योगी राज में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में हो रहे क्रांतिकारी सुधार

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षा का फंड बढ़ाया है। लेकिन फंड के साथ ईमानदारी से कार्य करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए। अन्यथा फंड भी भ्रष्टाचार  की भेंट चढ़ जाता है। पिछली सरकारों में ऐसा ही होता था। मगर, वर्तमान सरकार में फंड का पारदर्शी उपयोग होता दिख रहा है। इससे बड़ा सुधार हुआ है। सरकार के सुधारों के परिणामस्वरूप दो वर्ष में बीस प्रतिशत विद्यर्थियो की संख्या बोर्ड में बढ़ गई है।

उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार को विरासत में बेहतर शिक्षा व्यवस्था नहीं मिली थी। शिक्षा की गुणवत्ता, अनियमित सत्र, नकल, फर्जी डिग्री, ट्रांसफर पोस्टिंग में भ्रष्टाचार आदि से संबंधित अनेक समस्याएं थीं। लेकिन पिछले दो वर्षों में ऐसी अनेक समस्याओं का समाधान हुआ है।

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और माध्यमिक व उच्च शिक्षा मंत्री डॉ दिनेश शर्मा इस उपलब्धि पर सन्तोष व्यक्त करते हुए कहते हैं कि सरकार को सत्र नियमित करने, नकल विहीन परीक्षा कराने, पारदर्शिता लाने आदि कार्यों में शत-प्रतिशत और अभूतपूर्व सफलता मिली है। इसके बाद अब उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को सर्वोत्तम बनाने की दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं।

उनका कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में विसंगति समाज के लिए हानिप्रद होती है। वर्तमान सरकार के पहले नकल व्यवसाय चल रहा था। इस सरकार ने नकल रोकी। इसके बाद पांच लाख लोगों ने परीक्षा छोड़ी। जांच में पता चला कि बड़ी संख्या में फर्जी विद्यार्थी थे, चार पांच जगहों से हजारों लोग फार्म भरते थे। छात्रों के उत्पीड़न के बिना नकल विहीन परीक्षा सुनिश्चित की गई। पढ़ाई के समय और गुणवत्ता में वृद्धि की गई। अवकाश कम किये गए। एक पाठ्यक्रम लागू किया।

देश में सबसे सस्ती पुस्तकें उत्तर प्रदेश में ही मिल रही हैं। माध्यमिक शिक्षा  में कलेंडर लागू किया। उसी के अनुरूप पढ़ाई, परीक्षा सुनिश्चित हुई। शिक्षकों की कमी भी दूर की जा रही है। अधिकारियों के स्थानांतरण की पारदर्शी प्रणाली लागू की गई। यह व्यवस्था ऑनलाइन कर दी गई है।

प्रत्येक जोन में मॉडल स्कूल स्थापित किये गए हैं। इसमें समाज का सहयोग लिया जा रहा है। ढाई महीने चलने वाली परीक्षा मात्र सोलह दिन में होने लगी है। यह क्रन्तिकारी सुधार है। रोजगारपरक पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। महापुरुषों के नाम पर शोध पीठ बनाई जा रही है। 

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षा का फंड बढ़ाया है। लेकिन फंड के साथ ईमानदारी से कार्य करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए। अन्यथा फंड भी भ्रष्टाचार  की भेंट चढ़ जाता है। पिछली सरकारों में ऐसा ही होता था। मगर, वर्तमान सरकार में फंड का पारदर्शी उपयोग होता दिख रहा है। इससे बड़ा सुधार हुआ है। सरकार के सुधारों के परिणामस्वरूप दो वर्ष में बीस प्रतिशत विद्यर्थियो की संख्या बोर्ड में बढ़ गई।

छोटे बच्चों पर बस्ते का बोझ अधिक नहीं होना चाहिए। पढ़ाई के अलावा उनमे किसी ख़ास हुनर का विकास करने पर जोर देना जरूरी है। संगीत, कला, पर्यावरण, खेल आदि किसी क्षेत्र में इन्हें रुचि के अनुसार भेजना चाहिए। ये सभी कार्य पढ़ाई के साथ चल सकते हैं। यूपी सरकार इस दिशा में कार्य कर रही है। दिनेश शर्मा कहते हैं कि बच्चों को मेधावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। यही देश के कर्णधार बनेंगे। योग्यता के आधार पर ही नम्बरों को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही, स्वस्थ प्रतियोगिता को सरकार बढ़ावा दे रही है।

पिछली सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। कुछ वर्ष पहले तक सत्र नियमित नहीं थे, नियमित दीक्षांत समारोह के प्रति पर्याप्त सजगता का भाव नहीं था। गुणवत्ता की भी समस्याएं थीं। उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री डॉ दिनेश शर्मा ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। कुलपतियों के सम्मेलन के माध्यम से विचार विमर्श का दौर चला। सत्र नियमित हुए। सत्र नियमित होते हैं, तो विद्यर्थियो का अमूल्य समय बर्वाद नहीं होता। स्पष्ट है कि राज्य में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक व्यापक सुधार देखने को मिले हैं। यही कारण है कि विदेशी अखबारों ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था के विषय में लिखा कि उत्तर प्रदेश की शिक्षा में क्रांतिकारी सुधार हो रहा है।

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