स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े पाँच रोचक प्रसंग जो हमें उनके और करीब ले जाते हैं

स्वामीजी के निधन के काफी बाद एक बार पुनः 6 फरवरी, 1921 को गांधी जी  बेलूर मठ आये थे और उन्होंने कहा था, “स्वामीजी की समस्त रचनाओं का अध्ययन मैंने ध्यानपूर्वक किया है और उन्हें पढ़ने के उपरांत आज मेरे मन में अपने देश के प्रति जो प्रेम है, वह पहले की अपेक्षा कई सहस्त्र गुना बढ़ चुका है”

मात्र 39 साल 5 महीने और 24 दिन जीने वाले स्वामी विवेकानंद के विचार आज उनकी महासमाधि के 118 साल बाद भी भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक भागों में जीवित हैं और विशेष कर भारत के करोड़ों युवाओं के वो आज भी प्रेरणा स्त्रोत हैं।

12 जनवरी, 1863 को बंगाल के कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद 25 साल की उम्र में ही परिव्राजक सन्यासी के रूप में भारत भ्रमण पर निकल गए थे, दिसम्बर 1892 के आखिरी दिनों में स्वामी विवेकानंद दक्षिण भारत के आखिरी तट कन्याकुमारी पहुंचते हैं, जहां वो समुद्र तट से कुछ दूर सागर के बीचों-बीच एक प्रख्यात शिला पर, 3 दिन-3 रात यानी कि 25, 26, 27 दिसंबर, 1892 को ध्यान करते हैं और अपने जीवन के उद्देश्य एवं योजना पर चिंतन करते हैं, जिसके बारे में हमें 19 मार्च, 1894 को शिकागो से उनके द्वारा अपने गुरु भाई स्वामी रामकृष्णानंद को लिखे एक पत्र से पता लगता है।

आनेवाले लगभग 10 साल (1893 से 1902 तक ) में, स्वामी विवेकानंद के शब्दों मे ही कहूं तो, वे 1500 वर्ष का काम कर गए। भारतीय  दर्शन और संस्कृति को पुनः उन्होंने भारतीयों के बीच रखा और विश्व को भी इसका परिचय दिया। इसी संदर्भ में अब मैं आपको स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े 5 रोचक प्रसंग बताऊंगा जिनके जरिये उनके व्यक्तित्व की विराटता का हमें और स्पष्ट भान हो सकेगा।

खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने दिया था विवेकानंद नाम

स्वामी विवेकानंद की माँ, भुवनेश्वरी देवी, भगवान शिव की भक्त थीं जिसके कारण उन्होंने स्वामी जी का नाम वीरेश्वर रखा था और घर में उनको बिले बुलाया जाता था। जब औपचारिक नामकरण हुआ तो उनका नाम नरेन्द्रनाथ रखा गया। संन्यास धारण करने के बाद स्वामी जी और उनके बाकी गुरु भाईयों ने अपने नए नाम रख लिए थे, इसलिए स्वामी जी ने अपना नाम नरेन्द्रनाथ से विविदिषानंद रख लिया।

अपने परिव्राजक जीवन के दौरान जून 1891 में स्वामी जी राजस्थान के खेतड़ी पहुंचते हैं, जहां उनकी मुलाकात खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह से होती है, राजा अजीत सिंह ने स्वामी जी को अपना गुरु मान लिया और दोनों के सम्बन्ध जीवन के आखिरी समय तक मजबूत रहे। राजा अजीत सिंह के कहने पर ही स्वामी जी ने अपना नाम विविदिषानंद से विवेकानंद रखा था।

शिकागो विश्व धर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद (साभार : India Today)

11सितम्बर,1893 की विश्व धर्म महासभा से पहले बक्से में बितायी थी रात

11 सितम्बर, 1893 की विश्व धर्म महासभा से पहले स्वामी जी को अमेरिका में अत्यंत कठिन दिन व्यतीत करने पड़े थे। रहने, खाने और ठण्ड के दिनों में पर्याप्त कपड़े नहीं होने के कारण परेशानी तो थी ही, साथ ही साथ रंग भेद का सामना भी करना पड़ा था।

स्वामी जी अपने गुरु भाइयो को पत्र में लिखते हैं कि “यदि मैं यहा ठंडी में रोग या भूख से मर भी गया तो तुम लोग इस कार्य को आगे बढ़ाना”। प्रव्राजिका मुक्तिप्राणा जी द्वारा लिखी पुस्तक परिव्राजक विवेकानंद से हमे पता लगता है कि विश्व धर्म महासभा के कार्यालय का पता और प्रो. हेनरी राइट द्वारा महासभा में भाग लेने वाला पत्र स्वामीजी से खो गया था।

अब जब रात को स्वामी जी को कोई और रास्ता न दिखा तो वह अपनी रात एक बक्से (बॉक्सकार) में बिताते हैं, सुबह ठंडी हवा के कारण ही उनकी नींद टूटती है। अगले ही दिन 11 सितम्बर, 1893 को विश्व धर्म  महासभा में अपने भाषण के बाद स्वामी जी प्रख्यात हो जाते हैं। अब उनसे मिलने वालों का और अपने घर बुलाने वालों का ताता लग जाता है।

साभार : Dainik Jagran

स्वामी विवेकानंद की अंग्रेजी सरकार करवाती थी जासूसी

भारत उस समय गुलाम था, अंग्रेज़ों का राज था। स्वामी विवेकानंद राजनीति के मार्ग से अलग अपने मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान के कार्य में लगे हुए थे। उनके व्याख्यान सुनने के लिए बड़ी संख्या में युवा भी आते थे, जो भाषण के बाद राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत हो जाते जिसके कारण अंग्रेज़ सरकार उनको संदिग्ध व्यक्ति के तौर पर देखती थी।

प्रो. शैलेन्द्रनाथ धर द्वारा लिखी पुस्तक “स्वामी विवेकानंद समग्र जीवन दर्शन” के अनुसार वर्ष 1898 में जब स्वामी जी अल्मोड़ा यात्रा पर थे, उन दिनों अंग्रेज़ उनकी निगरानी करते थे, जब यह सूचना स्वामीजी को पता लगी तो उन्होंने यह बात हंसी में उड़ा दी थी। लेकिन भगिनी निवेदिता और अन्य सहयात्रियों ने इस विषय को गंभीरता से लिया था। स्वामी जी द्वारा सम्प्रेषित पत्र डाकघरों में पढ़े जाते थे, यह तथ्य भी सामने आता है।

स्वतन्त्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक थे स्वामी जी से प्रभावित

“रेमिनिसेंसेस ऑफ़ स्वामी विवेकानंद- एन अन्थोलोजी बाय हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न ऐडमायरर्स” पुस्तक में बाल गंगाधर तिलक लिखते हैं कि एक समय जब वो बम्बई के रेलगाड़ी स्टेशन से पुणे जाने के लिए यात्री-डिब्बे में बैठे थे, उसी समय यात्री-डिब्बे में एक संन्यासी ने प्रवेश किया। वे स्वामीजी थे। स्वामीजी को जो लोग छोड़ने आये थे, वो श्री तिलक जी को जानते थे और उन्होंने स्वामीजी से उनका परिचय भी करवा दिया था और पुणे में तिलक जी के घर पर ही रहने का अनुरोध किया।

बाल गंगाधर तिलक आगे लिखते हैं कि, स्वामी जी के पास बिलकुल भी पैसे नहीं थे और वो हाथ में एक कमंडल साथ रखते थे। विश्व धर्म महासभा की सफलता के बाद जब स्वामीजी के चित्र तिलक जी ने समाचार पत्रों में देखे तो उनको याद आया कि यह वही संन्यासी हैं, जिन्होंने उनके घर पर कुछ दिन तक निवास किया था।

इसके बाद दोनों के बीच पत्र व्यवहार भी हुआ था। 1901 में जब इंडियन नेशनल कांग्रेस का 17वां अधिवेशन हुआ तो उसमें भाग लेने के लिए तिलक जी कलकत्ता आये थे, इसी दौरान वह बेलूर मठ जाकर स्वामीजी से मिले।

स्वामीजी ने उन्हें संन्यास लेने और बंगाल आकर उनका कार्यभार सँभालने को भी कहा था, क्योंकि स्वामीजी के अनुसार अपने क्षेत्र में कोई व्यक्ति इतना प्रभावशाली नहीं होता जितना सुदूर क्षेत्रों में। इस मुलाकात के बाद तिलक जी बेलूड़ मठ आये थे और स्वामीजी से मार्गदर्शन लिया था। उनके द्वारा स्थापित समाचार पत्र  “केसरी” के संपादक एन. सी. केलकर भी स्वामीजी से मिलने आये थे।

गांधीजी भी चाहते थे स्वामी विवेकानंद से मिलना (सांकेतिक चित्र, साभार : IndiaTV)

गांधी जी भी स्वामी विवेकानंद से मिलना चाहते थे

महात्मा गांधी अपनी  आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में लिखते हैं कि अपने कलकत्ता प्रवास में वो एक दिन पैदल ही बेलूर मठ की ओर चल पड़े थे, लेकिन उनको यह जानकर बहुत निराशा हुई कि स्वामीजी अस्वस्थ हैं और उनकी मुलाकत स्वामीजी से नहीं हो पाई।

हालांकि स्वामीजी की शिष्या भगिनी निवेदिता से गांधी जी 2 बार मिले थे और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा भी की थी। स्वामीजी के निधन के काफी बाद एक बार पुनः 6 फरवरी, 1921 को गांधी जी  बेलूर  मठ आये थे और उन्होंने कहा था, “स्वामीजी की समस्त रचनाओं का अध्ययन मैंने ध्यानपूर्वक किया है और उन्हें पढ़ने के उपरांत आज मेरे मन में अपने देश के प्रति जो प्रेम है, वह पहले की अपेक्षा कई सहस्त्र गुना बढ़ चुका है”।

(लेखक स्वामी विवेकानंद केंद्र के उत्तर प्रांत के युवा प्रमुख हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से वैदिक संस्कृति में सीओपी कर रहे हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)