कोरोना काल में तो कम से कम अपनी नफरत की राजनीति छोड़ें ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल वो राज्य है, जहां अस्पतालों में भर्ती मरीजों की तो छोड़िए, इलाज करने वाले तमाम डॉक्टरों को भी पीपीई किट मुहैया नहीं कराया गया और उन्हें रेनकोट पहन अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना मरीजों का इलाज करना पड़ रहा। पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार के राज में स्थिति क्या है, ये स्वयं वहां के क्वारंटाइन सेंटर और अस्पतालों में जाने पर पता चल जाता है।

कोरोना महामारी ने आज पूरे विश्व को बुरी तरह प्रभावित किया है। चाहे वो विकसित देश हों या विकासशील, इस महामारी में सबकी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। यहाँ तक कि अमेरिका और यूरोप के देश जिनके स्वास्थ्य व्यवस्था का उदाहरण दिया जाता था, वो खुद आज कोरोना वायरस के सामने बेबस नजर आ रहे हैं।

चीन से पूरे विश्व में फैलने वाले इस वायरस ने हम सभी को घरों में कैद कर दिया है। लेकिन, इस महामारी के दौरान समस्त विश्व ने भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना से जंग में निभाई गई अग्रणी भूमिका को सराहा है। चाहे वो अमेरिका समेत अनेक देशों को पीपीई किट पहुँचाना हो या एचसीक्यू दवा पहुँचाना हो, भारत ने हर मोर्चे पर सकारात्मक पहल की है।

गौरतलब है कि देश के अंदर कोरोना से स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या 64 प्रतिशत से ऊपर जाना और मृत्यु दर का अन्य देशों की तुलना में कम होना केंद्र सरकार के नेतृत्व में कोरोना के खिलाफ मजबूत लड़ाई की कहानी बयान करता है।

सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लगातार बैठक करने का ही नतीजा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच समन्वय बना रहा और दोनों मिलकर कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। परन्तु, इसमें पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार सबसे बड़ा अपवाद है, क्योंकि, ये ऐसी सरकार है, जिसने कोरोना काल में भी अपनी राजनीति को सर्वोपरि रखा और जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया।

पश्चिम बंगाल वो राज्य है, जहां अस्पतालों में भर्ती मरीजों की तो छोड़िए, इलाज करने वाले तमाम डॉक्टरों को भी पीपीई किट मुहैया नहीं कराया गया और उन्हें रेनकोट पहन अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना मरीजों का इलाज करना पड़ रहा। पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार के राज में स्थिति क्या है, ये स्वयं वहां के क्वारंटाइन सेंटर और अस्पतालों में जाने पर पता चल जाता है।

उदाहरण के लिए प्रस्तुत वीडियो के माध्यम से ‘जन की बात’ के संपादक प्रदीप भंडारी ने पश्चिम बंगाल के जितारपुर गांव स्थित एक क्वारंटाइन सेंटर का दौरा किया और वहां उत्तर प्रदेश, केरल, राजस्थान व अन्य राज्यों से वापस आए प्रवासी श्रमिकों से बातचीत कर वहां का जायजा लिया।

बातचीत के दौरान प्रवासी मजदूरों ने ममता बनर्जी सरकार की पोल खोलने वाली सच्चाई बताई, वही सच्चाई जिसे छुपाने के लिए ममता बनर्जी समेत उनकी पार्टी के नेता झूठ का सहारा लेते रहते हैं। इन प्रवासी श्रमिकों ने बताया कि इस सेंटर में आए हुए सात दिन बीत चुके हैं, लेकिन अबतक उनकी टेस्टिंग नहीं हुई है।

सवाल यह है कि जब बिना टेस्टिंग किए ममता सरकार इन प्रवासी श्रमिकों को 14 दिन बाद इनके घर भेज देगी तो क्या उनके घरवालों पर कोरोना का खतरा नहीं होगा। स्पष्ट है कि ये एक संवेदनहीन सरकार है जिसने ना तो क्वारंटाइन सेंटर पर टेस्टिंग की कोई व्यवस्था की है, ना ही स्वच्छता का ध्यान रखा है। और तो और, यहाँ पर प्रवासी श्रमिकों को खाना भी खुद ही तैयार करना पड़ता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं यह कहती हैं कि, ‘उनके पास कोरोना वायरस पर ध्यान देने के अलावा और भी अन्य जरुरी काम हैं’। ये दर्शाता है कि उनकी सरकार इस महामारी को लेकर खुद कितनी गंभीर है। जब भारतीय रेलवे द्वारा प्रवासी श्रमिकों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई जा रही थीं, तब पश्चिम बंगाल का रवैया उसपर भी नकारात्मक ही रहा था।

ये सरकार कहती थी कि, ‘प्रवासी श्रमिकों से राज्य में कोरोना फैलेगा।’ पश्चिम बंगाल सरकार स्वयं तो कोरोना महामारी को लेकर गंभीर नहीं दिखाई पड़ती और यदि केंद्र की मोदी सरकार की ओर से विशेष दल पश्चिम बंगाल राज्य की स्थिति का जायजा लेने पहुँचता है तो उसे रोक दिया जाता है। यह स्थिति भयावह है कि कोई राज्य सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्र सरकार से अपनी नफरत के कारण जनता के दमन पर उतारू है।

कोरोना से जंग में ममता बनर्जी को चाहिए कि वह अपना हठ छोड़कर राज्य की जनता के स्वास्थ्य की चिंता करें और अपनी नफरत से प्रेरित राजनीति को कुछ समय के लिए विराम दें।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)