राफेल के शस्त्र पूजन का विरोध कांग्रेस की अभारतीय वैचारिकता का ही सूचक है

भारत में विजयदशमी पर शस्त्र-पूजन की प्राचीन परम्परा रही है, अतः फ़्रांस में ही राजनाथ सिंह ने सिन्दूर से ओम बनाकर तथा नारीयल-कलावा आदि चढ़ाकर राफेल का शस्त्र पूजन किया। साथ ही पहियों के नीचे नींबू रखा गया। ये सब भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के व्यवहार थे, जिनका अबकी पहली बार विदेशी धरती पर भी निर्वहन करके रक्षा मंत्री ने देश का सीना चौड़ा किया है।

इसबार वायुसेना के स्थापना दिवस पर विजयदशमी का पड़ना तो एक शानदार संयोग था ही, तिसपर यह और भी सुखद रहा कि जब देश में एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी रावण दहन कर रहे थे, उसी समय फ़्रांस की धरती पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भारतीय वायुसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देने वाले बहुप्रतीक्षित राफेल विमान को प्राप्त करने में लगे थे।

अब चूंकि, भारत में विजयदशमी पर शस्त्र-पूजन की प्राचीन परम्परा रही है और राजनाथ भारतीय परम्पराओं से एकदम जुड़े हुए व्यक्ति हैं। अतः उन्होंने फ़्रांस की धरती पर ही सिन्दूर से ओम बनाकर तथा नारीयल-कलावा आदि चढ़ाकर राफेल का शस्त्र पूजन किया। साथ ही पहियों के नीचे नींबू रखा गया। ये सब भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के व्यवहार थे, जिनका अबकी पहली बार विदेशी धरती पर भी निर्वहन करके रक्षा मंत्री ने देश का सीना चौड़ा किया है।

रक्षा मंत्री के इस कार्य की सोशल मीडिया पर लोगों ने काफी सराहना की तथा इसपर गर्व व्यक्त किया। लेकिन लोकसभा चुनाव में राफेल को मुद्दा बनाकर मात खा चुकी कांग्रेस ने इस राष्ट्रीय गर्व के विषय पर भी विरोध की राजनीति का रास्ता अख्तियार किया। कांग्रेस की तरफ संदीप दीक्षित और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस पूरे प्रकरण को नाटक-तमाशा करार दे दिया। संदीप दीक्षित का कहना था कि सरकार हर चीज का नाटक बना देती है।

कांग्रेस नेताओं के इन बयानों से साफ़ है कि उसने अपने बीते अनुभवों से कोई सबक नहीं लिया है। राफेल पर लोकसभा चुनाव में झूठ की लम्बी-चौड़ी राजनीति करके बुरी तरह से मात खाने के बाद भी कांग्रेस देश का मिजाज़ समझने को तैयार नहीं है। भारतीय परम्परा के निर्वहन को नाटक बताना स्पष्ट रूप से कांग्रेस की अभारतीय मानसिकता को ही दर्शाता है। कांग्रेस को बताना चाहिए कि विदेशी धरती पर अपनी परंपराओं का पालन नाटक कैसे हो गया? सनातन ग्रंथों में सृष्टि के प्रथम शब्द के रूप में मान्य ‘ॐ’ को लिखकर प्राप्त हो रहे नए आयुध का पूजन करने में उसे नाटक की अनुभूति क्यों हो गयी?

यह भी कि क्या देश में होने वाले शस्त्र-पूजन को भी कांग्रेसी नाटक मानते हैं? इन सवालों के जवाब कांग्रेस को देने तो चाहिए, मगर वो देगी नहीं, क्योंकि इनका कोई जवाब उसके पास है ही नहीं। इसमें कोई दोराय नहीं कि अपने इस रुख से कांग्रेस भारतीय संस्कृति और परंपराओं का तो क्या ही अहित करेगी, लेकिन अपनी बची-खुची राजनीतिक साख को बट्टा जरूर लगाएगी।

वास्तव में, कांग्रेस के इस रुख में बहुत कुछ नया नहीं है, उसकी वैचारिकता का मूल ही इस तरह के विचारों पर आधारित है। कांग्रेस के पितृ-पुरुष नेहरू देश की समस्याओं का समाधान पश्चिम से आयातित समाजवाद में देखते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण की मंशा से भी कांग्रेस लगातार इस तरह की चीजों का विरोध करती रही है। भारतीय संस्कृति-विचारों से परहेज और पश्चिम के प्रति आकर्षण कांग्रेस का बुनियादी चरित्र रहा है। यही कारण है कि आज राफेल का शस्त्र-पूजन कांग्रेस को तकलीफ हो रही है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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