कर्नाटक का नाटक : बिना एजेंडे के चल रही कांग्रेस-जेडीएस सरकार की हालत अब गई, तब गई

असल संघर्ष तो कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया और कुमारस्वामी के बीच कुर्सी को लेकर है और इसका ठीकरा बीजेपी के माथे पर फोड़ने की कोशिश की जा रही है। केंद्र में कैबिनेट मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में स्पष्ट कर दिया था कि कर्नाटक का संकट गठबंधन दलों के आपसी स्वार्थ का नतीजा है और इसके लिए बीजेपी को बीच में लाने का कोई मतलब नहीं है।

कर्नाटक का सियासी ड्रामा हर बीते दिन के साथ और अधिक रोचक होता जा रहा है। जिस सत्ता के लिए कांग्रेस और जेडीएस साथ आए थे, आज उनके विधायकों को वह सत्ता रास नहीं आ रही है। कुमारस्वामी के नेतृत्व में चलाई जा रही गठबंधन सरकार टूट के कगार पर है। यह महज इत्तफाक नहीं है कि साल भर में कर्नाटक के विधायक कभी इस रिसोर्ट में तो कभी उस रिसोर्ट में छुपते-छुपाते फिर रहे हैं। मित्रता की सौगंध लेकर जेडीएस और कांग्रेस पार्टी सरकार चलाने के लिए साथ आई थीं, लेकिन एक वर्ष के अन्दर ही उनका एकदूसरे से मोहभंग हो गया लगता है।

सांकेतिक चित्र

तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अभी तक कर्नाटक में लगभग दर्जन भर विधायकों ने अपने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया है। अगर ये सारे इस्तीफे स्वीकार लिए जाते हैं तो कर्नाटक में कुमारस्वामी की सरकार मुश्किल में आ जाएगी। अब सारा दारोमदार स्पीकर के ऊपर है, लेकिन इतनी बात तो स्पष्ट हो गई है कि राज्य में इस कथित मैत्री सरकार का कोई न कोई भविष्य इसके गठन के वक़्त था और न अब है।

इस सरकार के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी खुद जब-तब ऐसा जाहिर करते रहे हैं कि उनकी बात सुनी और मानी नहीं जा रही है। जेडीएस और कांग्रेस के मध्य गठबंधन राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था, लेकिन किसी विचारधारा या किसी कॉमन मिनिमम प्लान के अभाव में अब ये बिखरने के कगार पर है।

दरअसल राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद ही अलग-अलग प्रदेशों में कांग्रेस के अन्दर निराशा घर कर गई है और इस्तीफ़े का सिलसिला शुरू हो गया। कर्नाटक में गठबंधन सरकार पर भी इसका साफ़ साफ़ असर देखने को मिला है। अभी तक दर्जन भर कांग्रेस के विधायक अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं और कम से कम 10 अन्य विधायक महाराष्ट्र में रिसॉर्ट्स में शरण लिए हुए हैं।

कर्नाटक में बीजेपी ने अपनी ज़मीन तैयार करने में सालों की मेहनत लगाई है, जिसका नतीजा यह रहा कि पिछले चुनाव में जनता ने उसे नम्बर एक पार्टी बनाया। जेडीएस और कांग्रेस के पक्ष में प्रदेश की जनता का जनमत कतई नहीं था, बावजूद इसके उन्होंने अनैतिक गठजोड़ से सरकार बना ली।

असल संघर्ष तो कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया और कुमारस्वामी के बीच कुर्सी को लेकर है और इसका ठीकरा बीजेपी के माथे पर फोड़ने की कोशिश की जा रही है। केंद्र में कैबिनेट मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में स्पष्ट कर दिया था कि कर्नाटक का संकट गठबंधन दलों के आपसी स्वार्थ का नतीजा है और इसके लिए बीजेपी को बीच में लाने का कोई मतलब नहीं है।

सच्चाई यह है कि कर्नाटक में गठबंधन की सरकार बहुमत खो चुकी है और बीजेपी अभी घटनाक्रम पर बस नजर बनाए हुए है। यह कहना बिलकुल गलत है कि बीजेपी कर्नाटक में सत्ता के पीछे है। जो सरकार वहां चल रही है, वो जनादेश के विपरीत और स्वार्थी गठजोड़ पर आधारित है। स्वार्थों के टकराव में सरकार का मुश्किल में आना कोई बड़ी बात नहीं। कर्नाटक में विधानसभा का सत्र 12 जुलाई से शुरू हो रहा है, ऐसे में कांग्रेस-जेडीएस के लिए सरकार को बचाना आसान नहीं दिख रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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