आरसेप प्रकरण : एकबार फिर साबित हो गया कि देश सुरक्षित हाथों में है

विरोधी विशेषकर वामपंथी रूझान वाले नेता-बुद्धिजीवी लंबे अरसे से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कार्पोरेट घरानों का शुभचिंतक होने का आरोप लगाते रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने तो मोदी सरकार को सूट-बूट वालों की सरकार तक कह डाला लेकिन मोदी सरकार के कार्यों को देखें तो यही लगता है कि प्रधानमंत्री के लिए देश के आम आदमी की चिंता सर्वोपरि है। 

लंबे अरसे से मोदी सरकार को घेरने में जुटी कांग्रेस को एक बार फिर निराशा हाथ लगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समग्र क्षेत्रीय व्‍यापार समझौते (आरसीईपी-आरसेप) पर केंद्र सरकार के सलाहकार की सिफारिशों को ठुकराते हुए आरसेप पर हस्‍ताक्षर करने से इंकार कर दिया।

इस मामले में उन्‍होंने एसोचैम, फिक्‍की, सीआईआई जैसे अग्रणी उद्योग संगठनों के बजाए देश भर के किसान संगठनों, घरेलू डेयरी क्षेत्र और करोड़ों लघु व मध्‍यम उद्यमियों के हितों का ध्‍यान रखा। इसके अलावा कांग्रेसी शासन काल में हुए मुक्‍त व्‍यापार समझौतों से मिले कटु अनुभवों ने भी प्रधानमंत्री को आम आदमी के पक्ष में खड़े होने का साहस दिया। 

दरअसल आरसेप समझौते को लेकर चल रही वार्ता में भारत द्वारा उठाए गए मुद्दों और चिंताओं को दूर नहीं किया गया। वार्ता के दौरान भारत अपने उत्‍पादों के लिए बाजार पहुंच और घरेलू बाजार को बचाने के लिए कुछ वस्‍तुओं को संरक्षित सूची में रखने के लिए मजबूत रूख अपनाए हुए था। दूसरी ओर चीन, आस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड भारत के विशाल बाजार पर आंख गड़ाए थे। यदि भारत समझौते पर हस्‍ताक्षर कर देता तब देश में चीन के औद्योगिक उत्‍पादों, न्‍यूजीलैंड के डेयरी उत्‍पादों और आस्‍ट्रेलिया के अनाज का खुलेआम आयात होने लगता। 

गौरतलब है कि आरसेप एक व्‍यापारिक समझौता है जो कि सदस्‍य देशों को एक दूसरे के साथ व्‍यापार में कई सहूलियते देगा। इसमें आसियान के दस सदस्‍य देशों के साथ-साथ छह देश (चीन, कोरिया, जापान, आस्‍ट्रेलिया, न्‍यूजीलैंड और भारत) शामिल हैं।

इस मामले में सबसे बड़ी फजीहत कांग्रेस पार्टी की हुई। जैसे-जैसे समझौते की तारीख नजदीक आ रही थी, वैसे-वैसे कांग्रेस पार्टी की ओर से विरोध तेज होता गया। लेकिन मोदी विरोध की धुन में कांग्रेस पार्टी यह भूल गई कि यूपीए के शासन काल में ही 2012 में आरसेप वार्ता शुरू हुई थी। इतना ही नहीं उसने यूपीए शासनकाल में बिना मुकम्‍मल तैयारी के किए गए अन्‍य मुक्‍त व्‍यापार समझौतों के दुष्‍प्रभाव को भी भुला दिया। गौरतलब है कि यूपीए शासन काल में भारत ने आसियान समूह के साथ एक बहुपक्षीय मुक्‍त व्‍यापार समझौता (एफटीए) किया था जिससे निर्यात के मुकाबले आयात में काफी तेजी से इजाफा हुआ। 

बहरहाल, भले ही प्रधानमंत्री ने आरसेप से कदम खींच लिया हो लेकिन आसियान देशों के साथ संबंधों के मामले में स्‍पष्‍ट कर दिया कि भारत इस क्षेत्र के साथ कारोबार, निवेश और लोगों के रिश्‍तों की प्रगाढ़ता को जारी रखेगा। भारत आसियान शिखर सम्‍मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमत्री ने भारत के बहुक्षेत्रीय संबंधों के विस्‍तार की रूपरेखा प्रस्‍तुत की। उनके मुताबिक भारत और 10 सदस्‍यीय आसियान के बीच जमीनी, हवाई और समुद्री संपर्क बढ़ाने से क्षेत्रीय व्‍यापार और आर्थिक विकास को नई उंचाई मिलेगी।

समग्रत: भले ही सरकार ने आरसेप से अलग होने का फैसला किया है लेकिन उसकी एक्‍ट ईस्‍ट नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। मोदी सरकार ने एक्‍ट ईस्‍ट नीति को पूर्वी भारत के विकास से जोड़कर उसे एक नया आयाम दे दिया है।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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