संघ

‘सनातन संस्कृति ही अन्धकारग्रस्त विश्व को नवीन आलोक-पथ पर ले जाएगी’

हिंदुत्व की धारा से निकली राष्ट्रीयता अंतर्राष्ट्रीयता या अखिल मानवता के विरुद्ध कदापि नहीं जाती। बल्कि अखिल मानवता का चिंतन यदि कहीं हुआ है तो इसी हिंदू-चिंतन में हुआ है या उससे निकले भारतीय पंथों में ही उसके स्वर सुनाई पड़ते हैं।

कोरोना काल में भी राष्ट्र सेवा की अपनी परंपरा को लेकर आगे बढ़ता संघ

देखा जाए तो संघ का ये इतिहास ही रहा है कि देश पर जब भी कोई बड़ी आपदा आई है, संघ के स्वयंसेवक उससे निपटने के लिए कृतसंकल्पित भाव से जुट गए हैं। फिर चाहें वो स्वतंत्रता के पश्चात् पाकिस्तान में हुए दमन से पलायन कर भारत आने वाले हिन्दुओं को आश्रय-भोजन देना हो या फिर 1962 और 1965 के युद्धों में प्रशासन के साथ मिलकर सैनिकों के लिए रसद आदि

संकट काल में दिखता संघ का विराट रूप

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल भारत नहीं अपितु वैश्विक पटल पर भी विभिन्न विभिन्न कारणों से सर्वदा चर्चा का केंद्र रहता है। अपने 95 साल के इतिहास में एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन होने पर भी  संघ की अधिकतम चर्चा राजनीतिक अथवा सांप्रदायिक कारणों से ही की जाती रही,  निहित स्वार्थों के वशीभूत वामपंथी मीडिया मुगलों के द्वारा एक विशेष चश्मे से देखते हुए एकपक्षीय दुष्प्रचार संघ को लेकर को लेकर किया जाता रहा।

राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख जिन्होंने ग्रामीण विकास व स्वावलंबन का आदर्श मॉडल प्रस्तुत किया

राष्ट्र के उत्थान के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वालों की चर्चा होते ही एक नाम हमारे सामने सबसे पहले आता है, वह है भारत रत्न राष्ट्र ऋषि, विराट पुरुष नाना जी देखमुख का। नानाजी देशमुख आज भी प्रसांगिक हैं, तो उसका सबसे बड़ा कारण उनका सामाजिक जीवन में नैतिकता और राष्ट्र सेवा के लिए संकल्पबद्ध होकर कठिन परिश्रम करना है।

विवेकानंद शिला स्मारक : ऐसा स्मारक जिसके निर्माण ने विभिन्न विचारधाराओं को एक कर दिया

देश-विदेश में हजारों स्मारकों का निर्माण हुआ है लेकिन शायद ही कोई ऐसा स्मारक हो जो जीवित हो। 1970 में राष्ट्र को समर्पित किया गया “विवेकानंद शिला स्मारक” एक ऐसा  स्मारक है जो आज भी विवेकानंद जी के विचारों को जीवंत बनाए हुए है। 25, 26, 27 दिसंबर 1892 को स्वामी विवेकानंद ने भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी में स्थित शिला पर साधना करने के बाद भारत के

पी. परमेश्वरन का जीवन-संदेश हमारी स्मृतियों में सदैव अमर रहेगा

समाज को संगठित, शक्तिशाली, अनुशासित और स्वावलम्बी करने के कार्य में जिन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण समर्पित कर दिया, ऐसे कर्म योगी माननीय परमेश्वरन जी अब हमारे बीच नहीं हैं।  लेकिन कभी आराम ना मांगने वाले, विश्राम ना मांगने वाले, ‘चरैवेति चरैवेति’ ऐतरेय उपनिषद का यह मंत्र अपने जीवन में एकात्म करने वाले परमेश्वरन जी हमारी

‘अदालत के फैसले ने बता दिया कि अब इतिहास से आगे बढ़ भविष्य के निर्माण का समय है’

भगवान श्रीराम देश के अधिसंख्य लोगों के दिलों में वास करते हैं, इसके लिए किसी प्रमाण की ज़रुरत नहीं थी, लेकिन प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या ही है, इस बात को प्रमाणित करने में 70 साल लग गए। इस फैसले की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में बने बेंच में सभी पांच जजों ने सर्व सम्मति से फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट में लंबी कानूनी

रामलाल : भारतीय राजनीति में सादगी, सहजता और समन्वय की मिसाल

राजनीति के शिखर पर रहते हुए रामलाल ने बेहद सादगी और सहजता से कार्य किया है। उनके तेरह वर्ष के लंबे कार्यकाल के दौरान कभी कोई ऐसा मामला सामने नहीं आया, जिससे भाजपा अथवा संघ रामलाल से अहसज हुआ हो। पर्दे के पीछे रहकर संघ तथा भाजपा के बीच संतुलन साधने के साथ–साथ रामलाल ने बड़ी चतुराई के साथ पार्टी को गुटबाजी से भी बचाए रखा।

‘राम मंदिर बनने से देश में सद्भावना और एकात्मता का वातावरण बनेगा’

विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश की जनता के सामने दरपेश मुद्दों पर खुलकर विचार विमर्श करता है। संघ का उद्देश्य यही होता कि देश और देश की जनता को कैसे सर्वश्रेष्ठ  बनाया जाए। देश की सुरक्षा से लेकर सामाजिक समरसता के हर मुद्दे पर सरसंघचालक खुलकर अपनी बात रखते हैं। देश की जनता इस उद्बोधन का इन्तजार भी करती है।

संघ के प्रति कुप्रचारित भ्रमों को दूर करने का प्रयास

जब तमाम प्रकार की सच्ची-झूठी बातें किसी सामाजिक संगठन को लेकर फैलाई जा रही हों, तब ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि वह संगठन अपना पक्ष व विचार देश के समक्ष रखे। आरएसएस जैसे विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के लिए तो यह और जरूरी हो जाता है, क्योंकि आज़ादी के पश्चात् ही संघ को लेकर तमाम प्रकार की भ्रांतियों और मिथकों को बड़े स्तर