जम्मू कश्मीर

जम्मू-कश्मीर में कायम हुई शांति, कश्मीरी पंडितों की भी होगी वापसी

कश्मीर से विस्थापित हुए पंडितों की घर वापसी को लेकर अब तक सेक्युलर ज़मात के लोग कमोबेश चुप ही रहे हैं, इस डर से कि कहीं मुस्लिम वोट बैंक उनसे नाराज़ न हो जाए। कश्मीरी पंडितों को घाटी से उजड़े हुए 30 साल का वक़्त हो गया, लिहाज़ा यह सवाल बहुत ही जायज़ है कि खुद के सेक्युलर होने का दावा करने वाली तमाम पार्टियां जिसमें कांग्रेस भी शामिल है, अब तक

जम्मू-कश्मीर : अनुच्छेद-370 खत्म होने के बाद पहले से बेहतर हुए हालात

इसमें कोई संदेह नहीं है कि कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 को हटाया जाना केंद्र सरकार का एक बड़ा व ऐतिहासिक कदम था। इस कार्यवाही के बाद से ही विपक्ष ने एक तरह से ऐसा माहौल बनाया हुआ था कि कश्‍मीर में जन जीवन प्रभावित हो गया है और वहां बुनियादी सुविधाओं को लेकर अराजकता फैल गई है।

अनुच्छेद-370 हटने से सिर्फ पाकिस्तान में ही मातम नहीं है, भारत में भी ‘कुछ लोग’ सदमे में हैं

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का मकसद यही था कि दशकों से वहां चल रहे खून खराबे को ख़त्म कर शांति की स्थापना की जाए।  कश्मीर के लोग भी धीरे-धीरे नयी व्यवस्था को अपनाने लगे हैं और शांतिपूर्ण ढंग से राज्य की गतिविधियाँ चल रही हैं। अतः मोदी या भाजपा के विरोध मात्र के लिए कश्मीर को लेकर गलत जानकारियां फैलाना और सरकार का विरोध करना अनुचित और अस्वीकार्य है।

अनुच्छेद-370 हटने के बाद कश्मीर में हालात सामान्य रहना सरकार की बड़ी सफलता है!

जम्‍मू और कश्‍मीर में अब हालात सामान्‍य हो गए हैं। गत 5 अगस्‍त को केंद्र सरकार ने कश्‍मीर से अनुच्छेद-370 समाप्त करते हुए विशेष राज्‍य का दर्जा हटा दिया था। इसके पहले ही घाट में सुरक्षा प्रबंध चौकस थे और इसके बाद भी यहां लगातार व्‍यवस्‍थाएं पुख्‍ता बनी हुईं हैं।

कश्मीर के राजनीतिक हल की बात करने वाले इस ‘राजनीतिक हल’ को क्यों नहीं पचा पा रहे?

कश्मीर में “कुछ बड़ा होने वाला है” के सस्पेंस से आखिर पर्दा उठ ही गया। राष्ट्रपति के एक हस्ताक्षर ने उस ऐतिहासिक भूल को सुधार दिया जिसके बहाने पाक सालों से वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में सफल होता रहा, लेकिन यह समझ से परे है कि कश्मीर के राजनैतिक दलों के महबूबा मुफ्ती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला सरीखे नेता और कांग्रेस जो कल तक यह कहते थे कि कश्मीर समस्या का हल सैन्य कार्यवाही नहीं है बल्कि राजनैतिक है, वो मोदी सरकार के इस राजनीतक हल को क्यों नहीं पचा पा रहे हैं?

अनुच्छेद-370 हटाने का विरोध बताता है कि कांग्रेस ने पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लिया है!

कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल सुधारते हुए मोदी सरकार ने जम्‍मू-कश्‍मीर से धारा 370 को हटाने का ऐलान किया जिसके साथ जम्‍मू-कश्‍मीर को मिला विशेष राज्‍य का दर्जा भी खत्‍म हो गया। इसे मोदी सरकार की कुशल रणनीति ही कहेंगे कि मोदी विरोधी पार्टियां भी सरकार के फैसले का साथ दे रही हैं। इनमें आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, बीजू जनता दल, एआईडीएमके और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख हैं।

क्या सुलझने की ओर बढ़ रही है कश्मीर की गुत्थी?

अमित शाह के कश्मीर दौरे के दौरान यह साफ़ हो गया था कि कश्मीर में सही वक़्त पर चुनाव भी होंगे लेकिन उससे पूर्व आतंकियों की नकेल भी कसी जाएगी। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान सेना को आतंकियों से निबटने में खुली छूट दी गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि स्थानीय आतंकियों की एक पूरी की पूरी जमात का सफाया हो गया,

संसद में अमित शाह के भाषण ने कश्मीर मुद्दे पर कांग्रेस को कायदे से आईना दिखाया है!

लंबे समय तक बीजेपी के अध्‍यक्ष रहे अमित शाह अब सत्‍तारूढ़ दल में केंद्रीय मंत्री हैं। उन्‍हें गृह मंत्रालय का जिम्‍मा मिला है और पहली बार वे इस नाते संसद में मौजूद हैं। चुनावी और दलगत मसलों पर देश भर में सार्वजनिक मंचों पर तो उन्‍हें जनता देखती-सुनती आई लेकिन संसद के बजट सत्र में एक मंत्री के तौर पर उनका जो रूप देखने को मिल रहा है,

35ए : वह अनुच्छेद जिसे नेहरू ने संसद में पारित किए बिना ही संविधान का हिस्सा बना दिया

अनुच्छेद 35-ए को लेकर पिछले कुछ दिनों से लगातार बहस-मुबाहिसो का दौर जारी है। यह एक ऐसा विधान है, जिसने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान किया है। लेकिन इसे एक ऐसे संवैधानिक धोखे का नाम भी दिया जा रहा है, जिसकी वजह से वहां के लाखों लोग वर्षों से नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

भाजपा-पीडीपी के अपरिहार्य गठबंधन का अवसान

कभी-कभी खंडित जनादेश धुर विरोधियों को भी साथ आने पर विवश कर देता है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन ऐसा ही था। दोनों ने विधानसभा चुनाव एकदूसरे के खिलाफ लड़ा था। लेकिन खंडित जनादेश में इनके पास गठबंधन से सरकार बनाने का एक मात्र विकल्प यही बचा था। इसे अपरिहार्य  गठबंधन कहा जा सकता था।