सेक्युलर

ननकाना साहिब की घटना बताती है कि सीएए क्यों जरूरी है!

पिछले सप्‍ताह पाकिस्‍तान में स्थित ननकाना साहिब स्‍थल पर पथराव किए जाने की घटना सामने आई। यहां सिखों के इस पवित्र धर्मस्‍थल पर एक स्‍थानीय परिवार के साथ मिलकर भीड़ ने पत्‍थर फेंके, जिसके बाद माहौल में तनाव व्‍याप्‍त हो गया। मामला धर्मस्‍थल के प्रमुख की पुत्री के अपहरण व धर्मांतरण से जुड़ा था, ऐसे में बात बढ़ गई और इसने हिंसा का रूप ले लिया। जिस

अंकित की हत्या पर ‘कुछ’ लोगों की चुप्पी बेहद डराने वाली है !

अंकित सक्सेना की मौत कोई साधारण मौत नहीं है, यह आतंक और हिंसा का शहर के बीचों-बीच नग्न प्रदर्शन है। दुःख इस बात का है कि कल तक हंसने-खेलने वाले लड़के का देश की राजधानी में सबके सामने क़त्ल हुआ, फिर भी इसपर एक खेमा एक चुप है। अंकित के नाम पर देश भर में कहीं भी कोई कैंडल मार्च नहीं निकला। वे लोग इसपर एकदम चुप हैं, जो पिछले कई मुद्दों पर देश में असहिष्णुता बढ़ने को लेकर अक्सर

इखलाक-जुनैद की हत्या पर जागने वाली असहिष्णुता अंकित-चन्दन की हत्या पर सो क्यों जाती है ?

बीते शुक्रवार को पश्चिमी दिल्‍ली के ख्‍याला क्षेत्र में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। एक 23 वर्षीय हिंदू युवक की मुस्लिमों ने सरेआम गला रेतकर हत्‍या कर दी। अंकित सक्‍सेना नाम का यह लड़का यू ट्यूब चैनल एवं फोटोग्राफी के प्रोफेशन में था। अपनी पड़ोसी मुस्लिम लड़की से प्रेम करता था। चूंकि अंकित हिंदू था, इसलिए मुस्लिम लड़की के परिजनों को इस रिश्‍ते पर आपत्ति थी और इसके चलते ही उन्‍होंने अंकित को

सेक्युलर बुद्धिजीवियों की नजर में शायद संघ-भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्या माफ़ है !

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के दौरान विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता चंदन गुप्ता की हत्या को अभी एक सप्ताह भी नहीं बीते होंगे कि अब कर्नाटक में भाजपा के एक दलित कार्यकर्ता की हत्या उसी मानसिकता ने कर दी है, जिसके लिए चंदन के हत्यारे दोषी हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की राजनीति किसी भी मायने में साम्य नही रखती, परंतु जब एक सम्प्रदाय विशेष के सामूहिक व्यवहार और

कासगंज : चन्दन गुप्ता की हत्या पर सेकुलर खेमे में सन्नाटा क्यों पसरा है !

सामाजिक हिंसा सभ्य समाज को कलंकित करती है। समाज और सियासत सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उत्तर प्रदेश के कासगंज की घटना ऐसी ही है। यहां कुछ अराजक तत्वों ने गणतंत्र दिवस के उत्साह को शोक में बदल दिया। राष्ट्रीय पर्व में जनभागीदारी प्रजातन्त्र, एकता और सौहार्द को जीवंत करती है। ऐसे प्रत्येक आयोजन से जागरूकता बढ़ती है। लेकिन, कासगंज में तिरंगा यात्रा में अवरोध पैदा कर

केन्द्रीय विद्यालयों में हिंदी-संस्कृत में नहीं तो क्या अंग्रेजी-अरबी में प्रार्थना करवाई जाए !

क्या केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थना हिंदुत्व को बढ़ावा देती है? ये प्रार्थना देश और देश से बाहर चल रहे सभी केन्द्रीय विद्यालयों में प्रयोग में है। अब ये पूरी तरह असंवैधानिक बताई जा रही है। अब इस प्रार्थना में हिंदुत्व देखा जा रहा है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जीवन काल में केन्द्रीय विद्यालय चालू हो गए थे। तब देश में भाजपा या एनडीए की सरकारें नहीं थीं, जिनके पीछे आज देश के कथित

शर्म करे अफराजुल खान और डा. नारंग के कत्ल में फर्क करने वाली सेक्युलर बिरादरी !

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राजस्थान में पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूर अफराजुल खान की बेरहमी से हत्या पर दुख प्रकट करते हुए मजदूर के परिवार को मुआवजे के तौर पर तीन लाख रुपये देने की घोषणा की। उनका यह कदम प्रशंसनीय है। ममता ने ट्विटर पर लिखा- ” हमारी सरकार ने परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का फैसला किया है।” पर क्या ममता बनर्जी के इस कदम से दिल्ली के मुख्यमंत्री

गौरी लंकेश की हत्या पर कर्नाटक सरकार से सवाल पूछने से क्यों बच रहे, कॉमरेड ?

कर्नाटक जैसा देश का एक शानदार और प्रगतिशील राज्य जिस तेजी से गर्त में मिल रहा है, उसे सारे देश को गंभीरता से लेना होगा। बैंगलुरू में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर में घुसकर हत्या से सारा देश का मीडिया जगत सन्न है। वो जुझारू पत्रकार थीं। गौरी के कातिलों को पकड़ा जाए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले।

सेना के कठोर रुख पर सवाल उठाने वाले सेना के साथ बदसलूकी पर खामोश क्यों हैं ?

पिछले दिनों श्रीनगर में चुनाव कराकर लौट रहे सीआरपीएफ के जवानों के साथ जिस तरह कश्मीर के बिगड़े और अराजक नौजवानों ने उन पर लात-घूसा बरसा बदसलूकी की और बड़गाम चाडूरा (बड़गाम) में हिजबुल मुजाहिदीन के खतरनाक आतंकी को बचाने के लिए सेना पर पत्थरबाजी की, उससे देश सन्न है। हथियारों से लैस होने के बावजूद भी सीआरपीएफ के जवानों ने तनिक भी प्रतिक्रिया

राष्ट्रहित के लिए घातक हैं वामपंथी और सेक्युलर, सावधान रहने की जरूरत

देश में कन्हैया कुमार से लेकर उमर खालिद जैसे राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त लोगों का समर्थन करने वाले वामी और तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड का देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं व शासन व्यवस्थाओं पर बेवजह के सवाल उठाना मुख्य शगल बन गया है। लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इस ब्रिगेड का बात-बात पर देश की व्यवस्थाओं से भरोसा उठ जा रहा है। ये उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में धूल