इंदिरा गांधी

परिवारवाद के कारण डूब रहा है कांग्रेस का जहाज

गांधी-नेहरू परिवार के वर्चस्‍व का ही नतीजा है कि पिछले 20 साल में कांग्रेस में केवल दो अध्‍यक्ष रहे। कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव 1997 के बाद से नहीं हुए हैं। मई 2019 के बाद से कांग्रेस का कोई स्‍थायी अध्‍यक्ष नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेसियों में हताशा व्‍याप्‍त है।

सरकारी बंगलों में रहना और फिर उन्हें अपना बना लेना नेहरू-गांधी परिवार की पुरानी परिपाटी है

भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय की ओर से पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को उनका सरकारी बंगला खाली करने का आदेश जारी किया गया है।

‘आपातकाल के विरोध में उठा हर स्वर वंदन का अधिकारी है’

आपातकाल के दौरान मैं बक्सर व आरा की जेल में बंद रहा था। वो संघर्ष और यातना का दौर था। उस समय मेरे जैसे लाखों युवा देश की विभिन्न जेलों में बंद थे।

गरीबी की जड़ पर चोट करने में कामयाब रही मोदी सरकार

2014 में प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी गरीबी निवारण योजनाओं के साथ-साथ गरीबी पैदा करने वाले कारणों को दूर करने में जी जान से जुट गए। प्रधानमंत्री ने उन व्‍यवस्‍थागत खामियों का दूर किया जिनके चलते योजनाएं अपने लक्ष्‍य को हासिल नहीं कर पाती थीं।

स्वातंत्र्यवीर सावरकर : जिनका हिंदुत्व कोरी भावुकता पर नहीं, तर्कपूर्ण चिंतन पर आधारित था

आधुनिक राजनीतिक विमर्श में विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसे नाम हैं, जिनकी उपेक्षा करने का साहस उनके धुर विरोधी भी नहीं जुटा पाते।

कांग्रेस के वास्तविक राजनीतिक चरित्र को ही दिखाता है चौरासी का सिख विरोधी दंगा!

यही नवम्बर महीने के शुरूआती दिन थे और साल था 1984, जब राजधानी दिल्ली की सड़कों पर मौत का तांडव मचा कर करीब 3 हजार सिखों का कत्लेआम कर दिया गया। कुछ दिनों बाद इंदिरा के बेटे राजीव गांधी ने जैसे इस नरसंहार को जायज ठहराते हुए कहा कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।

इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल हो आपातकाल

एक जिम्मेदार राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह अपनी आने वाली हर पीढ़ी को देश के इतिहास, संस्कृति, धर्म-दर्शन और जनतांत्रिक मूल्यों से अवगत कराए तथा साथ ही उन अलोकतांत्रिक तानाशाही विचारों को भी उद्घाटित करे जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के विरुद्ध रहा है। यह तभी संभव होगा जब इतिहास के प्रत्येक प्रसंगों को शिक्षा के पाठ्यक्रम से जोड़ा

आपातकाल : जब सत्ता में बने रहने के लिए लोकतंत्र को ठेंगे पर रख दिया गया !

वर्ष 1975 में आज के ही दिन सत्ता के कुत्सित कदमों ने देश में लोकतंत्र को कुचल दिया था और लोकतंत्र के इतिहास में यह एक काले दिन के रूप में दर्ज हो गया। लोकतंत्र के चारों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व प्रेस पर घोषित व अघोषित पहरा बैठा दिया गया। लोकतंत्र को ठेंगे पर रखकर देश को आपातकाल की गहरी खाई में धकेलने के पीछे महज किसी भी

इंदिरा से राहुल तक कांग्रेस कितनी बार गरीबी मिटाएगी?

राहुल गांधी की सालाना बहत्तर हजार रुपये की योजना से इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बयान ताजा हुए हैं। करीब आधी शताब्दी पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। इसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी ने देश की व्यवस्था का उल्लेख किया था। उनका कहना था कि केंद्र से सौ पैसे भेजे जाते हैं, उसमें से केवल पन्द्रह पैसे ही जमीन तक पहुंचते हैं

बस कहने भर के लिए राष्ट्रीय पार्टी रह गयी है कांग्रेस !

कांग्रेस अब सिर्फ कहने को देश की एक राष्ट्रीय पार्टी रह गई है। वास्तव में तो वह एक ऐसे कालखंड में प्रवेश कर चुकी है, जहाँ वह अब सिर्फ छह राज्यों – कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मिजोरम, मेघालय में अपने बूते पर और बिहार में जूनियर पार्टनर के तौर पर सत्ता में मौजूद है। वहीं मोदी और अमित शाह की जोड़ी का कमाल ऐसा है कि