संविधान

डॉ. भीमराव आंबेडकर : भारत की सामाजिक समरसता के शिल्पकार

समाज को समरसता के सूत्र में पिरोकर उसे संगठित और सशक्त बनाने वाले महानायकों में एक हैं डॉ. भीमराव आंबेडकर। भारत के संविधान को बनाने, गढ़ने वाले डॉ. आंबेडकर यानि वह विभूति जो आने वाले युग की झलक भांपकर देश को उसके अनुसार बढ़ने की प्रेरणा देती रही। ऐसे प्रखर राष्ट्रभक्त, युगदृष्टा के 130वें जयंती वर्ष पर उन्हें व उनके चिंतन को,

‘भारत में संविधान-लोकतंत्र सब सुरक्षित हैं, असुरक्षा केवल गलत कार्य करने वालों के लिए है’

विपक्षी एकता के बीच आर्क विशप अनिल के बयान को संयोग मात्र ही कहा जा सकता है। लेकिन, सन्दर्भ और मकसद की समानता शक पैदा करती है। उन्होंने जाने-अनजाने विवाद का मौका दिया है। कहा जा रहा है कि भाजपा को अब विपक्ष के साथ चर्च के विरोध का भी सामना करना पड़ेगा। इस कयास को ममता बनर्जी और कई अन्य नेताओं के बयान से बल मिला। उन्होंने

अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को ख़त्म करने की जरूरत

26 नवंबर 1949 को हमारा संविधान बनकर तैयार हुआ था। लिहाजा इसे देश में संविधान दिवस के तौर पर याद किया जाता है। आज जब हम इस दिवस को संविधान दिवस के रूप में याद कर रहे हैं तो हमे इसके बहुआयामी पक्षों पर विचार करते हुए याद करने की जरूरत है। आजादी से पूर्व एवं आजादी के बाद देश में जरूरत के अनुरूप तमाम कानून बनाए गए और उन कानूनों को लागू भी किया गया। लेकिन बड़ा

ये देश आपकी शरीअत से नहीं, संविधान से चलता है मौलवी साहब!

हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश से सम्बंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महिलाओं के हक़ में फैसला सुनाते हुए उन्हें दरगाह की मुख्य मज़ार तक जाने की अनुमति दे दी। लेकिन, दरगाह के ट्रस्ट ने अदालत के इस फैसले से नाखुशी जाहिर की है और इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाने की बात कही है। अपनी इस बात के पक्ष दरगाह के लोगों के पास एक से बढ़कर एक कुतर्क

संविधान का उल्लंघन केजरीवाल की रणनीति का हिस्सा है

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के नेता खुद को संविधान से उपर समझने लगे। वे हर उस संवौधानिक प्रक्रिया को तुच्छ समझने लगे जिसका समर्थन भारतीय संविधान करता है। केजरीवाल ने संविधान के इतर जाकर ही संसदीय सचिवों की नियुक्ति की थी जिसको बाद में माननीय न्यायलय द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया गया। इस वाकया से सबक लेने और संवैधानिक प्रक्रियाओं का एक फिर से उल्लंघन किया और दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के लिए जनमत संग्रह कराने का राग अलापने लगे।