राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

संघ प्रमुख के उद्बोधन के निहितार्थ बहुत गहरे हैं

देश में कभी भी कोई बड़ा मामला आता है अथवा कोई विमर्श खड़ा होता है, तो देश का एक बड़ा तबका यह जानने के लिए उत्सुक रहता है कि इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्या राय है। आज भी यह प्रश्न उठ रहा है कि मौजूदा कोरोना के महासंकट से बाहर आने एवं वर्तमान में कोरोना वायरस से उपजी चुनौतियों से निपटने की दिशा में आरएसएस किस भूमिका का निर्वहन कर रहा है?

संघ की संकल्पना : ‘सेवा उपकार नहीं, करणीय कार्य है’

देश के किसी भी हिस्से में, जब भी आपदा की स्थितियां बनती हैं, तब राहत/सेवा कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के कार्यकर्ता बंधु अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं। चरखी दादरी विमान दुर्घटना, गुजरात भूकंप, ओडिसा चक्रवात, केदारनाथ चक्रवात, केरल बाढ़ या अन्य आपात स्थितियों में संघ के स्वयंसेवकों ने पूर्ण समर्पण से राहत कार्यों में अग्रणी रहकर महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।

कोरोना संकट : डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में दिखाई नई राहें

कोरोना संकट से विश्व मानवता के सामने उपस्थित गंभीर चुनौतियों को लेकर दुनिया भर के विचारक जहां अपनी राय रख रहे हैं, वहीं दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के संवाद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है।

जयंती विशेष: डॉ. हेडगेवार जिन्होंने अपने छोटे-से कमरे में दुनिया के सबसे बड़े संगठन की नींव रखी

1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्मे डॉ. हेडगेवार में अपनी माटी और देश से प्रेम-भाव उत्पन्न होने में समय न लगा, उनको अपने समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता थी। जो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के 60 वर्ष पूर्ण होने पर बाँटी गयी मिठाई को स्वीकार ना करने से ही स्पष्ट पता लग जाता है, उन्होंने  विद्यालय में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ वन्दे मातरम

प्रणब मुखर्जी की बातों पर संघ तो खरा उतरता है, मगर कांग्रेस नहीं

कांग्रेसी नेताओं की तमाम आपत्तियों और यहाँ तक कि अपनी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की चेतावनी को भी अनदेखा करते हुए देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में पहुंचे और स्वयंसेवकों को संबोधित किए। जबसे प्रणब दा ने संघ के आमंत्रण को स्वीकृति दी थी, देश के राजनीतिक महकमे में एक उथल-पुथल का वातावरण बन गया था। भाजपा के खेमे प्रसन्नता देखी जा रही

बोलने से पहले सोचना कब शुरू करेंगे, राहुल गांधी !

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव के प्रचार में लगे हैं। खूब रैलियां कर रहे और तरह-तरह से सरकार पर निशाना भी साध रहे हैं। मगर, वे हैं तो राहुल गांधी ही न, सो कमोबेश अपनी विशिष्ट राजनीतिक समझ का प्रदर्शन कर ही देते हैं। चुनाव प्रचार के क्रम में पिछले दिनों वे गुजरात के वडोदरा में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। जय शाह प्रकरण से लेकर मोदी सरकार के काम-काज और 2014

भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं अभिनवगुप्त : जे. नंदकुमार

पिछले वर्ष तक देश में आचार्य अभिनवगुप्त के बारे में शोधार्थियों को भी अधिक जानकारी नहीं थी। परंतु, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के प्रयास से देश में एक वातावरण बन गया है। आचार्य अभिनवगुप्त का विचारदर्शन चर्चा का विषय बना है। आचार्य भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को सामान्य जन तक पहुंचाने के लिए महत्त्वपूर्ण रचनाएं की हैं। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के

मानव-कल्याण और राष्ट्र उत्थान के लक्ष्य को समर्पित व्यक्तित्व थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

भारत वर्ष में महापुरुषों के अवतरण की एक पौराणिक परंपरा रही है। हर युग में माँ भारती का गोद महापुरुषों की दिव्य कीर्ति से आलोकित होता रहा है। और इन महापुरुषों ने अपने तपश्चर्य और साधना की परंपरा में एक ही ध्येय को शामिल किया, वो था माँ भारती को परम वैभव तक पहुंचाने का लक्ष्य।

गोरक्षा पर मोदी को नहीं समझे तो आप विरोधियों के जाल में फंस चुके हैं!

गोरक्षा की आड़ में निंदनीय घटनाओं को अंजाम दे रहे तथाकथित गोरक्षकों के संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। उतावलेपन से प्रधानमंत्री के बयान की गंभीरता को समझना मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री के बयान के महत्त्व को समझने के लिए गंभीरता, धैर्य और वास्तविकता को स्वीकार करने का सामर्थ्य चाहिए।

बेदाग़ संघ के ऊपर दाग लगाने वालों को पड़ा सर्वोच्च अदालत का चाबुक

आजादी के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ वैचारिक स्तर पर हमले होते रहे हैं। संघ के खिलाफ नियोजित ढंग से तथ्य गढ़ने और उन्हें कुतकोर्ं से साबित कराने के लिएअलग-अलग दौर में कांग्रेस की सरकारों द्वारा भी बुद्धिजीवियों की एक बड़ी लॉबी तैयार की गयी। वामपंथी विचार वाले प्रोफेसर्स, इतिहासकार, साहित्यकार सहित तमाम लोगों द्वारा संघ के खिलाफ एक आम एका तैयार करके दशकों से संघ को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है। वैसे तो वामपंथी विचारधारा के लेखकों द्वारा संघ पर तमाम आरोप लगाये जाते रहे हैं लेकिन उन सभी आरोपों में सर्वाधिक बार यह आरोप लगाया जाता है कि गांधी की हत्या संघ द्वारा की गयी थी।