शैलेन्द्र कुमार शुक्ला

बाबा साहब की उपेक्षा करने वाली कांग्रेस रामनाथ कोविंद को भला कैसे स्वीकार कर सकती है !

कल यानी सोमवार 19 जून को जब भारत के अगले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए राजग की ओर से बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद जी को उम्मीदवार घोषित किया गया, तब से विपक्षी पार्टियां खासकर कांग्रेस और वामपंथी दल सन्नाटे में आ गए हैं। दरअसल यह रामनाथ कोविंद अथवा भाजपा-संघ का विरोध नहीं है, यह एक सामंतवादी मानसिकता है जो समय-समय पर उभर कर सामने आती है, उसका स्वरूप अलग

आज़ाद भारत के पुनर्निर्माण के प्रति चिंतित थे दीनदयाल उपाध्याय

देेश जब गुलामी के दौर से गुजर रहा था, उस समय देश के नागरिकों और तत्कालीन नेताओं, बुद्धिजीवियों, छात्रों एवं समाजसेवियों का एक मात्र उद्देश्य था कि देश को अग्रेजों से आजाद कराया जाए। भारत माँ की गुलामी की बेड़ियों को किस प्रकार से तोड़ा जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए, इस देश के असंख्य आजादी के दीवानों ने अपने-अपने तरीके से कार्य किया तथा आजादी की लड़ाई लड़ी। इनमें कई वर्ग ऐसे थे

दीनदयाल उपाध्याय : जिनके लिए राजनीति साध्य नहीं, साधन थी !

भारतीय राजनीति में दीनदयाल जी का प्रवेश कतिपय लोगों को नीचे से ऊपर उठने की कहानी मालुम पड़ती है। किन्तु वास्तविक कथा दूसरी है। दीनदयाल जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में रहकर जिस आंतरिक व महती सूक्ष्म भूमिका को प्राप्त कर लिया था, उसी पर वे अपने शेष कर्म शंकुल जीवन में खड़े रहे। उस भूमिका से वे लोकोत्तर हो सकते थे, लोकमय तो वो थे ही। देश के चिन्तक वर्ग को कभी-कभी लगता है कि

राजनीति नहीं, राष्ट्रवाद की पोषक थी दीनदयाल उपाध्याय की भावना

भारतीय स्वतंत्रता के पूर्व राम राज्य की जो परिकल्पना पेश की गयी थी, उसे कांग्रेस की छद्म धर्मनिरपेक्षता निगल गयी। कांग्रेस ने आजादी के पहले ही अपने लिए एक रास्ता तय कर लिया था, जहां मुस्लिम तुष्टिकरण को धर्मनिपेक्षता का आवरण ओढ़ा दिया गया और इसके सहारे बहुसंख्यक हिंदुओं के मूल भावना से लगातार खिलवाड़ किया जाने लगा। इस कुकृत्य में तब के कांग्रेस के सभी शीर्ष नेता शामिल थे।

भारत की प्रगति के लिए ‘भारतीयता’ को आवश्यक मानते थे पं दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जितनी समझ भारतीय संस्कृति और दर्शन की थी, उतनी ही राजनीति की भी थी। व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त राजनीति पर वे हमेशा प्रहार करते थे। पंडित जी जब उत्तर प्रदेश के सह प्रांत-प्रचारक थे, उस समय उनके निशाने पर भारत सरकार की गलत नीतियों के साथ-साथ देश में फैली निराशा भी रहती थी। उस समय देश में कांग्रस की सरकार थी और उस समय देश के प्रधानमंत्री

चन्द्रगुप्त : पंडित दीनदयाल उपाध्याय कृत एक नाटक जो राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है

भारत के राजनीतिक इतिहास के पितृ पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक राजनेता के साथ-साथ कुशल संगठक तथा मूर्धन्य साहित्यकार भी थे। साहित्य की हर विधा पर उनकी समान पकड़ थी। कहानी, नाटक, रिपोर्ताज, कविता और यात्रा वृतांत में उनको महारत हासिल था। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जो उक्त बातों की पुष्टि करते हैं। उनके साहित्य-सृजन की कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण स्थान ‘चंद्रगुप्त’ का

स्मृति शेष : सांगठनिक अनुशासन, जनकल्याण और राष्ट्र की प्रगति के प्रति प्रतिबद्ध थे सुन्दरलाल पटवा

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता स्व. श्री सुंदरलाल पटवा जी का जन्म मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के कुकडेश्वर कस्बे में हुआ था। उनका परिवार श्वेतांबर जैन धर्म को मानने वाला था। उनका परिवार धार्मिक तथा राष्ट्रवादी प्रवृत्ति का था। उनके पिता श्री मन्नालाल जैन उस समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी तथा समाजसेवी थे। परिवार की धार्मिक गतिविधियों तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के

भारतीयता के प्रबल पक्षधर थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

स्वदेशी आंदोलन के सुत्रधार और महान सेनानी दत्तोपंत ठेंगड़ी जी भारतीयता के सबसे बड़े पैरोकार थे। इस विषय पर वे किसी भी परिस्थिति से समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे, इसके बाद भी वह आधुनिकता के प्रबल पक्षधर थे। उनका कहना था कि ‘ऐसी आधुनिकता जो हमें हमारी जड़ों से जोड़कर रखे’ जबकि पश्चिम के अंधानुकरण के कीमत पर वो आधुनिकता को स्वीकार करने के विरुद्ध थे। भारतीय संस्कृति

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मज़हबी तुष्टिकरण करना ही है कांग्रेस का मूल चरित्र

खुद को धर्मनिरपेक्षता की जननी बताने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता और उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुस्लिम कर्मचारियों के लिये 90 मिनट का अवकाश तय किया है। ये अवकाश उन्हें नमाज़ अदा करने के लिये मिलेगा। इस विषय से संबंधित प्रस्ताव कैबिनेट में पास भी हो गया है। दरअसल कांग्रेस का यह चुनावी पैंतरा है, इससे ज्यादा कुछ नहीं है। जिस प्रांत में अराजकता, भ्रष्टाचार और लचर कानून

लोक मंथन : परंपरा और जीवन-शैली का हमारे चिंतन पर पड़ता है प्रभाव

भारतीय संस्कृति का दर्शन और अवधारणा हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की रही है। सदियों से हम इसी परंपरा का निर्वाह करते आ रहे। इसी भावना ने हमें अस्त-व्यस्त भी किया, लेकिन हमारी भावना गलत नहीं थी। इसलिए हजारों आक्रमणों को झेलने के बाद भी हम चट्टान की तरह खड़े हैं। लोकमंथन का दूसरा दिन भी इसी के इर्द-गिर्द रहा, जहां भारतीयता से लेकर आधुनिकता और बाजारवाद सभी विषयों पर वृहद