लोकसभा चुनाव

‘मोदी ने महागठबंधन के विषय में जो कहा था, वो एकदम सच साबित हुआ’

शिखर पर तो दोनों पार्टियों की दोस्ती हो गई। लेकिन जमीन पर ऐसा खुशनुमा माहौल नहीं बन सका। डेढ़ दशक तक दोनों के बीच तनाव रहा। इनके लिए यह सब भूल जाना मुश्किल था। पहले कांग्रेस फिर बसपा से गठबन्धन के समय अखिलेश यादव ने दूरदर्शिता से काम नहीं लिया जिसके चलते सपा को नुकसान उठाना पड़ा। वैसे भी इस तरह के सिद्धांतहीन गठजोड़ का यही हश्र होना था।

क्या लोकसभा चुनाव के साथ ही बुआ-बबुआ का लगाव भी खत्म हो गया?

उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा हो रहा है जिसे आप हास्यास्पद कह सकते हैं। यहाँ जितनी तेजी के साथ गठबंधन बना उससे कहीं तेजी से उसका पटाक्षेप भी होता दिख रहा है। आम चुनाव से ठीक पहले मोदी-शाह की जोड़ी को रोकने के लिए मायावती और अखिलेश ने चुनावी गठबंधन किया, जिसका आशय था दलित और यादव वोट बैंक को एकदूसरे के खाते में

‘2019 का जनादेश कोई चमत्कार नहीं, मोदी के लोक-कल्याणकारी कार्यों का प्रतिफल है’

विपक्षी दल मोदी पर जुमलेबाज होने का आरोप लगाते आए हैं। उनका कहना है कि मोदी केवल बातें बड़ी करते हैं, काम नहीं करते। लेकिन इन दलों से अब पूछा जाना चाहिए कि क्या बिना काम किए ही मतदाताओं ने दुबारा मोदी को चुन लिया? मोदी ने पिछले 5 साल में जो काम किए हैं, उसका ही प्रतिफल जनता ने उन्‍हें अपनी कीमती वोट के रूप में दिया है।

चार चरण के मतदान के बाद किस तरफ है हवा का रुख?

चौथे दौर का चुनाव ख़त्म हो गया है, इसके बाद सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों ने अपना हिसाब-किताब लगा लिया होगा। कुछ पार्टियों के लिए जंग ख़त्म हो गयी है तो कुछेक पार्टियों के लिए अभी एक बड़ी लड़ाई बाकी है। दक्षिण और पश्चिम भारत में मतदान हो गया है, लेकिन अभी बड़ी लड़ाई उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और बिहार

‘इस चुनाव में ना तो कोई सत्ताविरोधी लहर है, ना ही विपक्ष के पक्ष में हवा’

देश में एक बार फिर चुनाव होने जा रहे हैं और लगभग हर राजनैतिक दल मतदाताओं को “जागरूक” करने में लगा है। लेकिन इस चुनाव में खास बात यह है कि इस बार ना तो कोई सत्ताविरोधी लहर है, ना ही सरकार के खिलाफ ठोस मुद्दे और ना ही विपक्ष के पक्ष में हवा। बल्कि अगर यह कहा जाए कि समूचे विपक्ष की हवा ही निकली हुई है तो भी गलत नहीं होगा।  क्योंकि जो

भाजपा के संकल्प पत्र में जो नए भारत का विज़न है, कांग्रेस के घोषणापत्र में उसका लेशमात्र भी नहीं

कांग्रेस के ज्यादातर वादे मतदाताओं को तात्कालिक तौर पर लुभाने वाले हैं, जबकि भाजपा ने देश को हर तरह से मजबूती देने वाले दूरदर्शितापूर्ण और व्यावहारिक वादे किए हैं। देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसके वादों पर कितना यकीन दिखाती है।

घोषणापत्र : भाजपा के वादे हैं व्यावहारिक, कांग्रेस के वादे यथार्थ के धरातल से दूर

चुनावी घोषणापत्र महज वादों का पिटारा नहीं होना चाहिये। इसमें देश के विकास की वैसी तस्वीर पेश की जानी चाहिये, जिसे मूर्त रूप दिया जा सके। बहरहाल, चुनावी रणभूमि में देश की दोनों प्रमुख पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने घोषणा पत्र को पेश कर दिया है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र को संकल्प पत्र का नाम दिया है, जबकि कांग्रेस ने ‘हम निभाएंगे’ लिखा है।   

‘कांग्रेस का घोषणापत्र देश की सुरक्षा और अखंडता के मुद्दे पर उसका असली चरित्र बयान करता है’

बीते दो अप्रैल को लोकसभा चुनाव – 2019 के लिए कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया। 54 पृष्ठों का ये घोषणापत्र काम, दाम, शान, सुशासन, स्वाभिमान और सम्मान इन छः हिस्सों में बंटा हुआ है। रोजगार से लेकर ‘न्याय’ और राष्ट्रीय सुरक्षा एवं स्वास्थ्य तक सभी वादों को इन छः हिस्सों में रखा गया है।

लोकसभा चुनाव : जनकल्याण के कार्य बनाम मोदी विरोध की नकारात्मक राजनीति

लोकसभा चुनाव की शुरुआत हो चुकी है, सभी राजनीतिक दल अपने–अपने ढ़ंग से अपनी पार्टी का प्रचार कर जनता का समर्थन पाने की कवायद में जुटे हुए हैं, किन्तु इस महान लोकतांत्रिक देश में मतदाता अब सभी राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को अपनी अपेक्षाओं की कसौटी पर कसने लगे हैं।

राहुल के बाद प्रियंका की भी घिसे-पिटे मुद्दों की राजनीति

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण, भाषा, शैली के चलते स्वयं को हल्का बना लिया है। उनकी बातों में अध्यक्ष पद की गरिमा का नितांत अभाव है। वह प्रधानमंत्री के लिए अमर्यादित व सड़क छाप नारे लगवाते हैं। राफेल सौदे पर उनके पास कोई तथ्य नहीं, फिर भी हंगामा करते रहते हैं। ऐसे में यह माना गया था कि प्रियंका गांधी वाड्रा का चुनाव प्रचार अलग ढंग का होगा। लेकिन वह भी पुराने और तथ्यविहीन मुद्दे ही उठा रही हैं।