नीतीश कुमार

देश की साझी विरासत सुरक्षित है, आप तो अपनी सीट की चिंता करिए शरद जी !

विपक्षी पार्टियों का जमावड़ा बड़े अर्न्तद्वन्द से गुजर रहा है। शरद यादव के साझी विरासत बचाओ सम्मेलन में यही त्रासदी दिखाई दी। नामकरण से लग रहा था कि इसमें कोई बड़ा वैचारिक धमाका होने वाला है। साझी विरासत के रूप देश की गौरवपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा होगी। यह भी सोचा गया कि इस विरासत को बचाने के लिए कोई नया प्रस्ताव आयेगा। लेकिन फिर वही ढांक के तीन पात। तीन वर्षों से जो बातें चल रही

बिहार के सुस्त विकास को फिर गति देगी जदयू-भाजपा सरकार

नीतीश कुमार के इस्तीफे को सिर्फ मौजूदा घटनाक्रम से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। महागठबंधन के बैनर के तले नीतीश कुमार जरूर मुख्यमंत्री बन गये थे, लेकिन वे अपनी छवि के मुताबिक काम नहीं कर पा रहे थे। उनके अतंस में अकुलाहट थी। देखा जाये तो परोक्ष रूप से लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर रहे थे।

भारतीय राजनीति में क्यों अप्रासंगिक होती जा रही है कांग्रेस ?

इतिहास के पन्नों को पलटें और इसके सहारे भारतीय राजनीति को समझने को प्रयास करें तो हैरानी इस बात पर होती है कि जो कांग्रेस पंचायत से पार्लियामेंट तक अपनी दमदार उपस्थिति रखती थी, आज वही कांग्रेस भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक हो गई है। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि आज बिहार से लगाये कई राज्यों की सियासत गर्म है और इन सबमें में कांग्रेस कहीं गुम-सी नज़र आ रही है। बिहार में महागठबंधन

सत्ता की सियासत में गठबंधनों पर भारी दिलों की दीवारें

बिहार में चल रहे सियासी उठा-पटक के बीच जो लोग टेलीविजन से चिपके हुए थे, उन्होंने एक दिलचस्प नजारा देखा – महज 60 मिनट के भीतर ही रिश्तों और मर्यादाओं की सीमाएं टूटने का। कुछ देर पहले तक जो लालू यादव नीतीश कुमार को छोटा भाई बताते हुए गठबंधन को अटूट बता रहे थे, वही लालू बदले हुए तेवर में नीतीश को मौकापरस्त और हत्यारोपी तक साबित करने में जुटे हुए थे। उनके बेटे और बिहार के पूर्व

बिहार की जनता के लिए जरूरी हो गया था महागठबंधन सरकार का अंत !

बिहार के महागठबंधन में महीनों से चल रही खींचतान आखिर बीती 26 जुलाई की शाम तब एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच गयी, जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव का इस्तीफा देने से इनकार के बाद नीतीश ने यह निर्णय लिया। इस्तीफा देकर निकलते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा माहौल में उनके लिए सरकार चलाना संभव

महागठबंधन में मची अंतर्कलह में नया कुछ नहीं, ऐसे गठबंधनों का यही हश्र होता है

नीतीश कुमार की छवि एक ईमानदार राजनेता की रही है, लेकिन सत्ता और महत्वाकांक्षा को हासिल करने की चाहत ने उन्हें महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिये मजबूर कर दिया, जबकि राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का ईमानदारी से दूर-दूर तक का नाता नहीं है। बावजूद इसके लालू प्रसाद यादव अपने परिवार को किसी भी तरह से सत्ता की कुर्सी पर बिठाकर रखना चाहते हैं। उनके परिवार के

मूछ-दाढ़ी की बचकाना दलीलों की बजाय आरोपों का तथ्यात्मक जवाब दे, लालू परिवार !

लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें इन दिनों बढ़ी हुई हैं। यूँ तो लालू पहले से ही चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता हैं और जमानत पर घूम रहे हैं। लेकिन, अब उनसे लेकर उनके परिवार के सदस्यों तक के खिलाफ एक के बाद एक आरोप जिस तरह से सामने आए हैं तथा सरकारी एजेंसियों द्वारा उनपर कार्रवाई हुई है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि लालू की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। शायद समय आ गया है कि उन्हें अपने पूरे कच्चे-

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके हैं लालू यादव

लालू कोई गरीबों और मजलूमों की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का धर्मयुद्ध नहीं लड़ रहे हैं। लालू का मकसद सिर्फ इतना है कि गैर कानूनी तौर पर इकठ्ठा किये हुए धन को कानून की नज़रों से कैसे छुपा लिया जाए। इस कारण जब से लालू यादव के परिवार के खिलाफ सीबीआई ने सख्ती बरती है, तो ध्यान भटकाने के उद्देश्य से लालू इसे सियासी रंजिश का नाम देकर बड़ा सियासी वितंडा

लालू यादव बताएं कि ये हजार करोड़ की संपत्ति कमाने के लिए उन्होंने कौन सी ‘मेहनत’ की है ?

लालू के परिवार के सदस्यों की संपत्ति अगर आयकर विभाग स्थाई तौर पर जब्त कर ले तो वे बिहार के ऐसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री होंगे जिन पर बेनामी संपत्ति कानून के तहत कार्रवाई होगी। पर, लालू इससे भी शर्मसार होने वाले नहीं हैं। लालू एक अजीब नेता हैं। वे अमीरों पर बरसते हुए खुद धन्नासेठ हो गए। याद नहीं आता कि लालू एंड फैमिली ने बिहार के अवाम का दुख-दर्द दूर करने के लिए भी कोई बड़ी पहल की हो।

नीतीश कुमार ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था का मखौल बना दिया है !

बिहार में शिक्षा की किस कदर दुर्गति हुई है, इसका प्रमाण हमें पिछले दो साल के टॉपर ही दे देते हैं। गणेश कुमार और रूबी राय। दो नाम ही काफी हैं, शैक्षणिक व्यवस्था के क्रमिक विनाश को समझने के लिए। 2015 में बिहार में बारहवीं की परीक्षा में 75 फीसद छात्र पास हुए, वहीं 2017 में सिर्फ 36 फीसद छात्र ही उत्तीर्ण हुए यानि 64 प्रतिशत छात्र फेल हो गए। दो वर्षों के नतीजों के बीच आया ये बड़ा अंतर चौंकाता है।