जिम्मेदार विपक्ष की तरह व्यवहार करना कब सीखेगी कांग्रेस?

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में भी राहुल गांधी की सुई नोटबंदी और जीएसटी पर ही अटकी हुई है। इन मुद्दों के बहाने प्रधानमंत्री पर अनर्गल आरोप लगाने के सिवा उनके भाषणों में और कुछ नहीं होता। नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्यमियों की कमर तोड़ दी, अनेक बार कही गयी ये बात वे इन चुनावों में भी रटने में लगे हैं। लेकिन वे यह नहीं बता पा रहे कि अगर नोटबंदी और जीएसटी से आम जनता इतनी परेशान है तो बीते चुनावों में उसने भाजपा को जीत क्यों दिलाई और कांग्रेस को लगातार हर कहीं हार का सामना क्यों करना पड़ रहा?

नोटबंदी 2016 में हुई थी और जीएसटी 2017 में पारित हुआ। इन दोनों निर्णयों के बाद हुए ज्यादातर राज्यों के चुनावों सहित इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस खासकर उसके युवराज राहुल गांधी ने इसे खूब मुद्दा बनाया। राफेल का राग भी गाया गया। लेकिन इन मुद्दों का कोई असर नहीं रहा और अधिकांश चुनावों में भाजपा को विजय प्राप्त हुई। लोकसभा चुनाव में तो पार्टी ने पिछली बार से भी अधिक सीटों के साथ जीत हासिल की, वहीं कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया।

इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस सबक लेते हुए इन मुद्दों से परहेज करेगी तथा एक नए ढंग से, नए मुद्दों के साथ रचनात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करेगी। लेकिन अब जब हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों में जाहिर हो गया है कि कांग्रेस ने बीती पराजयों से कुछ नहीं सीखा है। उसके भीतर रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आया है।

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में भी राहुल गांधी की सुई नोटबंदी और जीएसटी पर ही अटकी हुई है। इन मुद्दों के बहाने प्रधानमंत्री पर अनर्गल आरोप लगाने के सिवा उनके भाषणों में और कुछ नहीं होता।  नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्यमियों की कमर तोड़ दी, अनेक बार कही गयी ये बात वे इन चुनावों में भी रटने में लगे हैं। लेकिन वे यह नहीं बता पा रहे कि अगर नोटबंदी और जीएसटी से आम जनता इतनी परेशान है तो बीते चुनावों में उसने भाजपा को जीत क्यों दिलाई और कांग्रेस को लगातार हर कहीं हार का सामना क्यों करना पड़ रहा?

प्रधानमंत्री को लेकर अंट-शंट बयानबाजी करने की राहुल गांधी की आदत में भी कोई परिवर्तन नहीं आया है। अभी पिछले दिनों एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री के लिए ‘जेबकतरा’ जैसे शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री की रणनीति एक ‘जेबकतरे’ जैसी है जो चोरी से पहले लोगों का ध्यान बाँट देता है। बीते गुरुवार को ट्विटर पर प्रधानमंत्री के लिए उन्होंने एक कार्टून शेयर करते हुए ‘BechendraModi’ जैसे शब्द का प्रयोग किया। जाहिर है, इन चुनावों में भी राहुल की भाषा का स्तर बीते चुनावों जैसा ही है।  

बीते चुनावों के दौरान भी हम राहुल की तरफ से प्रधानमंत्री के लिए खूब आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल देख चुके हैं। ‘चौकीदार चोर’, ‘शहीदों के खून की दलाली’ आदि कई और बयान हैं जिनमें राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया है।

राहुल के अलावा मणिशंकर अय्यर उनके लिए ‘नीच’ शब्द का प्रयोग कर चुके हैं, सोनिया गांधी उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्रित्व काल में ‘मौत का सौदागर’ कह चुकी हैं, मनमोहन सिंह ‘विनाशकारी’ बता चुके हैं। लेकिन ख़ास बात यही है कि जब-जब कांग्रेस ने मोदी को लेकर इस तरह की भाषा का प्रयोग किया, उसे हार का सामना करना पड़ा तथा मोदी और अधिक मजबूत होकर सामने आए। मगर इससे भी कांग्रेस ने शायद कोई सबक नहीं लिया है, तभी वर्तमान चुनावों में भी यही गलती कर रही है।

ऐसा लगता है कि आजादी के बाद लगभग छः दशक तक देश की सत्ता पर काबिज रहने के कारण कांग्रेस खुद के विपक्ष में होने को स्वीकार ही नहीं कर पा रही। विपक्ष की क्या भूमिका होती है और किस तरह से उसका निर्वाह किया जाता है, इसपर उसका कोई ध्यान ही नहीं है। वो सत्ता पक्ष के किसी भी निर्णय का केवल आँख मूंदकर विरोध करने को ही अपना काम मान चुकी है। यह विवेकहीनता नहीं तो और क्या है कि राहुल गांधी देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को भी बेमतलब सिद्ध करते हुए कह रहे कि इससे देश के युवाओं का पेट नहीं भरेगा। ऐसे नेता और पार्टी पर भला जनता कैसे भरोसा कर सकती है।  

कांग्रेस के ऐसे बयान बड़ा कारण हैं कि उसे सत्ता से बाहर करने के बाद लोग विपक्ष के रूप में उसकी भूमिका से भी संतुष्ट नहीं हो रहे, परिणामतः उसकी राजनीतिक दशा बद से बदतर होती जा रही है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में उसका सांगठनिक बिखराव और मुद्दहीनता के साथ-साथ गलतियों को दोहराते जाने की प्रवृत्ति देखते हुए मुश्किल लगता है कि जनता उसपर भरोसा करेगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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