आशीष कुमार अंशु

केरल में सन 1968 से चल रहा एकतरफा (कम्यूनिस्ट) आक्रमण : जे. नंदकुमार

पुस्तक मेले में पिछले दिनों ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता’ विषय पर ‘मीडिया स्कैन’ के आयोजन में चर्चा के दौरान केरल में कम्यूनिस्टों का जो चेहरा सामने आया, उस पर चर्चा होनी चाहिए। केरल से यह खबर आती है कि आग से झुलस कर एक नेता की मौत। नेता गैर-कम्यूनिस्ट पार्टी का होता है। यह खबर बनती है, लेकिन क्या वास्तव में खबर इतनी ही है या इसके पीछे विचारधारा का कोई संघर्ष है।

नजीब मामले में उजागर हुई वामपंथी छात्र संगठनों की संदिग्ध भूमिका

नजीब के नाम पर वामपंथी संगठन और कांग्रेस के नेताओं के साथ तीन नवंबर को जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अरविन्द केजरीवाल भाषण देते हुए नजर आए तो उनकी यही बात बरबस याद आ गई, ‘‘सब मिले हुए हैं जी।’’ नजीब के नाम पर अरविन्द केजरीवाल जरूर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पहुंच गए, लेकिन ये नजीब, अरविन्द के पुराने मित्र दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग नहीं थे, बल्कि

तीन तलाक के मसले पर मौन क्यों है वामपंथी गिरोह ?

भारतीय कम्यूनिस्टों की चुप्पी इस समय उनके पक्ष का इजहार कर रही है। देश के कॉमरेड-फेमिनिस्ट और चर्च के इशारे पर अम्बेडकर के नाम की माला जपने वाले अम्बेडकरवादी भी इस समय चुप हैं। वे जानते हैं कि इस समय वे बोलेंगें तो अपनी पोल खोलेंगे। भारतीय जनता पार्टी को स्यूडो कम्यूनिस्ट एन्टीलेक्चुअल्स ने ही महिला विरोधी प्रचाारित किया था। यह समय कैसे संयोग का समय है कि भारतीय जनता पार्टी

यूपी चुनाव आते ही लामबंद होने लगा असहिष्णुता गिरोह

असहिष्णुता की बहस को गुजरे अधिक समय नहीं हुआ। यदि आप असहिष्णुता की पूरी बहस में सक्रिय गिरोह की भूमिका को याद करें तो यह बिहार चुनाव से ठीक पहले सक्रिय हुआ था और बिहार चुनाव के ठीक बाद असहिष्णुता की पूरी बहस शांत हुई थी। चुनाव के दौरान अखलाक की हत्या को कमान बनाकर वामपंथी गिरोह ने बिहार चुनाव में तीर चलाया था। खैर, नीतीश की जीत के बाद असहिष्णुता की पूरी

दलितों के उत्थान की आड़ में धर्मान्तरण का खुला खेल, वामपंथी भी हैं शामिल!

यदि हम भारत में धर्मान्तरण के मुद्दे को लेकर गम्भीर हैं तो हमें सुनील सरदार और जोसेफ डिसूजा का नाम जानना चाहिए। सुनील सरदार महाराष्ट्र से हैं और ट्रूथसिकर्स इंटरनेशनल के नाम से एक गैर सरकारी संस्था चलाते हैं। यह धर्मान्तरण का भारत में बड़ा खिलाड़ी है। सुनील सरदार घोषित तौर पर धर्मान्तरण के माध्यम से भारत में जिसस का किंगडम स्थापित करना चाहता है।

दक्षिणपंथी साहित्यकारों के साथ अपना नाम देखते ही भड़क गईं कॉमरेड कृष्णा सोबती, खुली वामपंथी सहिष्णुता की पोल!

बौद्धिक आतंकवाद शब्द पर पिछले लंबे समय से मीडिया और समानान्तर सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है। इस विषय में अभी तक अपनी कोई राय नहीं बना पाया हूं, लेकिन बौद्धिक सवर्णवाद को लेकर अब अपनी एक धारणा बन गई है। इस देश का कम्यूनिस्ट तबका खुद को बौद्धिक सवर्ण समझता है और राष्ट्रवादी विचारकों को जिसे आजकल दक्षिणपंथी कहने का चलन है, अछूत समझता है।

मोदी के बयान के बाद फिर बोला बलूचिस्तान, ‘हम लेके रहेंगे आजादी!’

एक भारतीय के नाते खबरिया चैनल पर इस तरह की बहस सुनने का यह पहला अनुभव था। जिसमें पाकिस्तान पैनलिस्ट सफकात सईद को बलूचिस्तानी पैनलिस्ट तारिक फतह कहते हैं- ‘‘तुम अपने पूर्वजो को भूल सकते हो। मैं नही भूल सकता। इस नाते मैं हिन्दूस्तानी हूं। तुम पाकिस्तानी भी हिन्दूस्तानी हो। अफगानी भी हिन्दूस्तानी हैं। बलूचिस्तानी भी हिन्दूस्तानी है।’’

अगर यही राष्ट्रवाद के उभार का दौर है तो सोचिये राष्ट्रवाद के बुरे दिन कैसे रहे होंगे!

यह बात दुनिया भर के विद्वान कह रहे हैं कि यह भारत के अंदर राष्ट्रवाद के उभार का समय है। लेकिन, इसी समय में जेएनयू की एक छात्रा देवी सरस्वती का अपमान करने के लिए भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित की जाती है। इस बात पर यकिन नहीं किया जा सकता है कि पुरस्कार के निर्णायक को कवयित्री के अश्लील रचना का ज्ञान ना हो।

एक गौभक्त दलित की हत्या को कैसे खा गये सेक्युलर, पचा गयी थी मीडिया!

विश्व हिन्दू परिषद की एक स्टीरियोटाइप की छवि मीडिया ने बनाई है। जिसमें इस संगठन से जुड़े व्यक्ति के हाथ में तलवार होना अनिवार्य है। मीडिया द्वारा इनका चित्र ऐसा उकेरा गया है कि सिर पर भगवा कपड़ा बांधे, हाथ में भगवा ध्वज लिए जो युवक खड़ा होगा जिसके दूसरे हाथ में तलवार हो, वो विश्व हिन्दू परिषद का ही होगा। उसके बाद ही वह मीडिया में विश्व हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता माना जाएगा। एक बात और उसके सिर पर तिलक होना भी जरूरी है।