हिंसा

ममता के राज में हिंसा और अराजकता के बीच पिसता बंगाल

पश्चिम बंगाल इन दिनों लगातार खबरों में बना हुआ है, लेकिन ये सुर्खियां नकारात्‍मक और अप्रिय कारणों के चलते हैं। लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों पहले ही यहां अराजकता का माहौल बनना शुरू हो गया था जो चुनाव के बाद और गहरा गया है। पश्चिम बंगाल से लगातार हिंसा और अस्थिरता की खबरें आ रही हैं।

ममता के अलोकतांत्रिक शासन से त्रस्त बंगाल

ममता ताकत और तानाशाही के दम पर अपनी सत्ता को स्थायी करना चाहती हैं, मगर उन्हें समझना चाहिए कि ये लोकतंत्र है, जहां ताकत से नहीं, जनमत से निर्णय होते हैं और जनमत को अपने पक्ष में करने का केवल एक ही उपाय है कि संकीर्ण राजनीतिक हितों व स्वार्थों को छोड़ सकारात्मक सोच के साथ देश की प्रगति के लिए कार्य किया जाए।

बंगाल को हिंसा की आग में धकेल ममता किस मुंह से लोकतंत्र की बात करती हैं?

क्या पश्चिम बंगाल की स्थिति आज से 20 साल पहले कश्मीर वाली हो गई है? राज्य में एक पूर्ण बहुमत की सरकार होते हुए भी बंगाल के मौजूदा हालात बद से बदतर हो रहे हैं, जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी वहां की राज्य सरकार पर जाती है। ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री होते हुए राज्य में अत्याचार और अनाचार बहुत बढ़ गए हैं

‘हिंसा की राजनीति से ममता ने जो किला बनाया था, अब उसमे लोकतंत्र की सेंधमारी हो गयी है’

इन दिनों पश्चिम बंगाल देश की राजनीति में सुर्खियों का केंद्र बना हुआ है। इसके मूल में हैं यहां की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी और लोकसभा में जमीन खिसकने के बाद बढ़ चुकी उनकी बौखलाहट। उन्‍होंने जिस नफरत और हिंसा की राजनीति से बंगाल का अपना किला बनाया था, अब उसमें लोकतंत्र की सेंधमारी हो गई है। वह किला अब दरक रहा है और इससे ममता का गुस्‍सा दिनोदिन भड़कने लगा है। असल में, लोकसभा चुनाव से पहले ही ममता को आभास हो गया था कि अब यहां की जनता बदलाव

कांग्रेस का भारत बंद तो विफल रहा ही, इसके बहाने विपक्षी एकजुटता की मंशा भी हुई फुस्स!

बंद का आह्वान करना राजनीतिक दलों का लोकतान्त्रिक अधिकार है, लेकिन बंद के नाम पर हिंसा करना कतई उचित नहीं कहा जा सकता। आज जब कांग्रेस के नेतृत्व में दर्जन भर पार्टियों ने बंद का आयोजन किया तो लक्ष्य यही था कि पेट्रोल उत्पादों की बढ़ती कीमत के बारे में सरकार पर दबाव बनाया जाए।

भारत ही नहीं, दुनिया भर में हिंसा और दमन से भरा है वामपंथ का इतिहास !

कम्युनिस्ट देशों में असहमति जताने का अर्थ है देशद्रोह। सोवियत संघ ने कैसे अपने नागरिकों के मन में भय और घुटन को जन्म दिया, इसे इतिहास के विद्यार्थी भलीभांति जानते हैं और उसी की अंतिम परिणति सोवियत संघ के विभाजन में हुई। युद्ध और रक्तपात ही साम्यवाद की पहचान है और उसी का परिचायक है, उनका बहुचर्चित नारा ‘लाल सलाम’। भले ही भारत के अधिकांश हिस्से में साम्यवाद की कोई प्रासंगिकता

इतिहास बताता है कि राष्ट्र के लिए हर प्रकार से घातक सिद्ध हुए हैं वामपंथी !

सैद्धांतिक तौर पर वामपंथी विचारधारा उस पक्ष की संवाहक है, जो समाज को बदलकर उसमें अधिक आर्थिक बराबरी का दावा करती है। लेकिन जिस तरह वह राजनीतिक आंदोलन और सर्वहारा वर्ग की क्रांति की आड़ में सत्ता की कमान हड़पकर विचारधारा के फैलाव के लिए हिंसा का सहारा लेती है, उससे साफ है कि उसका व्यवहारिक पक्ष विचारधारा कम, हिंसा का खौलता हुआ कुंड ज्यादा है। वामपंथी विचारधारा के गर्भ

शस्त्र और शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक हैं परशुराम

मनुष्य के लिए आत्मरक्षण और समाज-सुख-संरक्षण के निमित्त शस्त्र का आराधन भी आवश्यक है। शर्त यह है कि उसकी शस्त्र-सिद्धि पर शास्त्र-ज्ञान का दृढ़ अनुशासन हो। भगवान परशुराम इसी शस्त्र-शास्त्र की समन्वित शक्ति के प्रतीक हैं। सहस्रार्जुन के बाहुबल पर उनकी विजय उनकी शस्त्र-सिद्धि को प्रमाणित करती है, तो राज्य भोग के प्रति उनकी निस्पृहता

लाल आतंक : केरल में वामपंथी हिंसा का शिकार हुए भाजपा नेता रवींद्रनाथ

अभी सी.पी.एम. के कार्यकर्ताओं के हाथों केरल भाजपा के युवा कार्यकर्ता निर्मल (20) की हत्या के एक सप्ताह भी नहीं बीते कि यहाँ एक और भाजपा नेता की मौत मार्क्सवादी हिंसा में हो गयी है। भाजपा के कडकल पंचायत समिति के अध्यक्ष एवं सेवानिव्रित पुलिस इंस्पेक्टर रवींद्रनाथ (58) दिनांक 2 फ़रवरी को मार्क्सवादियों के घातक हमले में घायल हो गए थे। उनके सर पर गंभीर चोटें आई थीं। इस चोट के कारण

हिंसा और दमन के जरिये राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है वामपंथ का असल चरित्र

केरल हमेशा से राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात रहा है। आये दिन वहां राजनीतिक दलों के आम कार्यकर्ता इन हिंसा के शिकार हो रहे हैं। केरल में अक्सर हर तरह की राजनीतिक हिंसा में अक्सर एक पक्ष मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ही होती आई है| चाहे आज़ादी के पहले त्रावनकोर राज्य के विरुद्ध एलप्पी क्षेत्र में अक्टूबर 1946 को हुआ कम्युनिस्टों का हिंसक पुन्नापरा-वायलर विद्रोह हो, जिसमें हजारों की तादाद