‘जब से लॉक डाउन में परमिशन मिली है तब से भट्टा चल रहा है’

समग्र रूप में देखने पर ‘जन की बात’ चैनल का ये वीडियो हमें उत्तर प्रदेश की उस जमीनी वास्तविकता से परिचित कराता है जहाँ सरकार अपने उद्योगों और ‘विश्वकर्माओं’ का पूरा ध्यान रख रही है। यहाँ श्रमिकों को किसी राज्य की सीमाओं तक छोड़ने की साजिश नहीं है, यहाँ श्रमिक केवल वोट बैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर श्रमिक को सर्वप्रथम एक मानव होने की गरिमा प्राप्त है।

‘बागपत’ जिसके बारे में कहा जाता है कि ये मूल रूप से कभी ‘व्यग्रप्रस्थ’ अर्थात बाघों की भूमि थी और 1857 के विद्रोह के दौरान तो बागपत ने ये साबित भी किया कि बाघों के साथ ये बहादुरों की भी भूमि है। वर्तमान में इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की मुख्य व्यावसायिक गतिविधि गुड़ और शुगर मिल हैं। इसके अलावा यहाँ जूते और कृषि उपकरणों के निर्माण में भी कुछ बड़ी इकाइयाँ शामिल हैं।

उस समय, जब उत्तर प्रदेश, दूसरे प्रदेशों में रह रहे अपने श्रमिकों एवं कामगारों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी की शुरुआत करने वाला देश का पहला राज्य बन रहा था, तभी ‘जन की बात’ चैनल के संपादक प्रदीप भण्डारी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में श्रमिकों की जमीनी हकीकत और सरकार के दावों की हकीकत को तलाशने पश्चिमी उत्तर प्रदेश निकले।

वीडियो की पहली बातचीत जिसमें प्रदीप द्वारा भट्टा प्रबंधकों से बात की गयी, उस बातचीत में ही एक बात तो स्पष्ट दिख रही थी कि लोग सरकार द्वारा उठाये गये लॉक डाउन के कदम से ना केवल संतुष्ट थे बल्कि योगी सरकार द्वारा प्रत्येक हाथ को काम और हर परिवार को रोजगार देने के मिशन के तहत कामगारों से जुड़ी नीतियों और नियमों में व्यापक सुधार होता भी दिख रहा था।

पूरे वीडियो के दौरान 5 अलग-अलग मजदूरों से बेहद स्वाभाविक बातचीत हुई। बातचीत के दौरान प्रदीप के सवाल लगभग एक जैसे रहे जिससे जवाबों के आधार पर वीडियो के आखिर में समस्याओं और सुधारों पर एक परिणाम तक पहुँचा जा सके।

हालांकि अभी तो उत्तर प्रदेश सरकार ने स्किल मैपिंग से हर हाथ को काम और हर घर में रोजगार उपलब्ध कराने की कार्रवाई को लगभग अंतिम चरण में पहुँचा दिया है। 11 लाख प्रवासी मजूदरों और श्रमिकों की लिस्ट तो फिक्की और इंडिया इंडस्ट्रीज एसोसिएशन जैसे संगठनों से मिल गई है, जिन्होंने इतनी बड़ी वर्कफोर्स को रोजगार देने का भरोसा दिया है लेकिन जब मजदूरों के पलायन की खबरें राष्ट्रीय फलक पर शुरू ही हुईं थीं, तभी इस विषय पर श्रम शक्ति को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी थी।

मजदूरों के साथ अपनी कई वर्चुअल मुलाकातों में मुख्यमंत्री स्पष्ट थे कि प्रदेश सरकार के प्रयास से सभी प्रवासी श्रमिकों/कामगारों को वित्तीय स्थिरता प्राप्त होगी और उनका जीवन यापन दोबारा से सुलभ होगा।

शायद ये सरकार और कामगारों के मध्य का वो विश्वास एवं संवाद ही था जिस कारण इस वीडियो में लखनऊ मुख्यालय से काफी दूर बागपत के एक ईंट भट्टे में हर मजदूर सरकार और भट्टा प्रबंधकों के फैसलों और प्रबंधन से ना केवल पूरी तरह संतुष्ट दिख रहा है बल्कि एक मजदूर ने तो खर्चे के रूप में 3000 रुपये तक मिलने की बात की।

वीडियो के दौरान एक माँग जो निकल के आई वो ये थी कि सरकार भट्टा मालिकों को लगभग एक वर्ष तक का कर्ज प्रदान करे क्योंकि उत्पाद के माँग में बड़ी गिरावट आयी है, इस माँग को केंद्र सरकार ने MSME सेक्टर के अंतर्गत स्वीकार कर लिया है।

समग्र रूप में देखने पर ये वीडियो हमें उत्तर प्रदेश की उस जमीनी वास्तविकता से परिचित कराता है जहाँ सरकार अपने उद्योगों और ‘विश्वकर्माओं’ का पूरा ध्यान रख रही है। यहाँ श्रमिकों को किसी राज्य की सीमाओं तक छोड़ने की साजिश नहीं है, यहाँ श्रमिक केवल वोट बैंक नहीं है, बल्कि यहाँ पर श्रमिक को सर्वप्रथम एक मानव होने की गरिमा प्राप्त है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)