देश याद रखेगा कि संकटकाल में जब सरकार श्रमिकों के साथ खड़ी थी, विपक्ष संकीर्ण सियासत में लगा था

जब पूरा देश कोरोना संकट से उपजी चिंताओं एवं चुनौतियों में घिरा था तब कुछ राज्य सरकारें अपनी राजनीति में व्यस्त थीं, उन्हें न तो भूखे पेट सो रहे श्रमिकों की चिंता थी न ही बिना दूध के रोते बच्चों को। इन राज्यों को पैदल चल रहे श्रमिकों के पैरों के छाले नहीं दिखे लेकिन राजनीति करने का एक अवसर दिखा। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से लेकर उसके द्वारा शासित कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक ने कोरोना काल में श्रमिकों को लेकर केंद्र सरकार पर अनगिनत आरोप लगाये लेकिन समय के साथ सच्चाई बाहर आ ही गयी।

कोरोना की महामारी से देश अब धीरे-धीरे उबरने लगा है। मामले जरूर अब भी आ रहे, लेकिन अब इस महामारी के साथ जीने की आदत लोगों ने विकसित कर ली है। बाजार और दफ्तर खुल गए हैं और लोग घरों से बाहर भी निकलने लगे हैं।

आज से दशकों बाद भी जब भारत में कोरोना के काल को याद किया जायेगा तो शायद आँखों के सामने जो तस्वीर सबसे पहले आएगी वो अस्पतालों और पीपीई किट पहने स्वास्थ्य कर्मियों की नहीं, बल्कि सैकड़ों की संख्या में पलायन कर रहे मजदूरों की होगी।

लॉकडाउन की घोषणा के कुछ दिनों के बाद सड़कों पर उमड़ी प्रवासी श्रमिकों की भीड़ किसी को भी परेशान करने के लिए काफी थी। इस पलायन के बाद अनगिनत सवाल सामने थे.. कि इनका क्या होगा? भोजन-पानी की व्यवस्था कैसे होगी? ये घर तक कैसे पहुंचेंगे? इन्हें संक्रमण से कैसे बचाया जायेगा?

जब पूरा देश इन चिंताओं में घिरा था तब कुछ राज्य सरकारें अपनी राजनीति में व्यस्त थीं, उन्हें न तो भूखे पेट सो रहे श्रमिकों की चिंता थी न ही बिना दूध के रोते बच्चों को। इन राज्यों को पैदल चल रहे श्रमिकों के पैरों के छाले नहीं दिखे लेकिन राजनीति करने का एक अवसर दिखा। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से लेकर उसके द्वारा शासित कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक ने कोरोना काल में श्रमिकों को लेकर केंद्र सरकार पर अनगिनत आरोप लगाये लेकिन समय के साथ सच्चाई बाहर आ ही गयी।

बात प्रियंका गाँधी के सैंकड़ों बसें भेजने की दावों की हो या मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा ट्रेन उपलब्ध न करवाने के आरोपों की, जनता ने चुप चाप सब देखा और समझने की कोशिश करती रही कि कौन उसके हितों की रक्षा करने में सक्षम है।

जैसे हीं श्रमिकों के पलायन की शुरुआत हुई वैसे ही केंद्र सरकार तुरंत एक्शन में आ गयी थी, जगह-जगह श्रमिकों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करवाई गयी। जो छात्र अपने राज्यों से बाहर रहकर पढ़ाई कर रहे थे उन्हें उनके घर भेजने की व्यवस्था की गई और मध्यप्रदेश की सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि छात्र जहां पर रुके हुए हैं वहां उन्हें कोई असुविधा ना हो। मध्य प्रदेश सरकार ने प्रदेश के अलग-अलग जिलों में फंसे छात्रों को घर भेजने के लिए ट्रेन की व्यवस्था की।

भारतीय रेलवे के यूट्यूब चैनल पर उपस्थित एक वीडियो पूरी स्थिति को स्पष्ट कर देता है। यह विडियो हबीबगंज से रीवा के लिए चलाई गई ट्रेन का है जिससे श्रमिक और छात्र अपने घरों को जा रहे हैं। इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि प्रशासन द्वारा रेलवे स्टेशन में सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करने के लिए गोले बनाए गए हैं, और नियमों का पालन करवाने के लिए पुलिस की भी तैनाती की गई है।

प्लेटफार्म पर जाने से पहले यात्रियों की थर्मल स्कैनिंग की जा रही है ताकि अगर किसी में कोरोना वायरस के लक्षण हों तो उसे ट्रेन पर चढ़ने से पहले पहचाना जा सके। प्लेटफार्म के बाहर ही सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा यात्रियों के लिए भोजन की भी व्यवस्था की गई है।

वीडियो में एक महिला यात्री को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि “सारी व्यवस्थाएं बहुत अच्छी हैं। थर्मल स्कैनिंग की जा रही है सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा जा रहा है और सभी यात्रियों के लिए भोजन की अच्छी व्यवस्था की गई।“ इस यात्री द्वारा कही गयी बातें हीं विपक्ष द्वारा लगाये गए सभी आरोपों का जवाब है।

एक और यात्री वीडियो में बता रहे हैं कि वह ‘दो महीने से लॉकडाउन के कारण भोपाल में फंसे थे। उन्हें उनके घर भेजने के लिए ट्रेन की व्यवस्था की गई और निश्चित तिथि से तीन-चार दिन पहले ही उन्हें उनके ट्रेन की सूचना दे दी गई थी।’ यात्री कह रहे हैं कि खाने की अच्छी व्यवस्था की गई है और हम सब इस से बहुत खुश हैं कि हम आखिरकार अपने घर जा रहे हैं। इस यात्री के चेहरे से झलकती घर जाने की ख़ुशी ही प्रशासन के लिए पारितोषिक और केंद्र सरकार के सुप्रबंधन का प्रमाण है।

लॉकडाउन के दौरान इमरजेंसी सेवाओं में लगे डॉक्टर और पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों का पालन तो कर ही रहे थे, लेकिन साथ ही देशभर से कुछ ऐसी तस्वीरें भी सामने आयीं जिन्होंने यह दिखाया कि हमारे पुलिसकर्मी और डॉक्टर अपने कर्तव्यों के साथ मानवीय संवेदना को लेकर भी संवेदनशील हैं।

जबलपुर रेलवे स्टेशन की एक वीडियो में देखा जा सकता है कि एक पुलिस वाला अपने घर वापस जा रहे प्रवासी श्रमिकों के साथ आ रही एक बच्ची को चप्पल दे रहा है। यह बच्ची शायद कई किलोमीटर दूर से चलकर आई होगी लेकिन सरकार द्वारा रेलवे स्टेशन पर की गई व्यवस्थाओं के कारण उसकी घर की दूरी कम हो गई, अब उसे और पैदल चलना नहीं पड़ेगा। उसके पैदल चलने के इन्हीं जख्मों पर पुलिस कर्मी की यह संवेदनशीलता मरहम लगाने का काम कर रही है।

सरकार और प्रशासन के साथ भारत का समाज भी लॉकडाउन के दौरान बढ़-चढ़ कर आगे आया। प्रधानमंत्री ने अपने 15 अगस्त के भाषण में कहा था कि देश में सिर्फ दो तरह के लोग हैं। एक जो जरुरतमंद हैं और दूसरे वो जो इन जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। कोरोना के इस संकट में प्रधानमंत्री का यह वाक्य साक्षात् हो गया, समाज का हर सक्षम व्यक्ति किसी न किसी तरह जरुरतमंदों की मदद में लगा था। कोई भोजन पानी की व्यवस्था में लगा था, तो कोई दवाइयों की चिंता कर रहा था।

कई मकान मालिकों ने किरायेदारों से किराया नहीं लिया तो कई लोग एक फ़ोन कॉल पर हर तरह की सहायता के लिए उपलब्ध रहे। सरकार और समाज के आपसी सहयोग के कारण ही यह संभव हो पाया कि इतनी बड़ी संख्या में हुए पलायन के बावजूद स्थितियां नियंत्रण में रहीं और कोई बड़ी अनहोनी घटना नहीं हुई।

लेकिन शर्मनाक है कि जब सरकार और समाज सेवा कार्यों में व्यस्त थे तब देश का राजनीतिक विपक्ष बयानबाजी और राजनीति में व्यस्त था, देश महामारी झेल रहा था और विपक्ष पार्टी पॉलिटिक्स में उलझा था। भारत का समाज जब कभी भी कोरोना के इस संकट को याद करेगा तो वह सरकार की संवेदनशीलता, कर्तव्यपरायणता और व्यवस्था के साथ विपक्ष की इस काली छाया को भी जरुर याद रखेगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)