भारतीय संस्कृति

महाराणा प्रताप : जिनका युद्ध-कौशल ही नहीं, सामाजिक-सांगठनिक कौशल भी अतुलनीय था

जिनका नाम लेते ही नस-नस में बिजलियाँ-सी कौंध जाती हों; धमनियों में उत्साह, शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होने लगता हो- ऐसे परम प्रतापी महाराणा प्रताप की आज जयंती है। आज का दिवस मूल्यांकन-विश्लेषण का दिवस है।

नारद जयंती विशेष : प्रारंभ से पत्रकारिता के अधिष्ठात्रा हैं देवर्षि नारद

पत्रकारिता क्षेत्र के भारतीय मानस ने तो देवर्षि नारद को सहज स्वीकार कर ही लिया है। जिन्हें देवर्षि नारद के नाम से चिढ़ होती है, उनकी मानसिक अवस्था के बारे में सहज कल्पना की जा सकती है। उनका आचरण देखकर तो यही प्रतीत होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा में उनकी आस्था नहीं है। अब तो प्रत्येक वर्ष देवर्षि नारद जयंती के अवसर पर देशभर में अनेक जगह महत्वपूर्ण आयोजन होते हैं। नारदीय पत्रकारिता का स्मरण किया जाता है। 

राम और रामायण का विरोध करने वालों की मंशा क्या है?

राम केवल एक नाम भर नहीं, बल्कि वे जन-जन के कंठहार हैं, मन-प्राण हैं, जीवन-आधार हैं। उनसे भारत अर्थ पाता है। वे भारत के प्रतिरूप हैं और भारत उनका। उनमें कोटि-कोटि जन जीवन की सार्थकता पाता है। भारत का कोटि-कोटि जन उनकी आँखों से जग-जीवन को देखता है।

आदि से अंत तक प्रकृति-प्रेम की भावना से पुष्ट लोकपर्व है छठ

भारत पर्वों का देश है। यहाँ एक पर्व बीतता नहीं कि अगला हाजिर हो जाता है। भारतीय पर्वों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे किसी न किसी आस्था से प्रेरित होते हैं। अधिकाधिक पर्व अपने साथ किसी न किसी व्रत अथवा पूजा का संयोजन किए हुए हैं। ऐसे ही पर्वों की कड़ी में पूर्वी भारत में सुप्रसिद्ध छठ पूजा का नाम भी प्रमुख रूप से आता है।

आखिर क्यों विशेष है इस बार का कुम्भ आयोजन?

प्रत्येक सरकार अपने स्तर से कुंभ मेले की तैयारियां करती है। लेकिन इस बार तैयारियों के साथ आस्था का भी समावेश हुआ है। योगी आदित्यनाथ के निर्देशन में चली तैयारियों में ऐसा होना भी था। योगी का दावा है कि पचास वर्षों में पहली बार तीर्थयात्रियों को इतना शुद्ध जल स्नान हेतु मिलेगा। पहली बार तीर्थयात्री पौराणिक अक्षयवट और सरस्वती कूप के दर्शन कर सकेंगे।

वह बौद्ध देश जहाँ राम राजा हैं और राष्ट्रीय ग्रंथ है रामायण !

भारत से बाहर अगर हिन्दू प्रतीकों और संस्कृति को देखना-समझना है, तो थाईलैंड से उपयुक्त राष्ट्र शायद ही कोई और हो सकता। दक्षिण पूर्व एशिया के इस देश में हिन्दू देवी-देवताओं और प्रतीकों को आप चप्पे-चप्पे पर देखते हैं। यूं थाईलैंड बौद्ध देश है, पर इधर राम भी अराध्य हैं। यहां की राजधानी बैंकाक से सटा है अयोध्या शहर। वहाँ के लोगों की मान्यता है कि यही थी श्रीराम की राजधानी। थाईलैंड के बौद्ध मंदिरो में आपको

भारतीय दर्शन को समझने के लिए आवश्यक है संस्कृत का ज्ञान

देश के उच्चतम न्यायालय ने संतोष कुमार बनाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय (याचिका सं. 299, 1989) वाद (संस्कृत सम्बन्धी) के निर्णय की शुरुआत में एक बहुत ही गहन व रोचक घटना का उदाहरण दिया। वह उदाहरण भारतीयता व संस्कृत के सम्बन्ध को समझने में सहायक है। केम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर अपने शान्त कक्ष में अपने अध्ययन में डूबा हुआ है: एक उत्तेजित अंग्रेज सिपाही उस अध्ययन कक्ष में

युवा दिवस : स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा लें देश के युवा

युवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है। युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं। युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं। युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं। युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं। उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं। समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है।

भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं अभिनवगुप्त : जे. नंदकुमार

पिछले वर्ष तक देश में आचार्य अभिनवगुप्त के बारे में शोधार्थियों को भी अधिक जानकारी नहीं थी। परंतु, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के प्रयास से देश में एक वातावरण बन गया है। आचार्य अभिनवगुप्त का विचारदर्शन चर्चा का विषय बना है। आचार्य भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को सामान्य जन तक पहुंचाने के लिए महत्त्वपूर्ण रचनाएं की हैं। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के

लोकमंथनः बौद्धिक विमर्श में एक नई परंपरा का प्रारंभ

भोपाल में संपन्न हुए लोकमंथन आयोजन के बहाने भारतीय बौद्धिक विमर्श में एक नई परंपरा का प्रारंभ देखने को मिला। यह एक ऐसा आयोजन था, जहां भारत की शक्ति, उसकी सामूहिकता, बहुलता-विविधता के साथ-साथ उसकी लोकशक्ति और लोकरंग के भी दर्शन हुए। यह आयोजन इस अर्थ में खास था कि यहां भारत को भारतीय नजरों से समझने की कोशिश की गयी। विदेशी चश्मों और विदेशी