलर के मूल्य लगातार इजाफा हो रहा है और यह 141 रूपये के स्तर पर पहुँच गया है। कयास लगाये जा रहे हैं कि यह 150 रूपये के स्तर पर भी पहुँच सकता है। पाकिस्तानी रूपये के डॉलर के मुक़ाबले कमतर होने की वजह से पाकिस्तानी नागरिक अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। वहाँ, हर चीज़ की कीमत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पेट्रोल की कीमत 112 रूपये प्रति लीटर पहुँच गई है।

गौरतलब है कि इसकी कीमत में बढ़ोतरी अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रही है। मुस्लिम लीग (नवाज़) के वरिष्ठ नेता शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी ने कहा कि विगत 9 महीनों में पाकिस्तान पर क़र्ज़ का बोझ 28 हज़ार अरब रूपये से अधिक हो गया है। महंगाई भी इस अवधि में बढ़कर दोगुनी हो गई है।

हाल ही में विश्व बैंक ने “साउथ एशिया इकॉनोमिक फ़ोकस-एक्सपोर्ट वॉन्टेड” नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके अनुसार चालू वित्त वर्ष में पाकिस्तान की औसत महंगाई दर 7.1 प्रतिशत तक पहुँच सकती है और अगले साल यह 13.5 प्रतिशत तक के स्तर पर पहुंच सकती है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़  रही है, जो अगले साल 2.7 प्रतिशत के स्तर पर आ सकती है।

महंगाई के बेकाबू होने की वजह से आम लोग अपने खाने-पीने के सामानों में भी कटौती कर रहे हैं। लोगों ने अपनी पसंद के खाद्य पदार्थों में भी बदलाव किया है। आम लोगों ने महंगे खाद्य पदार्थों, जैसे, पनीर, फल, दूध आदि खाना या तो बंद कर दिया है या कम कर दिया है। छोटे कारोबारियों की हालत बद से बदतर हो गई है।

अनेक कारोबारियों को अपना कारोबार बंद करना पड़ा है। वर्तमान स्थिति में बचे हुए कारोबारियों को भी अपना कारोबार बंद करना पड़ सकता है।  मझौले और बड़े कारोबारियों की भी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। उनके कारोबार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। महँगाई के उच्च स्तर पर पहुँचने के कारण विविध उत्पादों की माँग में भारी कमी आई है। लोग बेरोजगार हो रहे हैं। विकास दर नीचे की तरफ जा रही है।

पाकिस्तानी शेयर बाज़ार की हालत भी बहुत ख़राब है। स्टॉक मार्केट के सीईओ रिचर्ड मूरन ने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। कहा जा रहा है कि अगर पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं आता है तो आगामी सालों में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानें पाकिस्तान की खस्ता होती अर्थव्यवस्था के प्रति कड़ा रुख अपना सकते हैं।

कहा जा सकता है पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान स्थिति में सुधार लाने में बुरी तरह से असफल रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार समझ नहीं पा रही है कि कैसे बढ़ती महँगाई पर क़ाबू पाया जाये? मौजूदा स्थिति में आगामी सालों में भी पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में बेहतरी आने के आसार बहुत ही कम हैं।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के कॉरपोरेट केंद्र मुंबई के आर्थिक अनुसंधान विभाग में कार्यरत हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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