शंकराचार्य

मुस्कुराते चेहरे के साथ सामाजिक सुधार में रत जयेंद्र सरस्वती सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे !

इस सप्‍ताह शंकराचार्य जयेंद्र सरस्‍वती के अवसान का समाचार सामने आया। उनके निधन की औपचारिक खबरें मीडिया व प्रचार माध्‍यमों से जारी की जाती रहीं लेकिन यह केवल खानापूर्ति भर थी। उनके असल व्‍यक्तित्‍व का बखान किसी ने नहीं किया। कांची कामकोटि पीठ के 69 वें शंकराचार्य जयेंद्र सरस्‍वती एक युगपत संत के तौर पर सदा स्‍मरण किए जाते रहेंगे। युगपत इस अर्थ में, कि जब उन्‍होंने संन्‍यास लिया था, तबसे

केवल दार्शनिक और सन्यासी ही नहीं, महान समाज सुधारक भी थे शंकराचार्य

शंकराचार्य के कर्तृत्व और जीवन यात्रा को देखने पर हम पाते है कि वैदिक धर्म को उन्होने समय की मांग, व्यक्ति की रूचि एवं जिज्ञासा तथा समाज के कल्याण की सर्वोपरि भावना के रूप में व्याख्यापित किया। आत्म ज्ञान एवं मोक्ष के प्रति उत्कट भावना ने उन्हे मात्र नौ वर्ष की आयु में सन्यास आश्रम में प्रवेश करा दिया। कदाचित् यह आश्रम व्यवस्था का व्यतिक्रम है, यदि ऐसा वे उस समय कर सकते हैं