अरविन्द जयतिलक

इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल हो आपातकाल

एक जिम्मेदार राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह अपनी आने वाली हर पीढ़ी को देश के इतिहास, संस्कृति, धर्म-दर्शन और जनतांत्रिक मूल्यों से अवगत कराए तथा साथ ही उन अलोकतांत्रिक तानाशाही विचारों को भी उद्घाटित करे जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के विरुद्ध रहा है। यह तभी संभव होगा जब इतिहास के प्रत्येक प्रसंगों को शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ा

राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता पर एक बड़ी मुहर साबित हुआ अविश्वास प्रस्ताव

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री के समक्ष पहुंचकर उन्हें कुर्सी से उठाने की कोशिश के साथ गले पड़कर प्रायोजित प्रहसन को अंजाम दिया, उससे न सिर्फ संसदीय गरिमा का क्षरण हुआ है, बल्कि राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता पर भी मुहर लगी है। हद तो तब हो गयी

तुष्टिकरण का जो दांव कभी हिटलर ने खेला था, आज कांग्रेस भी उसीको आजमाने में लगी है!

पानी को उबलने के लिए भी सौ डिग्री तापमान का इंतजार होता है, लेकिन कांग्रेस दिल्ली का सिंहासन हथियाने के लिए किस कदर बेकरार है, ये इसी से समझा जा सकता है कि उसने अपने सिपाहसालारों को तुष्टिकरण के घातक हथियार से देश को छलनी करने का जिम्मा सौंप दिया है। उसके सिपाहसालार तुष्टिकरण के घातक औंजारों से देश की नस-नस में जहर उतारना

नेशनल हेराल्ड केस : आयकर विभाग की जांच से इतना घबरा क्यों रही है कांग्रेस ?

नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा यंग इंडियन कंपनी की जांच आयकर विभाग से कराए जाने का आदेश दिए जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ गयी है। उच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक अब कंपनी को अपने दस्तावेज आयकर विभाग को सौंपने ही होंगे। बता दें कि इस मामले में पटियाला हाउस कोर्ट ने जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद सोनिया और

इतिहास बताता है कि राष्ट्र के लिए हर प्रकार से घातक सिद्ध हुए हैं वामपंथी !

सैद्धांतिक तौर पर वामपंथी विचारधारा उस पक्ष की संवाहक है, जो समाज को बदलकर उसमें अधिक आर्थिक बराबरी का दावा करती है। लेकिन जिस तरह वह राजनीतिक आंदोलन और सर्वहारा वर्ग की क्रांति की आड़ में सत्ता की कमान हड़पकर विचारधारा के फैलाव के लिए हिंसा का सहारा लेती है, उससे साफ है कि उसका व्यवहारिक पक्ष विचारधारा कम, हिंसा का खौलता हुआ कुंड ज्यादा है। वामपंथी विचारधारा के गर्भ

आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के भारत दौरे से नये क्षितिज की ओर भारत-आस्ट्रेलिया सम्बन्ध

पिछले दिनों आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नयी सुगंधियों से भर दिया। दोनों देशों ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, सीमा पार संगठित अपराध से निपटने में सहयोग, विमानन सुरक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य और औषधि इत्यादि क्षेत्रों में एकदूसरे का सहयोग करने की प्रतिबद्धता व्यक्त कर द्विपक्षीय संबंधों को नए आयाम देने के साथ आपसी कारोबार एवं भू-सामरिक साझेदारी की नींव रख दी

उनका इतिहास कमजोर है, जिन्हें आज़ादी की लड़ाई में संघ का योगदान नहीं दिखता !

संघ की शाखाएं राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला है जहां स्वयंसेवकों को राष्ट्रीय व सामाजिक गुणों से लैस किया जाता है। संघ के अनेकों संगठन मसलन सेवा भारती, विद्या भारती, स्वदेशी जागरण मंच, हिंदू स्वयंसेवक संघ, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय किसान संघ अपने कार्यों से देश के रचनात्मक विकास में योगदान दे रहे हैं। सच तो यह है कि

सेना के कठोर रुख पर सवाल उठाने वाले सेना के साथ बदसलूकी पर खामोश क्यों हैं ?

पिछले दिनों श्रीनगर में चुनाव कराकर लौट रहे सीआरपीएफ के जवानों के साथ जिस तरह कश्मीर के बिगड़े और अराजक नौजवानों ने उन पर लात-घूसा बरसा बदसलूकी की और बड़गाम चाडूरा (बड़गाम) में हिजबुल मुजाहिदीन के खतरनाक आतंकी को बचाने के लिए सेना पर पत्थरबाजी की, उससे देश सन्न है। हथियारों से लैस होने के बावजूद भी सीआरपीएफ के जवानों ने तनिक भी प्रतिक्रिया

मनमोहन सिंह पर प्रधानमंत्री मोदी के तंज़ से इतना बौखलाई क्यों है कांग्रेस ?

शब्दों के अर्थ को अनर्थ के फ्रेम में फिटकर किस तरह वितंडा खड़ा किया जाता है, यह कोई कांग्रेस से सीखे। संभवतः कांग्रेस खुद को भाषा की शुचिता और संसदीय मर्यादा का एकमात्र व्याकरणाचार्य और पैमाना समझ ली है, अन्यथा वह संसदीय विमर्श के शब्दों पर खुद को उपहास का पात्र नहीं बनाती। आश्चर्य है कि जब उसके सदस्य, संसद और सड़क पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिटलर, मुसोलिनी और

अखिलेश राज की नाकामियों को ढँकने की कवायद है अंतर्कलह का समाजवादी नाटक

वर्चस्व की जंग के बीच भले ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के दरम्यान सीजफायर का एलान न हुआ हो और दोनों तरफ से तनातनी बनी हो पर सियासी इजारदारी पर हक जताने की इस आपाधापी में घंटे-आधे घंटे के लिए क्रांतिकारी बने अखिलेश यादव और पुराने जमींदारों की तरह बर्ताव करते देखे गए सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव दोनों के बीच समाजवादी किले पर