डॉ कृष्णगोपाल मिश्र

जिनकी सरकारों ने कभी सीमा पर ध्यान नहीं दिया, वे सीमा सुरक्षा को लेकर पीएम पर किस मुंह से सवाल उठा रहे हैं?

यह देश का सौभाग्य ही है कि उसने ऐसे कुचक्रों एवं भ्रामक प्रचारों को अस्वीकृत कर निर्वाचित नेतृत्व को और अधिक सशक्त बनाकर अपनी प्रगति का पथ प्रशस्त किया।

राष्ट्र की प्रगति के लिए हिंदी की सर्वस्वीकार्यता आवश्यक

गृहमंत्री अमित शाह के हिंदी के पक्ष में प्रस्तुत वक्तव्य–‘भारत’ विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है मगर पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने। आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वह सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है।‘– का विरोध करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य नेताओं को नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह कथन स्मरण रखना चाहिए कि

पितृ दिवस : पिता तो आज भी पहले जैसे ही हैं, पर पुत्र बदलते जा रहे!

‘पिता’ शब्द् संतान के लिए सुरक्षा-कवच है। पिता एक छत है, जिसके आश्रय में संतान विपत्ति के झंझावातों से स्वयं को सुरक्षित पाती है। पिता संतान के जन्म का कारण तो है ही, साथ ही उसके पालन-पोषण और संरक्षण का भी पर्याय है। पिता आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति की गारंटी है। पिता शिशु के लिए उल्लास है; किशोर और तरुण के लिए सर्वोत्तम प्रेरक एवं पथ-

जीवन के वांग्मय का सबसे प्यारा शब्द है ‘माँ’

भारतीय वाड्मय में माता का अभिप्राय और स्वरूप अत्यंत विशद है । शब्दकोशों के अनुसार माता स्त्रीलिंग संज्ञा शब्द है। यह ऐसा संबोधन सूचक पद है जिसमें आदर और श्रद्धा का भाव स्वतः समाहित है। नारियों के लिए संबोधन सूचक अन्य शब्दों में वह गरिमा नहीं मिलती जो माता शब्द में है। इसीलिए भारतीय मन

धर्मपालन के आदर्श प्रतिमान हैं राम !

रामचरित के प्रथम गायक आदिकवि वाल्मीकि ने राम को धर्म की प्रतिमूर्ति कहा है। उनके अनुसार -‘रामो विग्रहवान धर्मः।’ अर्थात राम धर्म का साक्षात श्री-विग्रह हैं। धर्म को मनीषियों ने विविध प्रकार से व्याख्यायित किया है। महाराज मनु के अनुसार – धृति, क्षमा, दमन (दुष्टों का दमन), अस्तेय (चोरी न करना), शुचिता, इन्द्रिय-निग्रह (समाज विरोधी, परपीड़नकारी इच्छाओं पर नियन्त्रण), धी, विद्या, सत्यनिष्ठा और अक्रोध–धर्म के

‘स्त्री न पहले कभी अबला रही और न अब है’

संसार की आधी आबादी महिलाओं की है। अतः विश्व की सुख-शांति और समृद्धि में उनकी भूमिका भी विशेष रुप से रेखांकनीय है। भारतीय-चिन्तन-परम्परा में यह तथ्य प्रारंभ से ही स्वीकार किया जाता रहा है। इसलिए भारतीय-संस्कृति में नारी सर्वत्र शक्ति-स्वरुपा है; देवी रुप में प्रतिष्ठित है।

शिक्षा केवल साक्षरता का माध्यम नहीं, मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला है!

आज ‘शिक्षा’ का अर्थ साक्षरता और सूचनात्मक जानकारियों से समृद्ध होना है और आज की शिक्षा का उद्देश्य किसी शासकीय, अशासकीय कार्यालय का वेतनभोगी अधिकारी-कर्मचारी बनना भर है। इस अर्थ में शिक्षा अपने वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य से बहुत दूर है और तथाकथित शिक्षित उत्पन्न कर आधी अधूरी क्षमताओं वाले बेरोजगारों की भीड़ जुटा रही है। आधुनिक शिक्षा की

सामान्य भारतीय जन के प्रतीक हैं भगवान शिव !

त्याग और तपस्या के प्रतिरुप भगवान शिव लोक-कल्याण के अधिष्ठाता देवता हैं। वे संसार की समस्त विलासिताओं और ऐश्वर्य प्रदर्शन की प्रवृत्तियों से दूर हैं। सर्वशक्ति सम्पन्न होकर भी अहंकार से मुक्त रह पाने का आत्मसंयम उन्हें देवाधिदेव महादेव का पद प्रदान करता है। शास्त्रों में शिव को तमोगुण का देवता कहा गया है, किन्तु उनका पुराण-वर्णित कृतित्व उन्हें सतोगुणी और कल्याणकारी देवता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

दीपावली विशेष : अबकी इस प्रकार करें लक्ष्मी पूजन !

स्वतंत्रता-प्राप्ति से पूर्व हमारे देशवासियों ने भावी भारत के रूप में सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का सपना देखा था। उन्हें विश्वास था कि अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिलते ही हम भारतीयों का ‘स्वराज्य’ स्वावलम्वन से सशक्त और सम्पन्न बनकर ‘सुराज’ की स्वार्णिम कल्पनाएं साकार करेगा। प्रख्यात सुकवि-नाटककार जयशंकर प्रसाद कृत ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के निम्नांकित गीत में इस जनभावना की अनुगूँज दूर तक सुनाई देती है-

हिन्दी दिवस : अपनी शक्ति और सामर्थ्य को हर मोर्चे पर सिद्ध कर रही हिन्दी

हिन्दी अपने आविर्भाव काल से लेकर अब तक निरन्तर जनभाषा रही है। उसका संरक्षण और संवर्द्धन सत्ता ने नहीं, संतों ने किया है। भारतवर्ष में उसका उद्भव और विकास प्रायः उस युग में हुआ जब फारसी और अंग्रेजी सत्ता द्वारा पोषित हो रही थीं। मुगल दरबारों ने फारसी को और अंग्रेजी शासन ने अंग्रेजी को सरकारी काम-काज की भाषा बनाया। परिणामतः दरबारी और सरकारी नौकरियाँ करने वालों ने फारसी और अंग्रेजी का