गठबंधन

गठबंधन के लिए कांग्रेस के आगे घुटने क्यों टेक दिए हैं केजरीवाल?

राजनीति बदलने का दावा कर सत्ता तक का सफर तय करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राजनीति को तो नहीं बदल पाए, लेकिन खुद जरूर बदल गए हैं। आज केजरीवाल अपनी कही हर बात से पलटते हुए नज़र आ रहें है। हैरत इस बात की भी है कि जो केजरीवाल कभी किसी दल से  गठबंधन नहीं करने की कसमें खाते थे, आज कांग्रेस के समक्ष घुटने टेक दिए हैं

वैचारिक प्रतिबद्धताओं को छोड़ किसी भी तरह सत्ता बचाने की जुगत में जुटे केजरीवाल

भारत और पाकिस्‍तान के बीच जारी तनाव को देखते हुए भले ही दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने अनशन कार्यक्रम को स्‍थगित कर दिया हो, लेकिन उन्होंने अपनी सिकुड़ती राजनीतिक जमीन को संभालने के लिए कांग्रेस से गठबंधन की आस नहीं छोड़ी है।

‘2014 के चुनाव के समय उभरी आप 2019 के चुनाव में पूर्ण पतन की कगार पर है’

जिस कांग्रेस को केजरीवाल कोसते नहीं थकते थे, आज गठबंधन के लिए उसकी खुशामद करने में लगे हैं। इससे उनके अवसरवादी और दोमुंहे चरित्र का भी पता चलता है।

क्यों लगता है कि सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा को नहीं होगी कोई मुश्किल?

2019 लोक सभा चुनाव से पूर्व देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश ने कांग्रेस को न चाहते हुए भी अपना दुश्मन नंबर-2 बना लिया है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को हराने की मजबूरी में दो ऐसी पार्टियों सपा और बसपा के बीच गठबंधन हुआ जो पिछले दो दशक से एकदूसरे की धुर विरोधी रही हैं। 

जेडीएस से गठबंधन करके कांग्रेस ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है !

कर्नाटक के घटनाक्रमों से एक बार फिर साबित हो गया कि कांग्रेस के लिए सत्‍ता साधन न होकर साध्‍य है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार, विशेषकर नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की मजबूरी के तहत बनने जा रही कांग्रेस-जनता दल (एस) सरकार कितनी टिकाऊ साबित होगी, यह तो आने वाला वक्‍त ही बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि ये गठबंधन करके कांग्रेस ने