उधारी दर निर्धारण की नयी व्यवस्था से कर्ज सस्ता करने में जुटा आरबीआई

नई व्यवस्था के तहत बैंक उधारी दर का निर्धारण खुद से नहीं कर सकेंगे। अब रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दर में किये जा रहे बदलाव के अनुसार बैंकों की उधारी दर में कमी या बढ़ोतरी होगी। जब रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत में कटौती की जायेगी तो स्वतः ही उधारी दर में भी कमी आ जायेगी और जब नीतिगत दर में बढ़ोतरी की जायेगी तो उधारी दर में बढ़ोतरी हो जायेगी। कर्ज के सस्ती होने पर ही विविध उत्पादों की माँग में इजाफा होगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

रिजर्व बैंक के अनुसार सीमांत लागत पर आधारित उधारी दर (एमसीएलआर) व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। रिजर्व बैंक ने इस साल रेपो दर में 110 आधार अंक यानी 1.10% की कटौती कर चुका है, लेकिन बैंकों ने इसका पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया है। रेपो दर अभी 5.40 प्रतिशत है, जो 5 साल पहले 8.00 प्रतिशत थी।

सूक्ष्म, लघु और मझौले ऊधमों (एमएसएमई), गृह ऋण और वाहन कर्ज लेने वाले ग्राहकों को राहत देने के लिये रिजर्व बैंक ने बैंकों को अनिवार्य रूप से नये खुदरा कर्जों जैसे, आवास, वाहन, व्यक्तिगत, संपत्ति के बदले कर्ज आदि जो 1 अक्टूबर से फ्लोटिंग दर पर दिये जायेंगे को बाहरी मानक दर जैसे, रेपो दर से जोड़ने के लिये कहा है। 

इस व्यवस्था को अपनाने के बाद बैंकों की उधारी दर नीतिगत दर में कटौती या बढ़ोतरी के अनुसार कम या ज्यादा होगी। रिजर्व बैंक के नये नियम केवल बैंकों पर लागू होंगे। आवास वित्त कंपनियां और गैर बैकिंग वित्तीय कंपनियों को नई व्यवस्था की जद में नहीं लाया गया है। अस्तु, कर्ज लेते समय ग्राहकों को इस बात का ध्यान रखना होगा। 

कुछ सरकारी बैंकों ने सितंबर महीने में अपनी उधारी दरों को बाहरी मानक दर या रेपो दर से जोड़ा है। इससे उनकी उधारी दर 20 आधार अंक सस्ती हो गई है। उदाहरण के तौर पर भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी उधारी दरों को बाहरी मानक दर या रेपो दर से सबसे पहले जोड़ा है, जिसके कारण इसका आवास कर्ज 8.05 प्रतिशत की दर पर उपलब्ध है, जो फिलहाल सबसे सस्ती आवास उधारी दर है, जबकि बैंक की एमसीएलआर व्यवस्था से जुड़ी आवास उधारी दर तकरीबन 30 आधार अंक ज्यादा यानी 8.35 प्रतिशत है। 

पंजाब नेशनल बैंक की रेपो दर और एमसीएलआर से जुड़ी आवास उधारी दरों में 25 आधार अंक का अंतर है। वाहन कर्ज में यह अंतर और भी ज्यादा है। इंडियन बैंक की एमसीएलआर व्यवस्था से जुड़ी वाहन उधारी दर 9.45 प्रतिशत है, जबकि बाहरी मानक या रेपो दर से जुड़ी उधारी दर 8.85 प्रतिशत है। इसतरह दोनों दरों में 60 आधार अंक का अंतर है। बहरहाल, उधारी दर को बाहरी मानक दर से जोड़ने की संकल्पना लगभग एक साल पुरानी है। केंद्रीय बैंक ने सबसे पहले 5 दिसंबर 2018 को उधारी दर को बाहरी मानक दर से जोडऩे की बात कही थी, लेकिन बैंकों का कहना था कि ऐसा करने से उनकी मार्जिन प्रभावित होगी। 

क्या होता है रेपो दर

रिजर्व बैंक जब वाण्यिजिक बैंकों को उधार देता है तो उसे रेपो दर कहते हैं। मुद्रास्फीति के समय, रिजर्व बैंक रेपो दर को बढ़ा देता है, जिससे बैंकों के लिये उधार लेना महँगा हो जाता है, जिसके कारण वह कारोबारियों को सस्ती दर पर कर्ज नहीं दे पाता है। रेपो दर में बढ़ोतरी से बाजार में नकदी की तरलता कम हो जाती है। इसका इस्तेमाल नकदी को नियंत्रित करने में किया जाता है। 

रिवर्स रेपो दर क्या है

यह रेपो दर से उलट होता है। जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद रकम बच जाती है तो उस रकम को रिजर्व बैंक में रखा जाता है। रिजर्व बैंक ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज देता है, उसे रिवर्स दर कहते हैं। रिवर्स रेपो दर का इस्तेमाल बाजार में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में किया जाता है। जब भी बाजार में ज्यादा नकदी आ जाती है तो रिजर्व बैंक रिवर्स रेपो दर को बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज़्यादा ब्याज कमाने के लिये अपनी रकम उसके पास जमा करा दे। इससे बाजार में नकदी का प्रवाह कम हो जाता है। 

नकद आरक्षित अनुपात

बैंकिंग नियमों के अनुसार हर बैंक को अपनी कुल नकदी रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है, जिसे नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) कहते हैं। यह नियम इसलिये बनाया गया है, ताकि जमाकर्ताओं को कभी भी बैंक से रकम निकालने में कोई परेशानी नहीं हो। सीआरआर रिजर्व बैंक का एक ऐसा हथियार है, जिसकी मदद से रिजर्व बैंक बिना रिवर्स रेपो दर में बदलाव किये बाज़ार से नकदी की तरलता को कम कर सकता है। 

अगर सीआरआर में बढ़ोतरी की जाती है तो बैंकों को ज़्यादा रकम रिजर्व बैंक के पास रखनी होती है, जिससे उनके पास कर्ज देने के लिये कम रकम बचती है। इसके विपरीत बाज़ार में नकदी बढ़ाने के लिये रिजर्व बैंक सीआरआर में कमी करता है। सीआरआर में बदलाव तभी किया जाता है, जब नकदी की तरलता पर तत्काल में प्रभाव नहीं डालना हो। रेपो दर और रिवर्स रेपो दर में बदलाव की तुलना में सीआरआर में किये गये बदलाव से बाज़ार पर असर कुछ समय के बाद पड़ता है।

सांकेतिक चित्र (साभार : Business Today)

सरकार की मंशा है कर्ज सस्ता करना

मौजूदा समय में निजी बैंक 10 से 19.50 प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज दे रहे हैं, जबकि सरकारी बैंक 8 से 9 प्रतिशत की दर पर और व्यक्तिगत उधारी 10.50 से 16.50 प्रतिशत की दर पर उपलब्ध करा रहे हैं। सरकार का मानना है कि कर्ज सस्ता करने पर विविध उत्पादों की मांगों में बढ़ोतरी होगी और अन्य आर्थिक गतिविधियों में तेजी आयेगी।  

रिजर्व बैंक रेपो दर में कटौती तो कर रहा है, लेकिन इसका पूरा फायदा बैंक ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं। ऐसे में रिजर्व बैंक ने नई व्यवस्था के तहत नये फ्लोटिंग दर वाले व्यक्तिगत, खुदरा और एमएसएमई कर्ज को बाहरी मानक या रेपो दर से बैंकों को जोड़ने के लिये कहा है, ताकि रेपो दर में कटौती करने पर उधारी दर में स्वतः कमी आये। 

उधारी दरों को बाहरी मानक दर से जोड़ना होगा

रिजर्व बैंक ने बैंकों के सामने रेपो दर या फिर फाइनेंशियल बेंचमार्क इंडिया लिमिटेड (एफबीआईएल) द्वारा प्रकाशित 3 महीने और 6 महीने के ट्रेजरी बिल की प्राप्तियाँ अथवा एफबीआईएल द्वारा प्रकाशित कोई अन्य बेंचमार्क से उधारी दर को जोड़ने का विकल्प रखा है। 

बैंकों को उधारी दर को आवश्यक रूप से रेपो दर, 3 या 6 महीने के ट्रेजरी बिल पर प्रतिफल या फाइनैंशियल बेंचमार्क प्रा. लि. (एफबीआईएल) द्वारा प्रकाशित कोई अन्य बाहरी मानक दर से जोड़ना होगा। हालाँकि, बैंकों को अपने उधारी दरों को मोटे तौर पर रेपो दर जैसे बाहरी मानक दर से ही जोड़ने होंगे, क्योंकि यह सबसे प्रचलित और प्रभावशाली बाहरी मानक दर है।  

केंद्रीय बैंक के अनुसार बाहरी मानक आधारित उधारी दर की हर 3 महीनों में समीक्षा की जायेगी। केंद्रीय बैंक यह भी चाहता है कि जो ग्राहक पहले से फ्लोटिंग ब्याज दर पर कर्ज लिये हुए हैं, उन्हें भी बाहरी मानक दर यानी रेपो दर से जुड़ी उधारी दर का फ़ायदा मिले और इसके बदले में बैंक ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं ले।

एमसीएलआर से बेहतर है बाहरी मानक उधारी दर व्यवस्था 

अभी बैंक एमसीएलआर पद्धति से कर्ज दरें तय कर रहे हैं। इसमें बैंक के कर्ज पूँजी की लागत के अनुसार जुड़े हैं। रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दरों में कटौती के 4 से 6 महीने बाद उसका फायदा कर्जदारों को मिलता है। वह भी पूरा नहीं। एमसीएलआर की गणना 3 और 6 महीने के ट्रेजरी बिल के आधार पर की जाती है। 

हालाँकि, अधिकांश बैंक इसकी गणना सालाना आधार पर करते हैं, जिसमें आमतौर पर 0.05% से 0.10% का बदलाव होता है, लेकिन अब नई बाहरी मानक या रेपो दर में जब बढ़ोतरी होगी तो कर्ज की किस्तें बढ़ने लगेगी। वर्तमान में रेपो दर में कमी आ रही है, इसलिये ग्राहकों को रेपो दर में कटौती का फायदा मिलेगा और उनके कर्ज की किस्तें कम होंगी।  

पारदर्शिता में होगी बढ़ोतरी

रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार सभी बैंकों को अपने उधारी दर को बाहरी मानक दर से जोड़ना होगा, जिससे बैंकों की कर्ज नीति में पारदर्शिता आयेगी। हालाँकि, बैंक बाहरी मानक दर से उधारी दर को जोड़ने के बाद भी स्प्रेड को निर्धारित मानक से ऊपर के स्तर पर तय करने के लिए स्वतंत्र होंगे, लेकिन यह पूरी तरह से बैंकों की वित्तीय क्षमता पर निर्भर करेगा। परिचालन लागत सहित स्प्रेड के अन्य घटकों को 3 सालों में संशोधित करने की स्वतंत्रता भी बैंकों के पास होगी। 

बाहरी मानक दर से उधारी दर को जोड़ने की प्रक्रिया 

बाहरी मानक दर से उधारी दर को जोड़ने की प्रक्रिया भुगतान या कर्जों के नवीनीकरण तक जारी रहेगी। जो ग्राहक बिना किसी अग्रिम भुगतान शुल्कों के परिवर्तित ब्याज दरों वाले कर्ज का भुगतान करने में सक्षम हैं वे बिना किसी शुल्क (आवश्यक शुल्कों को छोड़कर) के बाहरी मानक दर से जुड़ सकेंगे।

केंद्रीय बैंक के अनुसार बाहरी मानक दर से जुडऩे के बाद इस श्रेणी के ग्राहकों को उसी  ब्याज दर का भुगतान करना होगा जो इसी श्रेणी के दूसरे नये ग्राहकों को देना होगा। दूसरे ग्राहकों के पास भी आपसी सहमति से ऐसे मानक दर से जुडऩे का विकल्प होगा। रिजर्व बैंक ने यह भी कहा है कि ग्राहकों को बाहरी मानक दर से जुड़ी उधारी दर से नीचे की दर पर उधारी नहीं दी जायेगी।  

एनपीए में कमी से उधारी दरों में आयेगी कमी 

बैंकों में एनपीए 9.4 लाख करोड़ रुपये से घटकर मार्च 2020 में 9.1 लाख करोड़ रुपये हो सकती है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार दबाव वाली परिसंपत्तियों के समाधान में हो रही बढ़ोतरी और संपत्ति पुनर्गठन कंपनियों की बढ़ती भूमिका से ऐसा मुमकिन है। 

बड़ी कंपनियों के कुल कर्ज में एनपीए 5.4 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें से नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की पहली व दूसरी सूची से 2.1 लाख करोड़ रुपये शामिल है। बिजली, सीमेंट और स्टील क्षेत्र 4.1 लाख करोड़ रुपये की दबाव वाली परिसंपत्तियों में करीब आधे की भागीदारी करता है।   

निष्कर्ष

उधारी दर को बाहरी मानक दर से जोड़ने के लिये रिजर्व बैंक द्वारा निर्देश देने का मुख्य उद्देश्य नीतिगत दर में की जा रही कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाना है। मौजूदा समय में बैंकों द्वारा अपनी उधारी दर को बाहरी मानक दर से जोड़ने के बाद खुदरा उधारी दर में बैंक वार अंतर देखने को मिल रहा है, जिसका कारण बैंकों द्वारा पूर्व में नीतिगत दरों में कटौती का फायदा ग्राहकों को नहीं देना है। 

नई व्यवस्था के तहत बैंक उधारी दर का निर्धारण खुद से नहीं कर सकेंगे। अब रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दर में किये जा रहे बदलाव के अनुसार बैंकों की उधारी दर में कमी या बढ़ोतरी होगी। जब रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत में कटौती की जायेगी तो स्वतः ही उधारी दर में भी कमी आ जायेगी और जब नीतिगत दर में बढ़ोतरी की जायेगी तो उधारी दर में बढ़ोतरी हो जायेगी। कर्ज के सस्ती होने पर ही विविध उत्पादों की माँग में इजाफा होगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

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