चुनाव

लगातार राजनीतिक जमीन खो रही है आम आदमी पार्टी

पंजाब, गोवा, गुजरात, छत्‍तीसगढ़, राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश के बाद अब हरियाणा और महाराष्‍ट्र में भी आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्‍त मिली है। साल भर पहले पार्टी ने हरियाणा में विधानसभा चुनाव पूरे दमखम से लड़ने का ऐलान किया था और नवीन जयहिंद को मुख्‍यमंत्री पद का उम्‍मीदवार भी घोषित कर दिया था। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी ने विधानसभा की 90 में से

जिम्मेदार विपक्ष की तरह व्यवहार करना कब सीखेगी कांग्रेस?

नोटबंदी 2016 में हुई थी और जीएसटी 2017 में पारित हुआ। इन दोनों निर्णयों के बाद हुए ज्यादातर राज्यों के चुनावों सहित इस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस खासकर उसके युवराज राहुल गांधी ने इसे खूब मुद्दा बनाया। राफेल का राग भी गाया गया। लेकिन इन मुद्दों का कोई असर नहीं रहा और अधिकांश चुनावों में भाजपा को विजय प्राप्त हुई। लोकसभा चुनाव में तो पार्टी ने

सिमटते दायरे के बावजूद आत्‍ममंथन से कतराती कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी आज अपने अस्‍तित्‍व के लिए संघर्ष कर रही है। 2017 में जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्‍यक्ष बने थे तब देश को उम्‍मीद थी कि अब कांग्रेस में एक नए युग का सूत्रपात होगा और पार्टी पुरानी सोच से आगे बढ़ेगी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी शिकस्‍त के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष पद से त्‍यागपत्र दे दिया

बनारस ने बता दिया कि 2019 की मोदी लहर 2014 से भी बड़ी है!

बीएचयू के लंका गेट पर जब मोदी पहुंचे तो समर्थकों का भारी जनसैलाब देखते ही बनता था। उन्‍होंने महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्‍यार्पण किया और अमूर्त प्रेरणाओं से इस प्रकार अपने अंदाज में आर्शीवाद प्राप्‍त किया। इसके बाद रोड शो का आरंभ हुआ जो कि अपने आप में एक दृष्‍टांत बन गया। दृष्‍टांत इस अर्थ में कि किसी भी

साध्वी प्रज्ञा के चुनाव में उतरने से विपक्षी दलों को इतनी तकलीफ क्यों है?

हमारे इन विपक्षी राजनैतिक दलों का यही चरित्र है कि वो तथ्यों का उपयोग और उनकी व्याख्या अपनी सुविधानुसार करते हैं। इन दलों को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर अनेक महत्वपूर्ण पदों पर बैठे नेता जो आज जमानत पर हैं और चुनाव भी लड़ रहे हैं उनसे नहीं लेकिन साध्वी से ऐतराज़ होता है। इन्हें देशविरोधी नारे लगाने के आरोपी और जमानत

संभावित हार की हताशा में एकबार फिर ईवीएम पर सवाल

भारत की विपक्षी पार्टियां भी गज़ब हैं, इन्हें जब-जब भी हार का डर सताता है, ये ईवीएम को चुनावी मैदान में घसीट लाती हैं। यहीं ईवीएम हैं, जिससे इनकी भी सरकारें बनी हैं, लेकिन इन्हें बखेड़ा खड़ा करने की आदत हो गई है। विपक्षी पार्टियों को लगता है कि चुनाव आयोग भी सत्ताधारी पार्टी के साथ मिलकर कोई बड़ा खेल कर सकता है। पिछले दिनों से आप एक बयान लगातार

‘इस चुनाव में ना तो कोई सत्ताविरोधी लहर है, ना ही विपक्ष के पक्ष में हवा’

देश में एक बार फिर चुनाव होने जा रहे हैं और लगभग हर राजनैतिक दल मतदाताओं को “जागरूक” करने में लगा है। लेकिन इस चुनाव में खास बात यह है कि इस बार ना तो कोई सत्ताविरोधी लहर है, ना ही सरकार के खिलाफ ठोस मुद्दे और ना ही विपक्ष के पक्ष में हवा। बल्कि अगर यह कहा जाए कि समूचे विपक्ष की हवा ही निकली हुई है तो भी गलत नहीं होगा।  क्योंकि जो

रोजगार पर जुमलेबाजी कर रहे हैं राहुल गांधी

एक ओर कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस की सरकार बनने पर मार्च 2020 तक 22 लाख सरकारी पदों को भरने का चुनावी वादा कर दिया है, तो दूसरी ओर कांग्रेस के घोषणापत्र में हर साल 4 लाख सरकारी नौकरियां देने की बात कही गई है। ऐसे में राहुल गांधी अतिरिक्‍त 18 लाख नौकरियों की बात किस आधार पर कर रहे हैं?

मैं भी चौकीदार: मोदी की सकारात्मक राजनीति का एक और उदाहरण

इस अभियान के बाद ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उछालने वाले विपक्षियों को सांप सूंघ गया है। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि इसका क्या जवाब दिया जाए। चौकीदार को चोर कहने पर अब एकसाथ असंख्य चौकीदार जवाब में उतर पड़ रहे हैं। दरअसल ये मोदी की राजनीति है, जो जितनी सकारात्मक भावना से ओतप्रोत है, विपक्ष को जवाब देने में उतनी ही प्रभावी भी है।

राहुल के बाद प्रियंका की भी घिसे-पिटे मुद्दों की राजनीति

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण, भाषा, शैली के चलते स्वयं को हल्का बना लिया है। उनकी बातों में अध्यक्ष पद की गरिमा का नितांत अभाव है। वह प्रधानमंत्री के लिए अमर्यादित व सड़क छाप नारे लगवाते हैं। राफेल सौदे पर उनके पास कोई तथ्य नहीं, फिर भी हंगामा करते रहते हैं। ऐसे में यह माना गया था कि प्रियंका गांधी वाड्रा का चुनाव प्रचार अलग ढंग का होगा। लेकिन वह भी पुराने और तथ्यविहीन मुद्दे ही उठा रही हैं।