अयोध्या प्रकरण : विवाद के समाधान के साथ सामाजिक सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करने वाला निर्णय

अच्छी बात रही कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी साक्ष्यों और पक्षों को धैर्य से सुना और विचार करके कानूनसम्मत और जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय दिया।  इस निर्णय से लम्बे समय से चले आ रहे इस मामले के समाधान के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव का मार्ग भी प्रशस्त हुआ  है।

अयोध्या में श्रीराम जन्म स्थान के प्रति करोड़ों हिंदुओं की आस्था रही है। इसके अलावा यहां मंदिर होने के पुरातात्विक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। यह सराहनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी का संज्ञान लिया। इसके बाद निर्णय दिया कि जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण किया जा सकेगा। 

चीफ जस्टिस रंजन गगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पांच जजों ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया है। कहा गया कि अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर बनेगा। इसके लिए तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाया जाएगा, जो मंदिर बनाने के तौर-तरीके तय करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जमीन दी जाएगी। उसने कहा कि मस्जिद बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ जमीन अयोध्या में ही दी जाएगी।

सांकेतिक चित्र

हिंदू हमेशा से मानते रहे हैं कि मस्जिद का भीतरी हिस्सा ही भगवान राम की जन्मभूमि है। इस बात के सबूत हैं कि अंग्रेजों के आने के पहले से राम चबूतरा और सीता रसोई की हिंदू पूजा करते थे। रेकॉर्ड्स बताते हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर नहीं हुआ था और जमीन के नीचे का ढांचा इस्लामिक नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदुओं की आस्था है कि भगवान राम का जन्म गुंबद के नीचे हुआ था। हिंदुओं की यह आस्था और उनका यह विश्वास कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था, निर्विवाद है। लेकिन फैसले के लिए उन्होंने क़ानून और साक्ष्यों को सर्वोपरि माना। मुख्य न्यायधीश ने यह भी कहा कि भारतीय पुरातत्व विभाग का सर्वे संदेह से परे है। इसके अध्ययन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा मामला जमीन विवाद का था। यह विवाद 2.77 एकड़ की जमीन को लेकर था। चार सौ वर्षों से इसे लेकर विवाद था। दो हजार दस में हाई कोर्ट के फैसले में विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट दिया गया था। इसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को मिला था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई थी।

स्कन्दपुराण, वाल्मीकि रामायण, वशिष्ठ संहिता, रामचरित मानस जैसे सैकड़ों ग्रंथों में  श्री राम जन्मभूमि का उल्लेख है। गौरतलब है कि 1854 के एडवर्ड थॉर्नटन गजेटियर, अवध के तत्कालीन कमिश्नर कार्नेगी, 1877 में डब्लू सी बैनेट के गजेटियर ऑफ द प्रोविंस ऑफ अवध,  1889 के आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ नार्थ वेस्ट प्रोविंस ऐंड अवध, गजेटियर ऑफ फैजाबाद 1928, इम्पीरियल यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा ऐंड अवध 1934, उत्तर प्रदेश डिस्ट्रिक्ट गजेटियर फैजाबाद 1960 आदि में कहा गया है कि श्रीराम जन्म स्थान पर प्राचीन मंदिर का विध्वंस करके मस्जिद का निर्माण किया गया था।

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षणों का भी यही निष्कर्ष रहा है। विवादित ढांचे की दीवार पांच क्रमांक पांच में मकर चिन्ह था। निर्माण हिन्दू कला के अनुरूप शुंग काल से प्रारंभ हुआ था। सिविल इंजीनियरिग के हिसाब से भी पुराने ढांचे पर मस्जिद का निर्माण हुआ था। यह गोलाकार हिन्दू धार्मिक स्थल था।  इसकी रचना श्रावस्ती के चेरीनाथ शिव मंदिर की तरह है। चन्द्रेह रीवा का शिवमन्दिर, कुरारी फतेहपुर का शिवमन्दिर, तिण्डुलि सूर्य मंदिर की रचना भी जन्मभूमि मंदिर की तरह थी।

पुरातत्व प्रमाण ऐसे हैं कि राजपूत काल तक मंदिर सुरक्षित था। इसके आस पास रिहायशी बस्ती नहीं थी। स्थापत्य के हिन्दू चिन्ह उपलब्ध रहे हैं जिनमें घट पल्लव, स्तम्भ, पुष्प, गरुण स्तंभ, देवी देवताओं के चित्र, नागरी लिपि के शिलालेख, बीस लाइन का विष्णु हरि शिलालेख है। बताया जाता है कि 1528 में बाबर के सेनापति मीरबाकी ने मंदिर का विध्वंस करके मस्जिद का निर्माण कराया था।

अच्छी बात रही कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी साक्ष्यों और पक्षों को धैर्य से सुना और विचार करके कानूनसम्मत और जनभावनाओं के अनुरूप निर्णय दिया।  इस निर्णय से लम्बे समय से चले आ रहे इस मामले के समाधान के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव का मार्ग भी प्रशस्त हुआ  है।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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