शरीयत

तीन तलाक के समर्थक बताएं कि उनके लिए संविधान पहले है या मज़हबी कायदे ?

सर्वोच्च न्‍यायालय की संविधान पीठ ने मुस्लिमों में प्रचलित तीन तलाक, निकाह हलाला जैसी कुप्रथाओं पर सुनवाई शुरू कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्‍यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्‍यक्षता में बनी इस पीठ में पांच जज शामिल हैं, जो तीन तलाक पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की ओर से दायर सात याचिकाओं पर सुनवाई करेंगे। इन पीड़ित महिलाओं ने हलाला व बहुविवाह जैसी इस्‍लामिक रूढ़ियों को भी कोर्ट में चुनौती दी है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिखाया तीन तलाक़ के समर्थकों को आईना

पिछले एक साल से देश में तीन तलाक का मुद्दा गर्माया हुआ है। तमाम मुस्लिम महिला संगठनों ने इस प्रथा को खत्म करने के लिए मोर्चा खोल रखा है। पिछले दिनों मुस्लिम महिलाओं द्वारा उठाया गया ये मुद्दा जब एक मामले के सम्बन्ध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहुंचा तो न्यायालय ने दो टूक लहजे में तीन तलाक को असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाली क्रूरता बताया। अपनी टिप्पणी में

मुस्लिम महिलाओं के हितों के लिए जरूरी है शरियाई व्यवस्थाओं का खात्मा

लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने देश की जनता से कॉमन सिविल कोड या यूनिफार्म सिविल कोड (सामान नागरिक संहिता ) पर सभी से 16 सवाल किये हैं। जिनका मकसद है सरकार संविधान में दिए दिशा निर्देशों पर चलते हुए देश में सभी नागरिकों के लिए एक सामान आचार संहिता लागू की जा सके।  गौरतलब है

तीन तलाक़ जैसी अमानवीय व्यवस्था के समर्थन में खड़े लोगों की शिनाख्त जरूरी

पिछले लगभग एक सप्ताह से ‘तीन तलाक़’ पर मची रार के बीच जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, जिस तरह से तमाम रोना-धोना मचा है, उसमें से छान कर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं आप नमूने के तौर पर रख सकते हैं। पहली श्रेणी में वे मुसलमान हैं, जिनके मुताबिक ‘कुरान’ का ही आदेश अंतिम आदेश है, उसमें कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता, चाहे कितनी भी विकृत प्रथा हो, उसको सुधारा नहीं जा सकता और

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को समझना होगा कि यह देश संविधान से चलता है, मज़हबी कायदों से नहीं!

संविधान से उपर अपने कानूनों को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में लगे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिमों में प्रचलित तीन तलाक और चार शादियों के नियम को उचित ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट से पर्सनल लॉ में दखल न देते हुए इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खत्म करने की मांग की है। बोर्ड का कहना है कि ये पर्सनल लॉ पवित्र कुरान और हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर आधारित है, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा