लॉकडाउन में श्रमिकों के नामपर राजनीति करने वाले विपक्ष को आईना दिखाती हैं ये कहानियाँ

बीते दिनों लॉकडाउन के दौरान हुआ श्रमिकों का पलायन वह मुद्दा था जिसपर देश की तमाम विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने  सरकार का सहयोग करने के बजाय आरोपों की राजनीति करनी शुरू कर दी। लेकिन जमीन पर न जाने ऐसे कितने ही श्रमिकों की कहानियाँ हैं जो न केवल केंद्र सरकार की संवेदनशीलता व उत्तरदायित्वों के प्रति सजगता की चर्चा करती हैं बल्कि विपक्ष को आईना भी दिखाती हैं।

बड़ी-बड़ी विपदाएँ धनी-निर्धन, ऊँच-नीच, धार्मिक-जातिगत भेदभावों के बिना सबको प्रभावित करती हैं। ऐसे में हम सबकी ज़िम्मेदारी होती है कि हम एक समाज और देश के रूप में एकजुट होकर इसका सामना करें। संकट यदि समूची मानव जाति पर है, तो यह और भी अधिक गंभीर है।

वर्तमान समय ऐसे ही वैश्विक संकट का समय है। एक जागरूक व्यक्ति और समाज की ऐसे में ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि हम इसका कैसे डट कर सामना करें। जब सरकारें भी परेशान हैं, सामान्य जन से अधिक से अधिक सहभागिता की अपेक्षा कर रही हैं, तो हमें अपने नागरिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना चाहिए और यदि हम एक संस्था हैं, तो हमारी ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है।

बीते दिनों लॉकडाउन के दौरान हुआ श्रमिकों का पलायन वह मुद्दा था जिसपर देश की तमाम विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने  सरकार का सहयोग करने के बजाय आरोपों की राजनीति करनी शुरू कर दी। लेकिन जमीन पर न जाने ऐसे कितने ही श्रमिकों की कहानियाँ हैं जो न केवल केंद्र सरकार की संवेदनशीलता व उत्तरदायित्वों के प्रति सजगता की चर्चा करती हैं बल्कि विपक्ष को आईना भी दिखाती हैं।

सरकार जिसकी कि यह सब ज़िम्मेदारी है, उसने एक संस्थागत ढाँचे के रूप में अपने सभी विभागों के साथ बेहतर तालमेल बिठाकर बेहतरीन कार्य किया। न जाने ऐसे कितने ही श्रमिकों की कहानियाँ हैं जो एक संवेदनशील सरकार व उसके उत्तरदायित्वों की चर्चा करती हैं। सर्वाधिक श्रमिक उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से थे। MyGov के इस वीडियो में ऐसे कई मजदूरों ने अपनी कहानी बताई है।

हैदराबाद में बिहार के राजू कुमार मिश्र लॉकडाउन के कारण फँसे हुए थे। उन्होंने बताया कि एक समय उनके पास खाने तक का राशन नहीं बचा हुआ था, काम ठप होने की वजह से दैनिक कामगारों की रोज़ी-रोटी पर संकट इस समय की गंभीर समस्या थी जिससे राजू भी गुज़र ही रहे थे। उन्होंने पुलिस में जब अपने आप को पंजीकृत किया तो श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलने के बाद बस की सहायता से इन्हें स्टेशन लाया गया और ट्रेन में बिठाया गया।

राजस्थान से ट्रक में सामान की तरह भर दिए गए मज़दूरों की दुर्घटना में मृत्यु की भयानक घटना हम देख चुके हैं, लेकिन केंद्र द्वारा संचालित रेलवे ने संवेदनशीलता क़ायम रखी। इन लोगों के साथ जिस तरह का मानवोचित व्यवहार होना चाहिए, वैसा हुआ।

सोशल डिसटेंसिंग का पालन हुआ, इनके खाने-पीने का ख़याल रखा गया। सामान्य दिनों में उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेनों की स्थिति से यदि आप परिचित हैं, तो राजू कुमार मिश्र के इस भावविह्वल मुद्रा के बयान की आर्द्रता आप महसूस सकते हैं।

हरियाणा के पलवल में काम करने वाले बिहार के लखीसराय जनपद के बृजेश कुमार जो वहाँ पर टाइल्स का काम करते थे, लॉकडाउन में फँसे होने के कारण घर नहीं जा पा रहे थे, लेकिन रेलवे के इस प्रयास से उनके चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी। महाराष्ट्र से परेशान श्रमिकों को जब मध्य प्रदेश में मदद मिली तो उनके ज़ुबान से फूट पड़ा कि मानवता जीवित है।

ये सारे प्रयास सच में मानवता को जीवित रखने के प्रयास हैं। भारत सरकार ने अपने विभिन्न विभागों के साथ सही तालमेल बिठाकर यह सब किया। प्रवासियों की पीड़ा को समझकर उचित समय पर उचित निर्णय ने एक बड़ी आपाधापी को होने से बचा लिया।

उसी समय के न्यूज़ चैनल को आप देखें तो लगातार सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश, सरकार द्वारा मज़दूरों से टिकट का पैसा वसूलने, ट्रेन का 8-9 दिनों में गंतव्य पर पहुँचने जैसी अफ़वाहें देखने को मिलीं जबकि उसी समय रेलवे के दिशानिर्देश को पढ़ना ज़रूरी नहीं समझा गया कि जिसमें टिकटों के न बेचे जाने का, किराए का 85 प्रतिशत केंद्र सरकार व 15 प्रतिशत गंतव्य स्थल के राज्य द्वारा वहन किया जाना था। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों ने बाक़ायदा प्राइम टाइम कर इसे फ़ैलाया कि सरकार पैसा मज़दूरों से वसूल रही है। जबकि सच बिलकुल अलग था।

आजकल एक चलन है कि दिल्ली जैसी सरकारें कम काम का ज़्यादा प्रचार करती हैं और फिर इलाज के लिए राज्य के निवासी होने के दस्तावेज माँगने लगती हैं, लेकिन केंद्र सरकार इस कार्य को बड़ी शांति से ज़िम्मेदारी पूर्वक संपन्न करने में जुटी रही है। हम सरकारों को इसलिए नहीं चुनते हैं कि वे कोई भी कार्य कर हम पर एहसान जताएँ, अपितु यह उनकी ज़िम्मेदारी है।

भारत एक कल्याणकारी राज्य है जहाँ लोक कल्याण सरकार द्वारा किया ही जाना होता है। ऐसी परिस्थिति में इस सरकार ने बिना किसी लोभ, बिना किसी प्रचार के अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किया, एक ज़िम्मेदार सरकार से हम यही उम्मीद कर सकते थे। अफवाह गैंग कुछ भी फैलाती रहे, लेकिन ये पब्लिक है जो सब जानती है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन करते हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)