सन्नी कुमार

कुछ ऐसी घटनाएँ जो इस आपदा काल में पुलिस का मानवीय पक्ष तो दिखाती ही हैं, उम्मीद भी जगाती हैं

अपने कंधे पर समाज की सुरक्षा का भार ढोने वाली पुलिस ने अब कोरोना को भी हराने की जिम्मेदारी ले ली है। इसके कारण आज सैंकड़ों पुलिस कर्मियों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है लेकिन इसके बावजूद भी ये खाकी वर्दी धारी योद्धाओं ने अपने आप को कोरोना के खिलाफ जंग में सबसे अग्रिम पंक्ति में अब तक रखा है।

गौतम नवलखा का वर्तमान ही नहीं, अतीत भी डरावना है

न्याय का रास्ता भले ही कानून से तय होता है किंतु इसकी बुनियाद ‘भरोसे’ पर टिकी होती है। यानी न्याय प्रणाली में आस्था रखने वालों को यह भरोसा होता कि जो भी निर्णय आएगा वो उचित और नैतिक होगा। अगर यह भरोसा टूट जाए तो क्या न्याय व्यवस्था चल पाएगी भले ही कानून कितने ही ‘अनुकूल’ क्यों न हों?

दीनदयाल उपाध्याय : ‘व्यक्ति और समाज का सुख परस्पर विरोधी नहीं, पूरक होता है’

आज दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि  है। शुरुआत में ही यह भी जोड़ना उचित होगा कि दीनदयाल उपाध्याय को याद करने की एकमात्र वजह यह नहीं होनी चाहिए कि उनको मानने वाले लोग अभी सत्ता में हैं बल्कि इसलिए भी उनको याद करना जरूरी है कि समन्वयवाद की जो धारा हमेशा से भारतीय चिंतन के केंद्र में रही है, दीनदयाल भी उसी के पोषक हैं। आज दीनदयाल को याद करने की एक बड़ी वजह यह भी है कि वो कट्टरता के धुर विरोधी थे।